Friday, January 2, 2026
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आपको ना माने ताके बाप को ना माने वाले सिद्धांत ने ही नानू को शिखर तक पहुंचाया

मथुरा। आज मैं महेश पाठक जिनका उपनाम “नानू” भी है की चर्चा कर रहा हूं। इनके बारे में ज्यादा बताने की जरूरत नहीं है कि ये कौन हैं क्या हैं? सब लोग जानते हैं। पर इतना जरूर कहूंगा कि ये बड़े जीदार हैं और यारों के यार हैं। इनका सिद्धांत है “आपको ना मानें ताके बाप को ना मानें” मेरा मानना है कि इनके इसी सिद्धांत ने ही इन्हें शिखर तक पहुंचाया है। ये बड़े खुद्दार तो हैं ही किंतु वक्त आने पर खूंखार बनते भी इन्हें देर नहीं लगती लेकिन इनका यह स्वरूप भलों के लिए नहीं, उन बुरों के लिए है जो इसके पात्र होते हैं।
     भले ही ये न विधायक हैं, न सांसद हैं और ना ही मंत्री किंतु ये जो कुछ हैं उसके आगे वे लोग भी बौने नजर आते हैं, जो ये सब बने बैठे हैं। मैं इन्हें लगभग आधी शताब्दी से जानता हूं तथा करीब चार दशक से मेरी इनसे मित्रता है बल्कि यों कहा जाए कि मित्रता कम और अंतरंगता वाला स्नेह अधिक है, तो गलत नहीं होगा। इन्होंने अपने जीवन में एक से बढ़कर एक अच्छे काम किए हैं किंतु मेरी नजर में जो सबसे अच्छा काम किया वह यह है कि किसी जमाने में मथुरा को ऐसे दुर्दांत एवं खौफनाक कातिलों से भयमुक्त कराया जिनके नाम से बड़े-बड़े शातिर भी दहल जाते थे, न सिर्फ उनसे मुक्ति दिलाई बल्कि उनके भाई, पुत्र आदि परिजनों के खौफ से भी निजात दिलाई।
     भले ही ये मूंछें नहीं रखते किंतु जब बात मूछों की होती है तो फिर मुछमुंडे होते हुए भी बड़ी-बड़ी मूछों वाले मुंच्छडों की मूंछ नींची कराकर ही दम लेते हैं। इनकी यह स्थिति केवल वर्तमान की ही नहीं बल्कि उस समय से रही है जब ये किशोरावस्था में थे। अपनीं गली मोहल्ले में अपने हम उम्रों के बॉस बने रहते थे। ठसक मिजाज तो ये शुरू से ही रहे हैं जिससे मोहब्बत की बेइंतहा की और निभाई भी, ऐसे सौभाग्यशालीयों में स्वयं मैं भी हूं। लेकिन जो इनकी नजरों से गिरा वह जमीन सूंंघता या यों कहिए जमींदोज होता नजर आया। ईश्वर व पूर्वजों की इनके ऊपर ऐसी असीम कृपा है कि लगभग पांच छः दशक से यानी किशोरावस्था से लेकर अब अर्ध बुड्ढे होने तक इनका झंडा शिखर पर लहरा रहा है।
     चाहे चतुर्वेदी समाज हो या गैर चतुर्वेदी, राजनीत हो या गैर राजनीति या फिर उद्योग जगत ही क्यों न हो हर क्षेत्र के ये चैंपियन हैं। इन्हें ऑलराउंडर कहा जाए तो गलत नहीं होगा। रंगबाजी में तो ये ऐसे सुपरस्टार हैं कि बड़े-बड़े धुरंधर रंगबाज इनकी चौखट पर मत्था टेकते हैं। इनकी एक बात जो मुझे बड़ी पसंद है, वह यह कि इनके साथ कोई जरा सा भी एहसान कर दे तो फिर ये उस राई से एहसान को भी पहाड़ जैसा मानकर उसके लिए हमेशा जीजान न्यौछावर किए रहते हैं।
     सबसे ज्यादा अद्भुत बात यह है कि मैंने मथुरा में आज तक ऐसा कोई माई का लाल नहीं देखा जिसकी शीर्ष स्तर के राष्ट्रीय नेताओं में इतनी जबरदस्त पकड़ रही हो। नरसिम्हा राव, राजीव गांधी तो इनके बेहद करीबी थे‌। राष्ट्रीय स्तर को छोड़िए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विदेशी राजदूतों से लेकर राष्ट्राध्यक्षों तक इनकी उठक बैठक ही नहीं बल्कि शादी समारोह में आना जाना भी है। न सिर्फ चतुर्वेदी समाज अपितु समूचे मथुरा के लिए यह गौरव की बात है। महेश पाठक के चेहरे पर लालिमा भी बेमिसाल है। जिस प्रकार फिल्म अभिनेत्री रेखा व हेमा ने उम्र को गच्चा दिया, उसी प्रकार महेश पाठक भी उम्र को बच्चा दे रहे हैं। उल्लेखनींय है कि महेश पाठक दो दशक पूर्व भी कांग्रेस की टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ चुके थे। उस दौरान उनके प्रचार के लिए सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी मथुरा आए और उन्होंने के.आर. इंटर कॉलेज मैदान पर बड़ी जनसभा की। उस समय सोनिया, प्रियंका और राहुल के आगमन पर जो भीड़ एकत्रित हुई थी वह इतनी विशाल थी कि एक बार तो ऐसा लगा कि ये जीत रहे हैं किंतु इन्हें जीत नहीं हार का हार पहनने को मिला। ठीक है यही हार उन्हें पिछले लोकसभा चुनावों में हेमा मालिनी ने पहना दिया।
