Thursday, January 1, 2026
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मथुरा की आनंदपुरी कॉलोनी में 3 दिन से बिजली नहीं, हवा-पानी को तरसे लोग

  • 3 दिन से बिजली न होने के कारण पानी को तरसे लोग, स्कूल भी नहीं गए बच्चे
  • JE रवि मौर्या को लोगों के फ़ोन उठाने में हो रही दिक्कत, ये अधिकारी हैं या लाट साहब!

मथुरा : शहरी क्षेत्र में आये दिन बिजली के हाल ए बेहाल नजर आ रहे हैं। लेकिन विद्युत अधिकारी आंख बंद किए हुए हैं। विद्युत अधिकारियों के निरीक्षण की बात तो बहुत दूर की है, आने वाली शिकायतों पर भी कोई नजर नहीं है। पिछले तीन दिनों से बीएसए कॉलेज से राधिका विहार रोड़ पर आनंदपुरी कॉलौनी में बिजली न होने के कारण हवा-पानी के लिए लोग तरस गए और बच्चे स्कूल तक नहीं गए।

शहर के बीएसए कॉलेज से राधिक विहार रोड़ पर स्थित आनंदपुरी कॉलौनी के गली नं 3 में पिछले तीन दिनों से विद्युत आपूर्ति ठप पड़ी हुई है। इस कारण करीब 100 घर अंधेरे में डूबे हुए हैं। बिजली न होने के कारण घर में पानी नहीं है। भीषण गर्मी के कारण लोगों का हाल ए बेहाल है।
स्थानीय सचिन कुमार चित्ताड़िया ने बताया कि पिछले तीन दिनां से करीब 100 घरों में बिजली न होने के कारण सब कुछ अस्त व्यस्त हो गया है। पीने के पानी से लेकर नहाने तक की कोई व्यवस्था नहीं है। उन्होंने बताया कि पिछले तीन दिनों से उनके बच्चे भी स्कूल नहीं गए हैं। इसका मुख्य कारण बिजली न होना है। इन्वर्टर ठप पड़ गए हैं। रात की नींद भी हराम हो गई है।

उन्होंने बताया कि तीन दिनों से आनंदपुरी कॉलोनी की गली नं3 को अंधेरे में डूबे होने की शिकायत उन्होंने एसडीओ रमेश सोनी को फोन पर की। जेई रवि मौर्य को फोन किया तो, उन्होंने किसी का फोन तक उठाना मुनासिब नहीं समझा। एसडीओ से बात होने के बाद भी समस्या का कोई समाधान तक नहीं हुआ। एसडीओ द्वारा शिकायतकर्ता को लाइनमैन न होने की बात कह कर फोन काट दिया।

इसके बाद सचिन चित्तौडिया ने यूपीपीसीएल चेयरमैन से लेकर डीवीवीएनएल के एमडी एवं अन्य अधिकारियों को मेल तथा ट्वीट् किया एवं शहरी एक्शियन से फोन पर भी शिकायत दर्ज करायी।

स्थानीय एड. अवनीश उपाध्याय ने बताया कि विद्युत अधिकारियों की लापरवाही जनता पर भारी पड़ रही है। अगर समय से अधिकारी निरीक्षण करते रहे हैं तो, समस्याएं आना तो बहुत दूर की बात है, वह पास तक नहीं भटक सकतीं, लेकिन ऐसा नहीं है।

छाता के वरिष्ठ कवि रामदेव शर्मा “राही” दिल्ली में होंगे सम्मानित

नगर के वरिष्ठ कवि/शायर रामदेव शर्मा “राही” को अंतर्राष्ट्रीय काव्य प्रेमी मंच, तंजानियां द्वारा दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में सम्मानित किया जाएगा।
अंतर्राष्ट्रीय काव्य प्रेमी मंच, तंजानियां की संस्थापक डॉ. ममता सैनी ने भारत को विश्व पटल पर स्तरीय प्रस्तुति से संबंधित दो ग्रंथ “भारत को जानें” और “आयुर्वेद को जानें” के विश्व रिकॉर्ड और इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज हो जाने पर दिल्ली में 11मई 2024 को आयोजित भव्य लोकार्पण समारोह व रचनाकार सम्मान समारोह के अवसर पर दोनों ग्रंथों में सहभागिता करने पर रामदेव शर्मा “राही” को आमंत्रित किया है। उक्त दोनों ग्रंथों की संपादिका डॉ. ममता सैनी हैं।
‘भारत को जानें’ ग्रंथ में भारत के सभी राज्यों का कला,साहित्य,संस्कृति के साथ ऐतिहासिक धरोहरों का भी दोहा और चौपाई छंदों में अत्यंत रोचक और सटीक वर्णन है जो प्रत्येक दृष्टि से समग्र भारत को जानने,समझने के लिए पर्याप्त और उपयोगी है। इस ग्रंथ में रामदेव शर्मा “राही” ने आंध्र प्रदेश के लिए अपनी प्रस्तुति दी है।
‘आयुर्वेद को जानें’ ग्रंथ में अनेक जड़ी बूटियों/वनस्पतियों के औषधीय गुण तथा उनके संयोग से अनेक प्रकार की बीमारियों में उपयोग के लिए सरल दोहों को भावार्थ सहित प्रस्तुत किया गया है जो जीवन में नि:संदेह महत्वपूर्ण सिद्ध होगी। रामदेव शर्मा “राही” ने इस ग्रंथ में एलोवेरा(घृतकुमारी)के द्वारा उपचार हेतु प्रयोग पर अपनी प्रस्तुति दी है।
अंतर्राष्ट्रीय काव्य प्रेमी मंच, तंजानियां की संस्थापक व कार्यक्रम की मुख्य संयोजक डॉ. ममता सैनी के अनुसार उक्त दोनों ग्रंथों का विमोचन/लोकार्पण एवम रचनाकार सम्मान समारोह आगामी 11मई 2024 को एन डी एम सी कन्वेंशन सेंटर,15, संसद मार्ग, हनुमान रोड़, कनॉट प्लेस, नई दिल्ली में किया जाएगा जिसमें छाता(मथुरा) के वरिष्ठ कवि रामदेव शर्मा “राही” को सम्मानित किया जाएगा।

