मथुरा। बात बीस पच्चीस साल पुरानीं है। उस समय जिला अस्पताल में पीने के पानीं का घोर संकट था। अस्पताल में जितनी भी बोरिंग होतीं सभी खारे पानीं की निकलतीं उस समय मुख्य चिकित्सा अधिकारी भगवान सहाय कुलश्रेष्ठ थे। वे पानीं की समस्या को लेकर बहुत परेशान रहते।
एक दिन मेरी और उनकी बातचीत चल रही थी, मैंने उनसे कहा कि सी.एम.ओ. साहब मेरे कहने से एक प्रयास और करो। वे बोले कि वह क्या? इस पर मैंने कहा कि पहले प्रतिज्ञा करो की यदि अस्पताल परिसर में नई बोरिंग कराई जाय और उसमें मीठा पानीं निकले तथा पीने के पानीं की समस्या का समाधान हो जाए तो जिला अस्पताल के प्रांगण में सत्यनारायण भगवान की कथा कराई जाएगी तथा पूरा स्टाफ, डॉक्टर, व अधिकारी यहां तक कि मरीज वगैरा सभी बैठकर इसका श्रवण करेंगे और अंत में पंजीरी का प्रसाद व पंचामृत वितरित होगा।
सी.एम.ओ. साहब तुरंत तैयार हो गये। ठेकेदार को बुलाया गया और अस्पताल परिसर में एक उचित स्थान का चयन करके बोरिंग की शुरुआत भी आनन फानन में हो गई दो तीन दिन बाद जब पानीं तक बोरिंग पहुंची और मोटर लगवाकर चालू कराया तो सभी लोग हतप्रत रह गये, यानी कि पानीं एकदम मीठा निकला। पूरे अस्पताल में मीठे पानी की किल्लत काफूर हो गई और सभी लोग बेहद खुश।
यह तो हुआ भगवान सत्यनारायण की कृपा का चमत्कार और अब आगे की बात सुनो। मैंने सी.एम.ओ. साहब से कहा कि अब अपना वादा पूरा करो तथा जल्दी से जल्दी अस्पताल प्रांगण में सत्यनारायण भगवान की कथा कराओ। किंतु दुर्भाग्य की बात यह रही कि डॉक्टर कुलश्रेष्ठ अपने राजकाज में ऐसे व्यस्त रहे कि उन्होंने अपने वादे को अनदेखा कर दिया।
अब और भी बुरी बात सुनो वह यह कि कुछ महीने बाद बोरिंग के पानीं का स्वाद बदल गया और बजाय मीठे के अन्य बोरिंगों की तरह खारी हो गया। सब लोग दुःखी हुऐ तथा कुछ दिन में डॉक्टर कुलश्रेष्ठ का भी यहां से ट्रांसफर हो गया। निष्कर्ष की बात यह है कि ईश्वरीय शक्तियों के साथ वादा खिलाफी यानी जो वचन दिया जाता है, मनोकामना पूर्ण होने के बाद उसे जरूर पूरा करना चाहिए वर्ना नतीजा बुरा होता है।