     हेमा मालिनी से हारने की झुंझलाहट इन्होंने पिछले वर्ष ऐसी निकाली कि वह भी मिसमिसा कर रह गईं। दरअसल हेमा मालिनी ने विश्राम घाट के सामने यमुना पर एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन रखा जिसमें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का बतौर मुख्य अतिथि आना भी तय हो गया किंतु महेश पाठक ने चैलेंज कर दिया कि इस आयोजन को होने ही नहीं दूंगा। उनका कुपित होना स्वाभाविक भी था क्योंकि एक तो ये उनसे हार चुके थे दूसरे विश्राम घाट चौबों का गढ़ है और विश्राम घाट के सामने यमुनापार जहां यह आयोजन होना था वह स्थान भी चतुर्वेदी समाज का है। महेश पाठक ने ऐसे तुरुप के इक्के चले कि न सिर्फ मुख्यमंत्री ने अपना आना रद्द किया बल्कि हेमा मालिनी को भी कार्यक्रम करने का विचार त्यागना पड़ा।
     अब मैं अपने से जुड़े इनके कुछ रोचक किस्से बताता हूं, बात लगभग 25-30 वर्ष पुरानीं है। एक बार इन्होंने दिल्ली में एक डिनर पार्टी दी जिसमें मुझे भी बुलाया, इनके अति निकटस्थ नवीन नागर जी मुझे अपने साथ लेकर गए। डिनर पार्टी में देश ही नहीं विदेशों तक की बड़ी-बड़ी हस्तियां मौजूद थीं, जिनमें तमाम राजनेताओं से लेकर फिल्मी हस्तियां भी शामिल हुई हेमा मालिनी जिनसे ये हारे थे, वे भी थीं। उस पार्टी में मैंने एक ऐसी मोटी, ताजी, लंबी, चौड़ी विदेशी महिला देखी जिसे देखकर मैं चौंक गया क्योंकि मैंने अपने जीवन में ऐसी तगड़ी महिला कभी नहीं देखी थी। मैंने जिज्ञासावश पता किया कि ये कौन हैं? तो पता चला कि वे उस समय के मौजूदा संयुक्त राष्ट्र संघ महासचिव की मैम साहब थीं। खैर इस बात से क्या लेना देना, अब मैं आगे बढ़ता हूं मतलब की बात पर। डिनर पार्टी में खानपान हर प्रकार का था। यानी जिसको जो खाना है खाओ, जो पीना हो पियो पाठक जी किसी वी.वी.आई.पी. के पीछे नहीं लग रहे थे। बस प्रवेश वाली जगह पर खड़े होकर उनका हाय हलो का सिलसिला चल रहा था। मुझे उन्होंने अपनी बगल में खड़ा कर लिया और बोले कि आओ गुप्ता जी आप मेरे साथ रहो कहां भटकते फिरोगे।
     मेरे पेट में चूहे उछल कूद मचा रहे थे और ऐसे खान-पान भले ही वह दोनों तरह का रहा हो, वाली जगह पर तो मुझे खड़े होना भी अखर रहा था। कुछ समय तो मैंने संयम बरता और जब धैर्य जवाब दे गया तो मैंने अपने अंदर का जहर मुंह से निकाल ही डाला तथा कई लोगों के सामने उनसे कहा कि तुम कैसे मथुरा के चौबे हो जो ऐसा आसुरी खानपान लोगों को खिलावा रहे हो। इस पर पाठक जी ने धैर्य से कहा कि गुप्ता जी आप जैसों की व्यवस्था तो अलग है। मैं देखा कि भाड़ में गई अलग व्यवस्था में तो यहां का पानीं तक नहीं पिऊंगा।
     मेरा यह कहना था कि बगल में खड़े पाठक जी के खासम खास और हमारे प्रिय मित्र नवीन नागर जी अपने पैर से मेरे पैर को जोर-जोर से दबाकर कहने लगे कि “अरे मान्यवर जे का कह रहे हौ” यह डायलॉग उनके मुंह से कई बार निकला। मैंने उन्हें रोककर कहा कि नागर जी तुम बीच में मत बोलो मुझे अपनी बात तो कहने दो। इसके कुछ क्षण बाद पाठक जी मुझसे बड़ी तसल्ली के साथ बोले कि गुप्ता जी बात तो आपकी सही है किंतु यदि मैं ऐसा नहीं करूंगा तो फिर यहां कोई नहीं आएगा। बात उनकी अपनी जगह सोलह आने सच थी किंतु में भी तो अपने विचार और स्वभाव को नहीं छोड़ सकता। हालांकि पाठक जी स्वयं कुछ भी नहीं खा पी रहे थे सिर्फ लोगों का साथ देने के लिए कभी ककड़ी और कभी खीरे का एकाध टुकड़ा मुंह में डाल लेते। बाद में जब रात्रि गहराने लगी तो मैंने कहा कि अब तो मुझे मुक्त करो। इस पर वे बोले कि अगर थोड़ी देर और रुको तो फिर मेरे साथ घर चलना तथा घीया का साग और सूखी रोटी खाना। खैर मैंने उनसे विदा ली और नागर जी ने दिल्ली के बाहर आकर गोवर्धन होटल पर मुझे शुद्ध शाकाहारी भोजन कराया।
     एक और रोचक किस्सा भी बताता हूं, बात लगभग बीस वर्ष पुरानीं है। मुंबई में हमारी एक बड़ी बहन रहती हैं उनका स्वास्थ्य ज्यादा खराब हुआ तथा ऑपरेशन भी कराना पड़ गया। जिस अस्पताल में इलाज चल रहा था, वह रिलायंस वालों का था। नाम मुझे याद नहीं हमारे बहनोई ने कहा कि तुम्हारी तो रिलायंस के मालिक धीरूभाई अंबानी के खास दीनानाथ चतुर्वेदी जी से अच्छी जान पहचान है। यदि हो सके तो अस्पताल में कुछ डिस्काउंट करादो क्योंकि मोटी रकम खर्च हो चुकी है और इस समय हाथ थोड़ा टाइट चल रहा है।