जब मैंने इंदिरा गांधी के सामने गंदी गालियां बकने वाले बीपी मौर्या को उसकी औकात बताई

विजय गुप्ता की कलम से

     मथुरा। बात उस समय की है जब इंदिरा गांधी आपातकाल के बाद हुई पराजय के पश्चात पहली बार सार्वजनिक रूप से बाहर निकलीं। मौका था आगरा महापालिका के सामने का, उस समय वे महापालिका की ऊपरी मंजिल पर बनी खुली जगह  से भाषण देकर उतरीं तथा अपनी खुली जीप पर खड़ी हो गईं और किसी अन्य स्थान पर जाने की तैयारी थी।
     मैं उस समय वहीं पर मौजूद था।मैंने जो कुछ वहां देखा शायद उसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता।उस समय इंदिरा गांधी के पास खड़ी एक अन्य जीप पर रिपब्लिकन पार्टी (जैसे आज बसपा है) का राष्ट्रीय अध्यक्ष बीपी मौर्या मौजूद था। अचानक किसी बात पर एक अन्य दूसरे नेता से बीपी मौर्य की जोरदार तड़का भड़की हो गई। इसी मध्य बीपी मौर्या ने इंदिरा गांधी के सामने ही दूसरे नेता को अश्लील गालियां बकने शुरू कर दीं। गालियां अत्यंत गंदी और भद्दी थीं यह सब देखकर मैं भौचक्का रह गया और इतना क्रोध आया कि पूंछो मत।
     इंदिरा गांधी इस दौरान स्तब्ध रह गईं किंतु वे कुछ बोली नहीं सिर्फ चुपचाप खड़ी रहीं। उसी दौरान उनकी गाड़ी आगे बढ़ गई तथा बीपी मौर्या दूसरे नेता को गालियां बके जा रहा था। मैंने आव देखा न ताव और बीपी मौर्य से चिल्लाकर कहा कि मौर्या जी यह तुम्हारा दोष नहीं है यह तो तुम्हारी……….. का असर है। इतना सुनते ही वह अन्य नेता से उलझना छोड़ यह कहते हुए कि ठहर जा  अभी बताता हूं तुझे, मेरी तरफ आक्रामक हुआ। उसको अपनी ओर लपकते हुए देख मैं तुरंत मुड़कर भीड़ में लोप हो गया
     मुझे इस बात का बेहद सुकून है कि मैंने अनगिनत लोगों की भीड़ के मध्य उसे उसकी औकात बता दी। साथ ही इस बात का भी चैन है कि मैं उसके हाथ नहीं आया वरना मेरा कचूमर निकाले बगैर नहीं छोड़ता। क्योंकि मैं तो कच्ची उम्र का मरियल सा था और वह भैंसे जैसा संड मुस्टंड। हां एक बात का बेहद अफसोस है कि यदि यही बात मैं उससे इंदिरा गांधी के सामने कह देता तो मजा कुछ और ही होता। शायद मन ही मन इंदिरा जी को मेरी सच्ची बात बहुत अच्छी लगती। सबसे ज्यादा घ्रणित बात तो मुझे यह लगी कि एक महिला और वह भी प्रधानमंत्री रह चुकी विश्वविख्यात हस्ती, उनके सामने मौर्या ने इस प्रकार की नींच हरकत की। इस बारे में सैकड़ों वर्ष पूर्व सब कुछ तुलसीदास जी रामायण की चौपाई में कह चुके हैं। इंदिरा गांधी ने इसे अपनी पार्टी से इसलिए जोड़ लिया क्योंकि इमरजेंसी के बाद जगजीवन राम उनका साथ छोड़ गए थे और उनके विकल्प के रूप में यानी दलित वोटों के चक्कर में इसे पाल लिया। जिस समय यह घटना हुई उससे कुछ समय पूर्व ही इंदिरा गांधी ने इसे अपनी कांग्रेस (आई) का राष्ट्रीय महासचिव बना दिया था।
     आगरा की उस जनसभा के बाद ही इंदिरा गांधी राजनीति में पुनः सक्रिय हुईं क्योंकि इमरजेंसी में हुई देश की प्रगति पाकिस्तान के दो टुकड़े करके बंगलादेश बनवाने और खालिस्तान की मांग को लेकर उत्तपात मचाने वाले सिख उग्रवादियों में भुस भर देने के कुछ मामलों से मैं इंदिरा गांधी का एक प्रकार से भक्त था। मुझे जैसे ही यह पता चला कि इंदिरा गांधी अमुक दिन ताज एक्सप्रेस से आगरा जायेंगी तुरंत मैंने ताज में अपनी रिजर्वेशन भी करा ली आगरा की क्योंकि उस समय शायद बगैर रिजर्वेशन के ताज का सफर नहीं होता था।
     यही नहीं इंदिरा गांधी का सानिध्य पाने की ललक के चक्कर में मैं लौटते समय जिस प्रथम श्रेणी की बोगी में इंदिरा गांधी को वापस दिल्ली लौटना था (वह पूरी होगी इंदिरा गांधी व अन्य कांग्रेस के लोगों के लिए आरक्षित थी) ताज के रवाना होने से काफी देर पहले ही चुपचाप उस बोगी के शौचालय में जाकर छिप गया। जब रेल चली तब बाहर आ गया और इंदिरा गांधी से नमस्कार व क्षणिक मुलाकात हुई। जब मैं उनके पैर छूने लगा तो वह बोली कि बस बस और फिर पैर छुआ लिए।
      फिर उन्होंने मुझसे पूंछा कि कहां के रहने वाले हो? मैंने उन्हें बताया कि मथुरा का हूं आप अब मथुरा आइए। इस पर वे बोलीं कि जरूर आऊंगी। उनका सानिध्य पाकर मुझे अपार खुशी मिली किंतु एक गलती हो गई कि उन्हें यह बताने का ध्यान हड़बड़ाहट में नहीं रहा कि उस गंदे इंसान मौर्या को मैंने उसकी औकात बता दी, क्योंकि उसने आपके सामने गंदी गालियां बकी थीं। शायद उन्हें यह सुनकर सुकून मिलता।

राजीव एकेडमी में लीन सिक्स सिग्मा विषय पर अतिथि व्याख्यान आयोजित, सिक्स सिग्मा परियोजना प्रबंधन में सुधार लाने का सबसे अच्छा माध्यमः प्रो. सपना यादव

मथुरा। सिक्स सिग्मा एक अनुशासित और डेटा संचालित दृष्टिकोण है जिसका व्यापक रूप से परियोजना प्रबंधन प्रक्रिया में सुधार लाने और दोषों को कम करने के लिए उपयोग किया जाता है। यह उन विविधताओं को पहचानने और समाप्त करने के लिए एक व्यवस्थित ढांचा प्रदान करता है जो परियोजना के प्रदर्शन को प्रभावित कर सकती हैं। यह बातें राजीव एकेडमी फॉर टेक्नोलॉजी एण्ड मैनेजमेंट के एमबीए विभाग द्वारा लीन सिक्स सिग्मा विषय पर आयोजित अतिथि व्याख्यान में रिसोर्स परसन प्रो. (डॉ.) सपना यादव जे.पी. यूनिवर्सिटी ने छात्र-छात्राओं को बताईं।
रिसोर्स परसन प्रो. सपना यादव ने छात्र-छात्राओं को बताया कि सिक्स सिग्मा को 1980 के दशक में मोटोरोला द्वारा विकसित किया गया था। तभी से इसे जनरल इलेक्ट्रिक, टोयोटा और अमेजॉन सहित दुनिया भर की कई अन्य कम्पनियों द्वारा अपनाया गया है। इसका उपयोग ग्राहकों की संतुष्टि में सुधार, लागत कम करने तथा मुनाफा बढ़ाने के लिए विनिर्माण, स्वास्थ्य सेवाएं, वित्त और सेवा जैसे उद्योगों में किया जाता है।
प्रो. सपना यादव ने कहा कि आज के प्रतिस्पर्धात्मक समय में सिक्स सिग्मा पद्धति के बारे में प्रबन्धन के हरेक छात्र-छात्रा को अपडेट जानकारी होनी चाहिए क्योंकि इसके द्वारा हम दो शक्तिशाली प्रक्रिया सुधार तकनीकों से परिचित होते हैं। इस प्रक्रिया में गैर मूल्य वर्धित गतिविधियों की पहचान करके उन्हें समाप्त कर अपशिष्ट को समाप्त करने तथा दक्षता को अधिकतम बढ़ाने पर अपना फोकस करते हैं। उन्होंने कहा कि यह एक सॉफ्टवेयर पद्धति है जो आपको कार्य निष्पादन करने में मदद करती है।
उन्होंने बताया कि यह सहयोगी टीम के प्रयास पर निर्भर करती है। यह बढ़ा हुआ प्रदर्शन, घटी हुई प्रक्रिया विविधता लाभ, कर्मचारी मनोबल और उत्पादन या सेवा की गुणवत्ता में कमी तथा सुधार में योगदान करती है। परियोजना स्तर पर इनकी संख्या पाँच है जैसे मास्टर ब्लैक बेल्ट, ब्लैक बेल्ट, ग्रीन बेल्ट, यलो बेल्ट तथा व्हाइट बेल्ट। ये सभी बेल्ट टीम के लोग परियोजनाओं का संचालन करने, कार्यों में सुधार, प्रोजेक्ट को लोकप्रिय बनाने तथा संस्थान की कार्यप्रणाली को बेहतर बनाने का कार्य करते हैं।
प्रो. सपना यादव ने कहा कि सिक्स सिग्मा व्यावसायिक रणनीति के लाभों में 50 फीसदी तक प्रक्रिया लागत में कमी, समय चक्र में सुधार, सामग्री की कम बर्बादी, ग्राहकों की आवश्यकताओं की बेहतर समझ, ग्राहक संतुष्टि और मूल्य प्रवाह में वृद्धि तथा अधिक विश्वसनीय उत्पाद और सेवाएं प्रदान करती है। उन्होंने कहा कि प्लेसमेंट के बाद छात्र-छात्राएं जब किसी संस्थान में चयनित होते हैं तब वह सिक्स सिग्मा के माध्यम से बेहतर व्यावसायिक कार्य क्षमता प्राप्त करने के लिए सांख्यिकीय, वित्तीय विश्लेषण और परियोजना प्रबंधन का उपयोग कर सकते हैं। अंत में संस्थान के निदेशक डॉ. अमर कुमार सक्सेना ने अतिथि वक्ता का स्वागत करते हुए उनका आभार माना।

मथुरा – क्या राम भी बनेंगे सांसद, सीता, रावण पूर्व में रह चुके हैं सांसद

राजनीति के भी अपने अलग-अलग रंग रहते हैं और राजनीति के रंग से कलाकार भी अछूते नहीं हैं, वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में एक बार फिर से कलाकार राजनीतिक के रंग में रंगे आ रहे हैं जहां फिल्म अभिनेत्री कंगना रनौत हेमा मालिनी सहित कई फ़िल्मी सितारे चुनाव मैदान में विभिन्न जगहों से हैं तो वहीं रामायण में प्रभु श्री राम का किरदार निभाने वाले अरुण गोविल मेरठ से भारतीय जनता पार्टी से चुनाव लड़ रहे हैं, आपको बताते चलें कि यह दिलचस्प चुनाव इसलिए है क्योंकि इससे पूर्व रामायण में रावण का किरदार निभाने वाले अरविंद त्रिवेदी 1991 से लेकर के 1996 तक भाजपा से ही गुजरात के सांबरकांठा निर्वाचन क्षेत्र से सांसद चुने गए थे।
वहीं दूसरी ओर सीता का किरदार निभाने वाली दीपिका चिखलीया गुजरात की बड़ौदा सीट से लोकसभा चुनाव जीत चुकी हैं, यह दोनों ही कलाकार 1991 से लेकर के 1996 तक सांसद रहे, ऐसे में एक बार फिर रामायण धारावाहिक में राम का बड़ा किरदार निभाने वाले अरुण गोविल मेरठ से चुनाव लड़ रहे हैं जहां उनके सामने कई चुनौतियां भी हैं, अब देखना होगा कि 4 जून के बाद राजनीति का ऊंट किस करवट और किस ओर बैठता है।