     मैंने दीनानाथ जी को फोन करके वस्तु स्थिति से अवगत कराया। दीनानाथ जी ने अस्पताल के संचालक केतन भाई सेठ से बात की, बात करने के बाद दीनानाथ जी ने मुझे बताया कि यह कार्य असंभव है क्योंकि तुम्हारी बहन प्राइवेट रूम में हैं और जो मरीज प्राइवेट रूम में होते हैं उनके साथ रियायत करने का कोई प्रावधान नहीं है। बात तो उनकी अपनी जगह सही थी किंतु मैंने अपने बहनोई को भरोसा दिला दिया था कि आप चिंता न करें मैं दीनानाथ जी से सिफारिश लगवाकर काम करा दूंगा। दीनानाथ जी कोई छोटे मोटे आदमी नहीं हैं। धीरूभाई को बड़ा आदमी बनाने में उनका सबसे ज्यादा योगदान था क्योंकि वे रिलायंस ग्रुप के चार्टर्ड अकाउंटेंट थे और धीरूभाई के खासम खास भी। मैंने खुद अपनी आंखों से अपने घर के बराबर गिरधर मोरारी गेस्ट हाउस जो दीनानाथ जी का है, के बाहर सड़क पर बने चबूतरे पर धीरुभाई को गोल तकिया यानी मसनद लगाकर आराम करते देखा है तथा धीरुभाई की पत्रकार वार्ता भी की जब उन्होंने गिरधर मोरारी गेस्ट हाउस में निशुल्क नेत्र शिविर लगवाया था। इन बातों को करीब चालीस वर्ष हो गए।
     अब जब दीनानाथ जी जैसी हस्ती ने भी हाथ खड़े कर दिए तो मुझे अपने मित्र महेश पाठक की याद आई। मैंने सुन रखा था कि बम्बई में भी इनके बड़े जलवे हैं। मुख्यमंत्री तक इनकी बात टाल नहीं पाते यानी रंग रुतवा तगड़ा है। मैंने सोचा कि परीक्षण कर लिया जाए शायद कोई बात बन जाए और मेरी बात भी रह जाय। मैंने महेश भाई को फोन करके सारी बात बताई, वे बोले कि तुम चिंता मत करो मैं बात करता हूं। इसके बाद इन्होंने किसी से बात की और कहा कि तुम अपने बहनोई को अस्पताल भेज देना काम हो जायगा। महेश पाठक का ऐसा रुतबा रहा कि उस समय लगभग तीस पैंतीस हजार रुपए बकाया थे। अस्पताल वालों ने पूरे पैसे माफ ही नहीं किए बल्कि बड़ी इज्जत दी और कहा कि भाई आखिर कौन सी हस्ती से सिफारिश लगवाई जो सारे नियम ताक पर रखे रह गए और पूरे पैसे माफ हो गए।
     अंत में मेरे प्रति महेश पाठक की बेइंतहा मोहब्बत की एक और छोटी सी बानगी से रूबरू कराता हूं। बात उन दिनों की है जब बलराम जाखड़ लोकसभा अध्यक्ष थे तथा महेश पाठक के यहां इनके पुत्र की शादी में ए.टी.वी. नगर में आए हुए थे। जब वे विदा होने को थे तो पाठक जी उन्हें बाहर तक छोड़ने आए भीड़ बहुत थी। मैं भीड़ से अलग हटकर काफी दूर एक पेड़ के नींचे जाकर खड़ा हो गया। रात्रि का समय था किंतु महेश पाठक की पैनीं नजरों ने मुझे ताड़ लिया और हाथ ऊपर करके जोर जोर से चिल्लाने लगे गुप्ता जी, गुप्ता जी, गुप्ता जी इधर आओ वहां क्यों खड़े हो बलराम जाखड़ व अन्य सभी बड़े विस्मय से मेरी तरफ देखने लगे। इसके बाद मैं उनके पास पहुंचा तो पाठक जी ने मेरा परिचय कराया कि ये आज अखबार के पत्रकार हैं तथा मेरे परम मित्र हैं। जाखड़ जी बोले कि बड़ा अच्छा लगा आपके परम मित्र से मिलकर और उन्होंने मुझे बड़ा सम्मान दिया।
     अंत में अपने मन की एक बात कहे बगैर रहा नहीं जा रहा, वह यह कि अच्छा हुआ महेश पाठक दोनों बार सांसदी का चुनाव हार गए यदि जीत जाते तो गैर चौबों की शामत आ जाती। इस बात को तो सभी जानते हैं कि चौबे और वे भी मथुरा के बड़े बहादुर होते हैं। यदि खुदा न खास्ता महेश भाई संसद सदस्य बन गए होते तो गैर चौबों में सबसे ज्यादा कचूमर बनियों का ही निकलता। इस बात को भी सभी अच्छी तरह जानते हैं कि ज्यादातर बनियां जन्म से ही डरपोक होते हैं। सैकड़ों में नहीं हजारों में बल्कि यों कहा जाए कि लाखों में ही एकाथ बनियां राजा रविकांत जैसे जीदार होते हैं, जो डिप्टी एस.पी. तक का गिरेबान पकड़कर दीवाल में दे मारने की कुब्बत रखते हैं। भगवान का लाख-लाख शुक्रिया जो उन्होंने नानू भाई को संसद में नहीं पहुंचाया वर्ना मुझ जैसे पता नहीं कितने बेचारे कब्रिस्तान क्षमा करना कब्रिस्तान नहीं शमशान पहुंच जाते।
महेश पाठक का संपर्क नंबर #9821210465