रिपोर्ट – रवि यादव

कक्षा 11-12 एवं अन्य दशमोत्तर कक्षाओं मैं ऑनलाइन आवेदन करने वाले छात्रों के लिए करेक्शन हेतु पोर्टल को 3 मई 2024 तक खोंला गया

मथुरा 27 अप्रैल/ जिला समाज कल्याण अधिकारी ने अवगत कराया है कि शासन के निर्देशों के क्रम में शासन द्वारा जारी समय सारिणी के अनुसार अनुसूचित जाति एवं जनजाति छात्रों हेतु कक्षा 11-12 एवं अन्य दशमोत्तर कक्षाओं मैं 31 मार्च 2024 तक ऑनलाइन करने वाले छात्रों के लिए पोर्टल दिनांक 26.04.2024 से 3 मई 2024 तक छात्रों के स्तर से आवेदन पत्र में करेक्शन हेतु पोर्टल खुला है। समस्त शिक्षण संस्थाएं शिक्षण संस्थान में अध्यनरत छात्र पूर्णांक व प्राप्तांक के साथ-साथ अन्य जो त्रुटियां प्रदर्शित हो रही हैं, को सही भरें, छात्रो के द्व्रारा संसोधन के उपरांत तत्काल प्रिंट आउट संस्थान में 26 मई 2024 से 07 मई 2024 तक जमा करना होगा तत्पश्चात शिक्षण संस्थाओं द्व्रारा आवेदन पत्रों को ऑनलाइन सत्यापित/अग्रसारित करने की कार्यवाही निर्धारित समयावधि दिनांक 07 मई 2024 तक पूर्ण की जानी है
यह भी अवगत कराना है कि शासन द्वारा पुन: जारी (अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति) छात्रवृति योजनातर्गत समय सारिणी के अनुसार विश्वविद्यालय/एफिलिएटिंग एजेंसी/जिला विद्यालय निरीक्षक द्वारा फीस आदि को ऑनलाइन डिजिटल हस्ताक्ष्कार से सत्यापन करने की समयावधि 30 अप्रैल से 3 में 2024 तक निर्धारित की गई है तथा संबंधित विश्वविद्यालय/एफिलिएटिंग एजेंसी के द्वारा भरी गई फीस को अथवा स्वयं फीस अंकित कर डिजिटल हस्ताक्षर से ऑनलाइन स्थापित किए जाने की कार्यवाही दिनांक 04 मई से 7 मई 2024 तक की जानी है।