विजय गुप्ता की कलम से

आग लगै ऐसी जा निगोड़ी होरी में

मथुरा। कुछ राक्षसी वृत्ति के लोगों द्वारा होली के इस पवित्र त्यौहार का ऐसा विकृत स्वरूप बना दिया है, जिससे मेरे मन में होली के नाम पर होने वाले इन पैशाचिक कृत्यों को देख देख कर आग सी लग जाती है।
     बचपन से सुनते आ रहे हैं कि होली आपसी प्रेम और सौहार्द बढ़ाने का त्यौहार है। इस दिन लोग अपनी दुश्मनीं को भूल कर एक दूसरे के गले मिलकर गिले-शिकवे दूर करते हैं, किंतु स्थिति इससे एकदम उलट है। दुश्मनीयां दूर होना तो बहुत दूर की बात है बल्कि होली के त्यौहार पर दुश्मनीयां बनती हैं तथा पूरे भारत में होली के हुड़दंग के नाम पर अनेक लोग घायल होते हैं तथा बहुत से मर भी जाते हैं।
     हालांकि होली का त्योहार अब निकल चुका है पर अगली बार फिर आएगा और फिर वही नींचता का नंगा नाच होगा। यह सब बताने की जरूरत नहीं कि होली के नाम पर क्या-क्या नींचतायें होती हैं। भले लोगों और बहन बेटियों का तो घर से निकलना भी दुश्वार हो जाता है। ऐसा लगता है कि होली के नाम पर इन चांडालों को अपनी हैवानियत दिखाने का लाइसेंस मिल जाता है। शराब पी पीकर जो नंगा नाच करते हैं वह किसी से छिपा नहीं है। होली के नाम पर जो कुछ हो रहा है यदि इसी को होली कहते हैं तो फिर मुझे भी यह कहने में जरा भी संकोच नहीं कि ” आग लगै ऐसी जा निगोड़ी होली में” इससे तो अच्छा यह है कि होली का त्योहार ही मनाना बंद कर दिया जाय। होली का त्योहार मनाना बंद करने वाली बात तो सिर्फ कपोल कल्पित है। होली मनाना तो कभी बंद होगा नहीं और ना ही होना चाहिए। यह तो सिर्फ मेरी भड़ास निकालने वाली बात है।
     अब फिर कैसे इन पिशाचों के कृत्यों से छुटकारा मिले? जहां तक मैं समझता हूं पूरी तरह छुटकारा तो शायद कभी नहीं मिलेगा क्योंकि कलयुग में नींचों की पौ बारह होती है। यह सब कुछ हमारे धर्म शास्त्रों में उल्लखित है। हमारे पिताजी कहते थे कि सबसे बड़े चार त्योहार हैं। दिवाली, होली, रक्षाबंधन और दशहरा। दिवाली वैश्यों, रक्षाबंधन विप्रो, दशहरा क्षत्रियों तथा होली शूद्रों के अधिक प्रिय होते हैं। वैसे तो चारों वर्ण ही सभी चारों त्योहारों को मनाते हैं किंतु जिस प्रकार पूर्वजों ने इन चारों त्योहारों की चारों वर्णों में व्याख्या की है वह अपने आप में सटीक है। खैर जो भी है ईश्वर की इच्छा किंतु इतना जरूर कहूंगा कि आंख मूंदकर इन नींचों की नींचता को सहने के बजाय जिसकी जितनीं क्षमता हो उसके अनुरूप नींचताओं का प्रतिरोध करें। भले ही थोड़ा बहुत खामियाजा भुगत लें पर प्रतिरोध करने में पीछे नहीं रहें।
     यह बात मैं सिर्फ कह नहीं रहा हूं बल्कि अपने विचारों का अनुसरण प्रैक्टिकल में भी करता हूं। हमारे नलकूप (घर) के आसपास मजाल है कि कोई उपद्रवी निम्न स्तरीय हरकत कर जाय। यह परंपरा मैं कई दशकों से निभा रहा हूं इस चक्कर में कई बार उपद्रवियों को उनकी औकात समझानी पड़ी यहां तक कि पुलिस को भी बुलाना पड़ा। जिसका जितना सामर्थ हो वह अपनीं क्षमतानुसार इन दुष्टों का विरोध करते रहें यह पुण्यात्मक कार्य होगा। मेरे तो यही विचार हैं बाकी जो ईश्वर इच्छा, हो सकता है कुछ राक्षसी विचारधारा वालों को मेरी बात नागवार गुजरे।

विजय गुप्ता की कलम से

वृन्दावन पब्लिक स्कूल में रही होली की धूम

सामाजिक समरसता, भाईचारा और सौहार्द का प्रतीक है होली-डाॅ ओमजी

वृंदावन। मथुरा मार्ग स्थित वृन्दावन पब्लिक स्कूल में शनिवार को होली उत्सव का आयोजन बड़े ही हर्षोल्लास के साथ किया गया। जिसमें शिक्षक शिक्षिकाओं के साथ साथ विद्यालयी छात्र-छात्राओं ने भी ब्रज के इस जग प्रसिद्ध महोत्सव को मनाया एवं वरिष्ठों का आशीर्वाद प्राप्त किया।
उत्सव का शुभारम्भ विद्यालय के निदेशक डाॅ ओम जी एवं सह निदेशिका निधि शर्मा ने माँ सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्जवलन एवं माल्यार्पण कर किया। इसके बाद सभी छात्र-छात्राओं ने अपने वरिष्ठ गुरुजनों एवं सहपाठियों को अबीर गुलाल लगाकर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। इस दौरान छात्र-छात्राओं ने विभिन्न सांस्कृतिक एवं रंगारंग कार्यक्रमों के बीच जमकर आनन्द लाभ लिया।
विद्यालय निदेशक डाॅ ओम जी ने कहा कि ब्रज के प्रसिद्ध रंगों के इस पावन पर्व की वास्तविकता से नई पीढ़ी अनभिज्ञ होती जा रही है। रंगों के इस पवित्र त्योहार का वास्तविक ध्येय सामाजिक समरसता, भाईचारा एवं सौहार्द से ओतप्रोत वातावरण समाज में बनाए रखना है। सह निदेशिका निधि शर्मा ने कहा कि रंगों के पर्व होली से हमें एकता की सीख लेनी चाहिए।
इस अवसर पर प्रधानाचार्य कृति शर्मा, पुण्यप्रकाश शर्मा, स्वेका राज, सपना शर्मा, दिशि गोस्वामी, अंजना शर्मा, हेमलता वर्मा, सुकुमार गोस्वामी, आदित्य शर्मा, अशोक सैनी, पंकज, मेघा शर्मा, शालू शर्मा, राजीव कुमार चतुर्वेदी, तरुण शर्मा, ललित शर्मा आदि उपस्थित रहे।