जब पश्चिम बंगाल सचिवालय में मुझे पागल का खिताब मिला

मथुरा। बात लगभग पांच दशक पुरानीं है। उस समय पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ज्योति बसु थे। मैं मुख्यमंत्री से मिलने चौरंगी स्थित राइटर्स बिल्डिंग (सचिवालय) जा पहुंचा। मैंने वहां के अधिकारियों से कहा कि मुझे ज्योति बसु से मिलना है। वे बोले कि तुम कौन हो, कहां से आऐ हो, क्या काम है? इस पर मैंने अपना नाम बता कर कहा कि मैं मथुरा से आया हूं तथा बंगाल में गौ हत्या बंद होनी चाहिए इस संदर्भ में उनसे अपनी बात कहना चाहता हूं।
     उन लोगों ने कहा कि भाई मुख्यमंत्री से मिलना कोई हंसी मजाक नहीं होता है और फिर तुम तो अभी बच्चे हो, क्यों इस चक्कर में पड़ते हो। गौ हत्या बंद होना कोई हंसी खेल थोड़े ही है। हास परिहास करते हुए मुझे समझाया कि जाओ अपने घर और भूल जाओ मुख्यमंत्री से मिलना और बंगाल में गौ हत्या का बंद होना। चूंकि मेरे ऊपर तो ज्योति बसु से मिलने का जुनून सवार था अतः मैंने उनसे जिद की कि मुझे सिर्फ दो मिनट को मिलवा दो मैं जो प्रार्थना पत्र लेकर आया हूं उसे देकर चला जाऊंगा।
     इस पर उनमें से एक अधिकारी बोला कि सुबह से शाम तक तुम्हारे जैसे पागल यहां रोजाना आते हैं और कहते हैं कि हमें ज्योति बसु से मिलना है। यदि ज्योति बसु तुम लोगों से ही मिलते रहेंगे तो फिर राजकाज कैसे चलाएंगे? खैर मैं उस व्यक्ति की बात सुनकर बुझे मन से वापस लौट आया। इसके बाद मैंने पता किया कि ज्योति बसु रहते कहां है। मुझे पता चला कि ज्योति बसु बालीगंज स्थित हिंदुस्तान पार्क में रहते हैं। संयोग की बात यह भी थी कि मेरी बड़ी बहन भी बालीगंज स्थित लेक झील के निकट “सरोवर” बिल्डिंग की सबसे ऊपर वाली दसवीं मंजिल पर रहतीं थीं। वहां से हिंदुस्तान पार्क बमुश्किल दो-तीन किलोमीटर ही होगा।
     दूसरे दिन सुबह सुबह यानीं सूर्योदय के आस पास में ज्योति बसु के घर जा पहुंचा, ज्योति बसु का एक साधारण सा दो मंजिला मकान था। वहां पर न कोई पुलिस का पहरा, न सुरक्षा का कोई बंदोबस्त और ना ही गाड़ियों का जमघट मैं यह देखकर बड़ा आश्चर्य चकित रह गया। घर पर इक्का-दुक्का लोग दरवाजे के पास बैठे थे मैंने उनसे कहा कि मैं मथुरा से आया हूं और मुझे मुख्यमंत्री जी से मिलना है उन्होंने कहा कि क्यों? इस पर मैंने उन्हें अपनीं बात बताई। उन लोगों ने कहा कि ऊपर पी.ए. साहब से बात करो। मैं सीढ़ियां चढ़कर ऊपर गया तो वहां ज्योति बसु के कमरे के आगे एक अति वृद्ध सज्जन बैठे थे बड़ी सी मेज उनके आगे लगी थी तथा उस पर कागज, पत्रों व फाइलों का ढेर लगा था। उनकी उम्र शायद 75-80 के मध्य होगी।
     उन्होंने चश्मे में से मेरी ओर नजर डाली तथा बोले कि “खोका बाबू की काज आछै” यानीं लड़के क्या काम है? मैंने उन्हें सारी बात बताई, इस पर उन्होंने कहा कि बात तो तुम्हारी सही है। गाय तो हमारी मां है और उसकी हत्या तो नहीं होनी चाहिए किंतु बंगाल में  गौहत्या को रोकना असंभव है। अतः ज्योति बसु साहब से तुम्हारा मिलना बेकार है। मैंने कहा कि मैं इतनीं दूर से कितने अरमानों को लेकर आया हूं जरा मुझे एक मिनट को मिलवा तो दो। इस पर उन्होंने बड़े धैर्य और अपनत्व से समझाया कि बेटा इस समय शेसन (विधानसभा सत्र) चल रहा है। बसु बाबू बहुत व्यस्त हैं। मैं नहीं मिलवा सकता, बात को समझो। हां उन्होंने एक भरोसा मुझे दिया कि मैं बाद में मौका मिलते ही तुम्हारे प्रार्थना पत्र को उनके सामने जरूर रख दूंगा।
     हालांकि मेरी स्थिति ठीक वैसी थी जैसे सांप सीढ़ी के खेल में गोटी सौ वे नंबर के निकट पहुंचकर सांप द्वारा डसे जाने पर नीचे पांच सात नंबर पर ला पटकी हो या फिर क्रिकेट के खेल में शतक के निकट पहुंचकर खिलाड़ी आउट हो जाय। बावजूद इसके मुझे अधिक निराशा नहीं हुई क्योंकि मुझे इस बात की तसल्ली थी कि मैंने अपना प्रयास पूरा किया और सफलता भी उसमें बहुत कुछ मिली यानीं कि मुख्यमंत्री न सही उनके पी.ए. तक पहुंच कर अपनी भावना व्यक्त कर ली तथा पी.ए. के द्वारा यह आश्वासन मिलना कि मैं एक बार जरूर इस प्रार्थना पत्र को ज्योति बसु के सामने रखूंगा तथा उन्हें बताऊंगा कि मथुरा से एक लड़का आया था और वह दे गया है।
     मुझे पक्का विश्वास है कि उनके पी.ए. ने अपना वादा पूरा जरूर किया होगा क्योंकि वह अत्यंत सज्जन और धार्मिक व्यक्ति होने के साथ गौभक्त भी थे। इस पूरे घटनाक्रम के बाद मुझे थोड़ा सा मलाल तो हुआ किन्तु संतोष भी बहुत मिला। मान लो अगर मैं ज्योति बसु से मिल भी लेता तो कौन से वे अगले दिन से गौहत्या को प्रतिबंधित कर देते? वैसे देखा जाय तो यह अच्छा ही हुआ कि मैं ज्योति बसु से नहीं मिल पाया क्योंकि ज्योति बाबू शुरू से ही बड़े गुस्सैल और मारधाड़ वाले व्यक्ति रहे हैं और मैं खुद भी इसी बिरादरी का हूं। हो सकता है उनके सामने भी मेरा मुंह फटपना सर पर सवार हो जाता तो शायद दूसरी मंजिल से सीढ़ियों के द्वारा नीचे आने के बजाय हवाई मार्ग से यह रास्ता तय करा दिया जाता और मैं भूल जाता सारी नेतागीरी तथा छटी का दूध याद करने के अलावा और कोई चारा मेरे पास न होता।
     एक बात तो माननी पड़ेगी कि ज्योति बाबू में भले ही लाख अवगुण हों किंतु उनकी ईमानदारी और सादगी हमेशा से बेमिसाल रही यह बात मैं बचपन से सुनता भी आया और प्रत्यक्ष देख भी लिया। यही कारण है कि ज्योति बसु न सिर्फ खुद कई दशक तक लगातार मुख्यमंत्री रहे तथा जब उनका स्वास्थ्य खराब रहने लगा तब उन्होंने अपने मोहरे बुद्धदेव भट्टाचार्य को मुख्यमंत्री बनाया। बुद्धदेव उन्हीं के निर्देशन और मार्गदर्शन में राजकाज चलाते थे। कहने का मतलब है कि बुद्धदेव के कार्यकाल में ज्योति बसु सुपर मुख्यमंत्री की भूमिका में रहते थे। यदि पुराने पीरियड को भी जोड़ा जाय यानीं कि जब अजय मुखर्जी मुख्यमंत्री और ज्योति बसु उप मुख्यमंत्री थे तब भी ज्योति बसु अजय मुखर्जी पर हावी रहते अर्थात जो भी कुछ महत्वपूर्ण निर्णय होते वे ज्योति बाबू की सहमति से होते भले ही राजी राजी या गैर राजी। यदि इस कार्यकाल को भी जोड़ा जाय तो ज्योति बसु का डंका बंगाल पर लगभग आधी शताब्दी तक बजा।
     अब मैं अपने असली मुद्दे पर आता हूं। मुझे कलकत्ता में ज्योति बसु से मिलने की तीव्र अभिलाषा का असली कारण यह था कि मेरे कलकत्ता जाने के कुछ समय पूर्व मथुरा में एक विशाल गौ रक्षा अभियान चला। इस अभियान की अगुवाई स्व. श्री राधा कृष्ण बजाज तथा आगरा के पूर्व सांसद तथा आचार्य विनोबा भावे के निकटतम शिष्य सर्वोदयी स्व. श्री बाबूलाल मीतल ने की थी। इस अभियान में पवनार आश्रम की कई बहनें व अनेक सर्वोदय कार्यकर्ता भी महीनों तक मथुरा में रहे। देवता समान महान पत्रकार स्व. श्री कांतिचंद्र अग्रवाल जो अमर उजाला के प्रतिनिधि थे, के निर्देशानुसार मैंने भी आंदोलन में यथासंभव अपनी सहभागिता निभाई।
     पूर्व सांसद बाबूलाल मीतल मुझसे बड़े प्रसन्न रहते थे तथा कभी कभी हमारे घर भी आ जाते थे। हमारे पिताजी के पास आकर बैठना उन्हें बहुत अच्छा लगता था। सर्वोदय लोगों की जब यहां जनसभाएं होती थी तब उनमें दिए गये भाषणों से मुझे पता चला कि देश के सबसे बड़े कसाई खाने मटिया बुरुज और टैंगरा कलकत्ता में हैं। वहां पर प्रतिदिन सैकड़ों गाय कटती हैं तथा पूरे देश में बंगाल गौ हत्या का सबसे बड़ा केंद्र है। मैं तो वैसे भी चार छः महीने में कलकत्ता जाता रहता था। अतः मैंने पिताजी की आज्ञा लेकर बड़ी बहन के पास कलकत्ता जाने का प्रोग्राम बना लिया।
     कलकत्ता पहुंचकर मैं शहर से बहुत दूर मटिया बुरुज और टैंगरा कसाई खाने गया वहां मृत गायों को जगह-जगह दुकानों पर पूंछ को रस्सी के द्वारा बांधकर लटका रखा था जैसे यहां कुछ जगह बकरे लटके रहते हैं। यह सब देखकर मेरा मन बड़ा द्रवित हुआ। फिर मैं कसाई खानों के मुख्य द्वार पर पहुंचा जहां कसाई लोग पत्थरों पर छुरों को धार दे रहे थे। इस सबको देख कर तो मेरा मन अति विचलित हो उठा तथा आगे कदम नहीं बढ़ा पाया और घर लौट आया सुबह का निकला लौटते लौटते शाम हो गई। दूसरे दिन मैं ज्योति बसु से मिलने सचिवालय गया और वहां जो कुछ हुआ वह ऊपर लिख चुका हूं तथा तीसरे दिन ज्योति बसु के घर पहुंचा इस दृष्टांत को भी बता चुका हूं।
     उन्हीं दिनों मुझे सर्वोदय लोगों से पता चला कि क्रोम व काफ लेदर के पीछे कितनीं क्रूरता छिपी होती है तथा चमड़े का प्रयोग करना पशु क्रूरता करने में सहायक होता है। तभी से मैंने चमड़े के जूते चप्पल व हर सामान का त्याग कर दिया।
     मेरा सभी से अनुरोध है कि जहां तक हो सके चमड़ा व अन्य ऐसे हर सामान से बचें जिसमें पशु क्रूरता छिपी हो। गाय ही नहीं प्रत्येक प्राणी की रक्षा हेतु हम सभी को हमेशा प्रयासरत रहकर अपना मानवीय धर्म निभाना चाहिए।
दया धरम का मूल है पाप मूल अभिमान..
तुलसी दया न छोड़िए जब लग घट में प्राण….विजय गुप्ता की कलम से