जब दूरदर्शन पर मैंने गाना गाया

   मथुरा। बात उन दिनों की है जब मैं लगभग चौदह पंद्रह वर्ष की उम्र का था। इस घटना को बीते लगभग पचपन वर्ष हो गये होंगे। उन दिनों दूरदर्शन का चलन प्रचलन दूर दूर तक नहीं था केवल आविष्कार हो चुका था। हम सुनते थे कि विदेश में एक ऐसा रेडियो चला है जिसमें लोग चलते फिरते दिखाई देते हैं।
     उस दिनों मैं कलकत्ता में अपनी बड़ी बहन गीता देवी के पास रहता था। एक दिन वह बोलीं कि केशव तू घर में बैठे-बैठे बोर हो रहा है जा बिरला म्यूजियम चला जा वहां देखने लायक बड़ी अच्छी अच्छी चीजें हैं किट्टी को भी ले जा। केशव मेरा घरेलू नाम है तथा किट्टी यानी कविता जो मेरी भांजी है उस समय शायद तीन चार साल की होगी।
     जीजी के कहने के बाद मैं अपनी भांजी किट्टी को लेकर ट्राम से बिरला म्यूजियम जा पहुंचा। घर से बिरला म्यूजियम पहुंचने में बमुश्किल आधा घन्टा भी नहीं लगा होगा क्योंकि बालीगंज में ही जीजी का घर था और बालीगंज में ही बिरला म्यूजियम। दोनों में फासला ज्यादा था किन्तु ट्राम से पहुंचने में कितनी देर लगती है।
     मैंने चार आने की टिकट खरीदी और अन्दर चला गया। अन्दर जाकर देखा कि अन्य आश्चर्यजनक वस्तुओं के अलावा सबसे ज्यादा आश्चर्यजनक या चमत्कारिक चीज यह थी कि वह रेडियो भी था जिसकी चर्चा हम बचपन से सुनते आए थे। प्रथम तल पर एक छोटा सा स्टूडियो था तथा पूरे म्यूजियम में चलते फिरते लोग देखने वाले रेडियो लगे थे जिन्हें अब हम टीवी कहते हैं और उससे पहले टेलीविजन का उच्चारण किया जाता था। उस स्टूडियो पर दीवाल की जगह शीशा लगा हुआ था ताकि अन्दर का सारा नजारा बाहर से भी दिखाई देता रहे।
     वहां काफी भीड़ लगी हुई थी स्टूडियो में सिर्फ कर्मचारियों की चहल पहल चल रही थी वह म्यूजियम में लगे टीवी सेटों पर दिखाई दे रही थी। मध्य में एक खाली कुर्सी भी रखी हुई थी। मुझे चलते फिरते अन्य लोगों की भांति अपनी शक्ल को भी चमकाने की ललक लगी। मैंने अपनी भांजी को तो गेट के बाहर बैठा दिया तथा खुद अन्दर घुस गया। वहां पर कर्मचारियों से कहा कि मुझे भी अपनी सूरत रेडियो में दिखानीं है। कर्मचारी बोले कि कुछ गाना गा सकते हो? इस पर मैंने कहा कि गा दूंगा।
     इसके बाद उन्होंने कहा कि अच्छा इस कुर्सी पर बैठ जाओ और गाना गाओ उनके कहते ही मैं जा बैठा कुर्सी पर। मुझे गाना वाना तो आता नहीं था किन्तु एक कविता जो बचपन में अमर उजाला में इतवार के दिन ‘बाल वाटिका’ स्तंभ में पढ़ी थी उसकी कुछ लाइनें याद थीं। उसी कविता की पंक्तियों को मैंने अपनी अनूठी आवाज में गा दिया। आवाज मेरी कैसी सुरीली है यह तो सभी जानते हैं। जो लाइने मैंने गाईं वे यह थीं।

“टन टन टन टन टेलीफोन
हेलो बोल रहे तुम कौन
यह तो मामा की आवाज
पेड़े लाना गिन कर चार
और साथ में हलुआ सोन
टन टन टन टन टेलीफोन”