संस्कृति विवि की अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार में बताया भारतीय ज्ञान का महत्व

मथुरा । संस्कृति विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ एजुकेशन द्वारा अंतरराष्ट्रीय सेमिनार ” इंडियन नॉलेज सिस्टम’’ विषय पर एक अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन ऑनलाइन किया गया। यह आयोजन डीo एसo कॉलेज अलीगढ़ के साथ संयुक्त रूप से किया गया। सेमिनार में वक्ताओं ने भारतीय ज्ञान की परंपराओं और अपने इस ज्ञान को आधुनिक विज्ञान के साथ तालमेल बिठाए जाने पर जोर दिया। वक्ताओं ने कहा कि भारतीय ज्ञान के साथ आधुनिक विज्ञान का तालमेल विश्व को आगे ले जाने में बहुत मददगार और उपयोगी सिद्ध होगा।
सेमिनार का शुभारंभ संस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डा. सचिन गुप्ता ने किया। उन्होंने सेमिनार की सफलता की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान की परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए और विश्व को यह बताने के लिए कि हमारे ऋषियों ने कितनी कड़ी मेहनत और वर्षों के अनुसंधान के बात अनेक जटिल समस्याओं का समाधान वर्षों पहले कर लिया था, ऐसी सेमिनार बहुत उपयोगी हो जाती हैं। सेमिनार के मुख्य अतिथि एनसीआरटी नई दिल्ली के प्रोफेसर विजय पाल सिंह ने भारतीय ज्ञान के गौरव पर प्रकाश डालते हुए कहा कि विश्व को यह बताना जरूरी है कि हम बहुत सारे ज्ञान के क्षेत्रों में कितने आगे हैं। सीईओ डॉo मीनाक्षी शर्मा ने भारतीय ज्ञान परम्परा के महत्व को रेखांकित किया। कुलपति प्रोo एमo बीo चेट्टी ने भारतीय ज्ञान की आधारशिला के महत्व को बताया और आधुनिक ज्ञान से जोड़ कर शिक्षा में महत्वपूर्ण परिवर्तन को बताया। स्कूल ऑफ एजुकेशन की डीन डॉo रेनू गुप्ता ने बताया कि शिक्षा की आधारशिला ही भारतीय ज्ञान परम्परा है, जब पूरे विश्व में अंधकार था तब भारत में ज्ञान का दीपक जल रहा था, भारतीय ज्ञान एवं दर्शन से विश्व प्रभावित हुआ हैं।
सेमिनार में उपस्थित वक्ताओं ने कहा कि आवश्यकता भारतीय ज्ञान को विश्वस्तर पर आधुनिक कहे जाने वाले ज्ञान के साथ जोड़कर भविष्य की संभावित समस्याओं के हल करने की है। हमारे देश ने जिस तरह से वसुधैव कुटुम्बकम के द्वारा सारे विश्व को जोड़ने का संदेश दिया उसी तरह से भारतीय ज्ञान का लाभ भी सारा विश्व उठा सकता है। सेमिनार में डॉo विन्नारास निथ्यनंथम मलावै अफ्रीका, प्रोo एन के दास, डॉo मुकेश कुमार भारद्वाज ने भी भाग लिया।

वीपीएस के छात्रों ने जे ई ई की सफलता हासिल, विद्यालय को किया गौरवान्वित

वृंदावन। शैक्षिक स्तर पर नित नये आयामों की श्रंखला में एक और अध्याय छात्रों ने विद्यालयों के नाम किया। सत्र 2022-23 के बैच के प्रतिभाशाली छात्र अनुज अग्रवाल व विवेक अधिकारी ने जेईई की मुख्य परीक्षा में सर्वोत्कृष्ट प्राप्तांक लाकर विद्यालय का नाम रोशन किया।
मथुरा मार्ग स्थित वृंदावन पब्लिक स्कूल में विज्ञान वर्ग के छात्र अनुज अग्रवाल व विवेक अधिकारी ने अपनी आरम्भिक शिक्षा इसी विद्यालय में प्राप्त की व बारहवीं के परीक्षा परिणाम से अपने परिवार विद्यालय के साथ-साथ समस्त जनपद को गौरवान्वित किया। इसी क्रम में कल घोषित जेईई के परिणाम में क्रमशः 98.8 प्रतिशत व 95 प्रतिशत प्राप्तांक लाकर छात्रों ने समस्त विद्यालय परिवार को हर्ष का अनुभव कराया। इस अवसर पर विद्यालय की प्रधानाचार्य कृति शर्मा ने छात्रों को बधाई देते हुए उनके उज्जवल भविष्य की कामना की। छात्रों ने अपनी इस सफलता का श्रेय अपने माता-पिता व वृन्दावन पब्लिक स्कूल के छात्रों को दिया। विद्यालय के शिक्षक शिक्षिकाओं ने उनके शैक्षिक करियर सुनहरे भविष्य के लिए शुभकामनाएं प्रेषित की।