इस गाने को गाकर मैं चुप हो गया। इस पर कर्मचारियों ने कहा कि बस इतना सा ही गाना और कुछ नहीं। मैंने कहा कि मुझे सिर्फ यही आता है।इसके बाद में बाहर निकल आया।
     बाहर निकलते ही सारी भीड़ मेरे आस पास सिमट आई और मुझे ऐसे घूर घूर कर देखने लगे जैसे मैं कोई बहुत बड़ा फिल्म स्टार हूं। मैं जिधर भी जाता भीड़ मेरे पीछे पीछे चलती और बांग्ला में कहने लगे कि “ऐई तो आछे” यानीं कि यही तो है। कोई कहता कि “ऐई छेले आछे” यानीं कि यही लड़का है। कोई कहता कि “ऐई गाच्चे” यानीं कि यही गा रहा था। इस सब तमाशे को देखकर मैं बड़ा अचम्भित हुआ और गौरवान्वित भी होने लगा तथा कुछ कुछ शर्माहट सी भी महसूस हुई।
     इसके बाद मैंने वहां और कुछ नहीं देखा तथा अपनी भांजी को गोद में उठाया और म्यूजियम से बाहर निकल लिया। मेरे बाहर निकलते ही भीड़ भी छिटक गई। घर आकर मैंने जीजी जीजाजी तथा मुझे घर में पढ़ाने हेतु आने वाले एक मास्टर साहब को भी अपनी शेखी बघारते हुए यह सारा किस्सा सुनाया। उस दिन तो मैं फूला नहीं समा रहा था फिर मैंने मथुरा में अपने घर वालों को भी पत्र लिखकर सारा किस्सा बताया क्योंकि उन दिनों मोबाइल तो थे नहीं और टेलीफोन भी जै बिल्ले लोगों तक ही सीमित था तथा बुक करा कर बात करनी पड़ती थी वह भी सिर्फ तीन मिनट और कई कई घंटो तक इंतजार भी करना पड़ता था टेलीफोन के पास बैठकर सो अलग और रुपए भी बहुत खर्च हो जाते थे।
     इस लेख को लिखने का मेरा खास मतलब दूसरा है जिसे अन्त में बता रहा हूं। वह यह है कि हम लोग सिनेमाओं में काम करने वालों को ऐसे मानते हैं जैसे कोई वो खुदा हैं। बस जिनको पर्दे पर या टी.वी. में देख लिया तो फिर उनके प्रति दीवानगी हो गई। सिनेमाओं में काम करने वाले कुछ लम्पट तो ऐसे हैं जिनकी शकल सूरत तक से मुझे घिन सी होती है। कहते हैं कि फिल्म स्टार यानीं कि सितारे। जैसे यही ध्रुव तारे की टक्कर के सितारे हों। उदाहरण मेरा ही ले लें कैसी फटे वांस जैसी आवाज में गाने की चार लाइनें गा दीं और उन लोगों ने टीवी सेटों में मुझे देख लिया तो लग गये पीछे। न अकल न शकल और ना ही किसी बात का कोई सऊर सलीका बस एक झटके में कूदकर धम्म से जा बैठे कुर्सी पर और गा दिया बेसुरी आवाज में गाना।
     मुझे तो सिनेमाओं में काम करने वालों के लिए कलाकार कहने से भी चिढ़ सी होती है। सच में पूंछा जाय तो कलाकार तो सर्कस में होते थे (अब तो सर्कस भी लोप हो गये) सर्कस में काम करने वालों की कला या करतब देखते ही ताली बजाने को हाथ खुद-ब-खुद  मचलने लगते थे। सड़क पर अपनी बाजीगरी दिखाने वाले भी मेरी नजर में कलाकार हैं। देखा जाय तो सिनेमा की इस दुनियां में जितनी ऊपरी चमक-दमक है उससे कहीं ज्यादा सीवर लाइन जैसी गंदगी भरी पड़ी है इस बात को कौन नहीं जानता?
     पुराने जमाने में तो सिनेमा में काम करने को लड़कियां ही नहीं मिलतीं थीं तथा लड़कियों का रौल लड़के ही निभाते थे। लोग अपनी बहन बेटियों को सिनेमा में काम करने को इसलिए नहीं भेजते थे क्योंकि उनका मानना था कि यह कार्य कोठे पर भेजने जैसा है। यह परंपरा तो आज भी राम लीलाओं में भी देखने को मिलती है। ऐसा भी नहीं है कि सिनेमा में काम करने वाले सभी लम्पट और लम्पटनियां हैं। कुछ अच्छे और सच्चे कलाकार भी रहे हैं लेकिन उन्हें कौन पूंछता है। ऐसों की संख्या तो शायद नगण्य है।
     मैं तो यहां तक मानता हूं कि सिनेमा में अपनी इज्जत आबरू की परवाह न करने वाली लड़कियां वैश्या से भी बदतर होती है क्योंकि वैश्या पर्दे के पीछे अपनी इज्जत बेचती है और यह पर्दे के ऊपर यानी कि चौड़े में। बल्कि यौं कहा जाय कि बेचती नहीं लुटाती हैं तो गलत नहीं होगा।
     यह बात एक बार मैंने बीस पच्चीस साल पहले वृंदावन में एक पत्रकार वार्ता के दौरान हेमा मालिनी से भी कही और उनकी प्रतिक्रिया पूंछी तो उन्होंने मुंह बनाते हुए यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि मैं अपनीं महिला साथी कलाकारों के बारे में कोई टिप्पणी नहीं करूंगी। वैसे हेमा मालिनी औरों को देखते हुए फिर भी श्रेष्ठ हैं। बात शुरू हुई मुझसे और समापन हो रहा है हेमा मालिनी से। ज्यादा बोलने की तरह ज्यादा लिखने की भी मेरी आदत है इसीलिए लेख लम्बा हो गया है अब इसे यहीं विराम देता हूं।

विजय गुप्ता की कलम से

विश्व हिन्दू परिषद की बैठक में गरजे पदाधिकारी

गोवर्धन। अखिल भारतीय विश्व हिन्दू परिषद की बैठक आन्यौर परिक्रमा मार्ग के वसुंधरा में आहुत की गई। जिसमें संगठन के महामंत्री दिनेश चंद शर्मा ने कार्यकर्ताओं में जोश भरा। महामंत्री ने कहा कि श्री कृष्ण जन्मभूमि का भव्य मंदिर निर्माण कोर्ट की सहमति से जल्द शुरू होगा। जिस प्रकार काशी विश्वनाथ में जमीन की खरीद कर निर्माण हुआ है। राम जन्मभूमि का निर्माण कोर्ट के फैसले से हुआ है। जिस प्रकार काशी, अयोध्या में भव्य मंदिर का निर्माण शांतिपूर्वक हुआ है। उसी प्रकार मथुरा में भी शांतिपूर्वक मंदिर निर्माण किया जाएगा। मथुरा श्री कृष्ण जन्मभूमि के मामले में भी जन आंदोलन की जरुरत नहीं पड़ेगी। इससे आलावा बाबर के युद्ध में जान- गवाने वाले लोगों की याद में स्मृति समारक बनाया जाएगा। अयोध्या में आज प्रतिदिन लाखों की संख्या में श्रद्धालु दर्शन करने आ रहे हैं। आगामी 17 तारीख को रामनवमी के उपलक्ष्य में राम उत्स्व मनाया जाएगा। इस अवसर पर झंडे वाले, पल्लव, अमृत आदि ने अपने अपने विचार व्यक्त किए।