बड़ी तरकीब से निकाला कुऐ से बिल्लो मौसी को

मथुरा। हम बचपन से सुनते आऐ हैं बिल्ली को मौसी और बंदर को मामा कहते हुए। यह तो पता नहीं कि बिल्ली और बंदर को मामा और मौसी का दर्जा क्यों मिला है किंतु एक बार हमने एक बिल्लो मौसी को कुएं से बड़े जतन से बाहर निकाला यह किस्सा है तो बहुत पुराना किंतु बड़ा रोचक है।
     दरअसल मुझे कुऐ से बिल्ली को निकालने की बात फेसबुक पर चलाने की उचंग इसलिए सूझी कि पिछले कई दिन पूर्व मैंने राजस्थान की एक घटना अखबार में पढ़ी जिसमें तीन चार वर्ष का एक बालक समर्सिबल के बोरिंग में गिर गया और पूरा दिन बीत जाने के बाद भी सरकारी तंत्र उसे निकालने में विफल रहा किंतु उस बालक के पिता जो निपट अनपढ़ और सीधे-साधे व्यक्ति थे, इसके बावजूद उन्होंने अपनी देहाती तरकीब से बच्चे को बाहर निकाल लिया।
     बच्चे के पिता ने तीन पाइपों को रस्सी में पिरो कर जमीन के अंदर डाला और पता नहीं कौन सी तिकड़म इस्तेमाल की और बच्चा बाहर आ गया। न तो मुझे यह ध्यान है कि राजस्थान के कौन से जिले का मामला था और ना ही यह ध्यान कि उस देहाती किंतु वैज्ञानिक मस्तिक वाले पिता का नाम क्या था किंतु मुझे अपनी कारिस्तानी याद है जो शायद बीस पच्चीस साल पुरानीं है।
     हमारे घर के पिछवाड़े में सिंधी धर्मशाला है। उसके अंदर एक सूखा कुआ था। उस कुऐ में एक बिल्ली गिर गई और कई दिन से म्याऊं म्याऊं चिल्ला रही थी। धर्मशाला के लोगों ने मुझसे संपर्क किया तथा कहा कि इसे कैसे भी निकलवाओ वर्ना बिल्ली के मरने का पाप हम लोगों पर चढ़ेगा। कहते हैं कि बिल्ली की भूल चूक में भी मौत हो जाय तो उसकी हत्या का पाप बड़ा भयंकर होता है और उससे मुक्त होने के लिए सोने की एक बिल्ली बनवाकर दान करनी पड़ती है।
     जैसे ही मुझे बिल्ली के कुऐ में गिरने वाली इस बात का पता चला तो मैं अपने कर्मचारियों को लेकर पहुंच गया। चूंकि कुऐ में उतरने चढ़ने का कोई साधन नहीं था, इसलिए हमने एक डलिया को तीन ओर से रस्सी से बांधा और उसे यह सोच कर नींचे उतारा कि बिल्ली उसमें बैठ जायगी और हम उसे ऊपर खींच लेंगे। किंतु हमारा यह सोचना गलत रहा गहरे कुऐ में जब हमने डलिया को उतारा और बड़ी टॉर्च की रोशनी में देखते रहे कि जैसे ही बिल्ली डलिया में बैठेगी हम तुरंत उसे खींच लेंगे, लेकिन प्रयोग असफल रहा यानीं कि बिल्ली डलिया में आई ही नहीं।
     इसके बाद फिर दूसरी तरकीब लगाई। डलिया में दूध का कटोरा रखकर उतारा ताकि जब बिल्ली दूध पीने को डलिया में चढ़ेगी तब हम उसे खींचकर निकाल लेंगे। हमारी यह तरकीब भी फेल हो गई क्योंकि बिल्ली दूध पीने को तो डलिया में चढ़ गई किंतु जब हम उसे ऊपर खींचते तो झट से नींचे कूद जाती। माथापच्ची करते करते कई घंटे बीत गए किंतु सफलता नहीं मिली शाम हो गई और हम हार झक मार कर लौट आऐ किंतु मुझे चैन नहीं और बार-बार दिमाग कुऐ और बिल्ली में लगा रहा। मैं बार-बार भगवान से प्रार्थना करता रहा कि हे प्रभु कैसे भी इस बिल्ली को बाहर निकलवाओ वर्ना यह तो मरेगी जो मरेगी इसके वियोग में भले ही मैं मरूंगा तो नहीं पर अधमरा जरूर हो जाऊंगा।
     खैर मेरी प्रार्थना भगवान ने सुन ली और एक जबरदस्त युक्ति उन्होंने ऊपर से छोड़ दी जो मेरे दिमाग में आकर बैठ गई। मैंने एक टाट की बड़ी बोरी तथा लोहे की एक लंबी सरिया ली, और उस सरिया को गोलाई में मोड़कर बोरी के किनाठे पर सिल दिया। इसके बाद डलिया की तरह उसे तीन ओर से रस्सी द्वारा बांध दिया तथा बोरी की तली में चौड़े से कटोरे में दूध रख दिया फिर उसे धीरे-धीरे कुऐ में उतारा। जैसे ही बोरी जमीन से लगी तो दूध का कटोरा भी जमीन पर टिक गया तथा और ढील देने पर लोहे की सरिया का घेरा भी उसी तरह जमीन पर टिक गया।
     यह सब नजारा हम लोग टाॅर्च की रोशनी में बड़ी उत्सुकता और व्यग्रता से देख रहे थे। जैसे ही सरिया का बजनी हिस्सा जमीन पर टिका तो दूध का कटोरा भी चमकने लगा और बिल्ली उसे पीने लगी। बस इसी क्षण का तो इंतजार था, खट से हमने रस्सी को ऊपर खींच लिया और बिल्लो मौसी बोरी में कैद करके बाहर निकाल लीं गईं। जैसे ही बिल्लो मौसी कुऐ से बाहर निकलीं वहां मौजूद काफी सारे लोग हर्षित हो उठे तथा तालियां बजने लगीं। यह क्षण मेरे लिए कितनी खुशी लेकर आया होगा इसकी कल्पना की जा सकती है।
     बिल्ली से जुड़ी दूसरी घटना और बताता हूं। यह भी शायद पन्द्रह बीस वर्ष पुरानीं होगी। एक बार एक बिल्ली भिवानी वाली धर्मशाला के सूखे कुऐ में गिर गई लोगों ने मुझे सूचित किया कुआ बहुत गहरा था किंतु अच्छी बात यह थी कि उसमें उतरने चढ़ने के लिए लोहे की सीढ़ियां थीं। मेरी तो हिम्मत इतनीं थी नहीं कि खुद कुऐ में उतर जाऊं किंतु निकट में गोपालपुरा के एक युवक को इस कार्य के लिए भरपूर मेहनताना देकर तैयार कर लिया। वह युवक टाट की एक बोरी लेकर कुऐ में उतरा तथा अपने जतन से बिल्ली को उसमें कैद करके बाहर ले आया।
     लगे हाथ बिल्लो मौसी से जुड़ी इसी दरमियान की तीसरी घटना भी बताए बगैर नहीं रहा जा रहा है। भिवानी वाली धर्मशाला में ही सड़क किनारे एक बड़ा हाल लुमा गैरेज था जिसमें आगरा होटल के मालिक स्व. रजनीं दत्ता की कार खड़ी होती थी। कार के साथ-साथ होटल का कबाड़ा भी उसी गैरेज में भरा जाता था। कबाड़े का ढेर हाथी से कुछ ही कम ऊंचाई का था। एक बार एक बिल्ली गैरेज में घुसकर कबाड़े में दुबक गई। रजनीं बाबू ने अपनी कार को कुछ दिन तक बाहर नहीं निकाला और गैरेज बंद रहा, तो बिल्ली की म्याऊं म्याऊं से आसपास के लोगों का ध्यान खिंचा और वे मेरे पास आऐ। मैंने तुरंत रजनीं बाबू के पास संदेश भिजवाया वे बहुत भले इंसान थे अतः तुरंत भागे भागे आये। मैंने अपने कर्मचारियों से बिल्ली को निकलवाने की कोशिश की किंतु बिल्ली बाहर नहीं आई।
     फिर हमने दूसरी तरकीब इस्तेमाल की यानीं कि उस पूरे कबाड़े को उठा उठा कर दूसरी ओर रखा ताकि बिल्ली निकल आये किंतु घंटों की मशक्कत बेकार गई क्योंकि बिल्ली एक ढेर में से निकल कर दूसरे ढेर में घुस गई। मुझे बड़ी कोफ्त हुई किंतु में भी बिल्ली से हार मानने वाला कहां था। मैंने मन ही मन सोचा कि देखता हूं तू जीतती है या मैं? इसके बाद हम सब लोगों ने पूरे कवाड़े को बाहर सड़क पर निकालकर पटकना शुरू कर दिया। करीब एक घंटे की मशक्कत के बाद कबाड़ा जैसे ही अंतिम चरण में पहुंचा और बिल्ली के छुपने की कोई गुंजाइश नहीं रही तो फिर वह क्षण भर में छलांग लगाकर सड़क पर भाग गई और जीत का सेहरा हमारे माथे बंधा।
     एक बार ऐसा भी हुआ कि मुझे एक बिल्ली को पकड़ कर न सिर्फ उसकी पिटाई करनी पड़ी बल्कि बोरे में बंद करके यमुना के उस पार जंगल में छुड़वाना पड़ा। दरअसल एक बिल्ली हमारे यहां पल रहे एक दो अपाहिज कबूतरों की हत्या कर बैठी। मुझे यह बड़ा नागवार गुजरा। मैंने उसे बड़ी मुश्किल से कई लोगों की मदद से पकड़कर एक बोरी में बंद करके न सिर्फ उसकी पिटाई की बल्कि पल्लीपार जंगल में छुड़वा दिया।
     भले ही बिल्ली ने कबूतरों की हत्या अपने स्वभावानुसार की क्योंकि बिल्ली का तो जन्मजात स्वभाव ही यह होता है। वह अपना मूल स्वभाव नहीं छोड़ सकती ठीक उसी प्रकार मेरा भी बचपन से जो स्वभाव है उसे मैं कैसे छोड़ सकता हूं? मैं अपने मूल स्वभाव को बिल्ली वाले स्वभाव से बड़ा मानता हूं क्योंकि कहते हैं कि “मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है” अतः हम सभी को मारने वाली नींच श्रेणीं का नहीं बचाने वाली श्रेष्ठ श्रेणीं का बनना चाहिए क्योंकि हम बिल्ली नहीं इंसान हैं।

विजय गुप्ता की कलम से