रिपोर्टर – राजेश लवानिया

स्वस्थ राष्ट्र के संकल्प को पूरा करने के लिए खेलना बहुत जरूरी राजीव एकेडमी में तीन दिवसीय प्रतिस्पर्धा-2024 का समापन

मथुरा। खेलों से सिर्फ मनोरंजन ही नहीं होता बल्कि इनसे सीख भी बहुत मिलती है। खेलों से तन-मन स्वस्थ रहने के साथ ही जहां भाईचारा बढ़ता है वहीं समस्याएं सुलझाने में भी मदद मिलती है तथा लीडरशिप पैदा होती है। खेलों के माध्यम से स्वस्थ राष्ट्र के संकल्प को पूरा करने के साथ ही बेहतर करियर बनाया जा सकता है। यह बातें राजीव एकेडमी फॉर टेक्नोलॉजी एण्ड मैनेजमेंट में आयोजित तीन दिवसीय वार्षिक खेलकूद प्रतियोगिता प्रतिस्पर्धा-2024 के समापन अवसर पर संस्थान के निदेशक डॉ. अमर कुमार सक्सेना ने छात्र-छात्राओं को बताईं।
आर.के. एज्यूकेशनल ग्रुप के अध्यक्ष डॉ. रामकिशोर अग्रवाल ने अपने संदेश में कहा कि जीवन में खेलों का बहुत महत्व है। योगीराज भगवान श्रीकृष्ण ने खेल खेल में बहुत सारे संदेश दिए हैं। हम लीलाधर की लीलाओं से बहुत कुछ सीख सकते हैं। डॉ. अग्रवाल ने सभी विजेता और उप-विजेता छात्र-छात्राओं को बधाई देते हुए कहा कि हार-जीत तो होती ही रहती है। सबसे जरूरी है खिलाड़ी के भीतर खेलभावना तथा अनुशासन का होना। प्रबंध निदेशक मनोज अग्रवाल ने सभी छात्र-छात्राओं को बधाई देते हुए कहा कि खेलों से तन-मन स्वस्थ रहने के साथ ही अनुशासन की सीख मिलती है। श्री अग्रवाल ने छात्र-छात्राओं से शिक्षा के साथ कुछ समय खेलों को भी देने का आह्वान किया।
पारितोषिक वितरण समारोह में निदेशक डॉ. अमर कुमार सक्सेना ने विजेता टीमों तथा खिलाड़ियों को स्मृति-चिह्न और प्रमाण पत्र प्रदान कर उन्हें प्रोत्साहित किया। तीन दिवसीय प्रतियोगिता में वालीबाल का खिताब बीसीए चतुर्थ सेमेस्टर की टीम ने जीता। बी.ईकॉम चतुर्थ सेमेस्टर की टीम दूसरे तथा बीएससी चतुर्थ सेमेस्टर की टीम तीसरे स्थान पर रही। शतरंज में खिताबी बाजी बी.एस.सी. द्वितीय सेमेस्टर के किशन प्रताप सिंह ने मारी। बीएससी चतुर्थ सेमेस्टर के जतिन सिसोदिया दूसरे तथा बी.एड. द्वितीय वर्ष के आदित्य बंसल तृतीय स्थान पर रहे।


छात्राओं की बैडमिंटन स्पर्धा का फाइनल मुकाबला बी.एस.सी. द्वितीय सेमेस्टर की छात्राओं के मध्य हुआ जिसमें सरस्वती कुन्तल ने लक्षिता गर्ग को पराजित कर खिताब अपने नाम किया। बी.एड प्रथम वर्ष की दीप्ति आर्या को तीसरा स्थान मिला। छात्रों की बैडमिंटन स्पर्धा बी.ईकॉम चतुर्थ सेमेस्टर के पुष्कर सिंह ने जीती उन्होंने खिताबी मुकाबले में बीबीए चतुर्थ सेमेस्टर के दुष्यंत चौधरी को पराजित किया। बी.एड. प्रथम वर्ष के मुकुल शर्मा ने कांस्य पदक जीता।
टेबल टेनिस में बीबीए षष्टम सेमेस्टर के वंश मित्तल को स्वर्ण, बी.सी.ए. चतुर्थ सेमेस्टर के गौरव मेहरानियां को रजत तथा बीबीए द्वितीय सेमेस्टर के निखिल कुमार को कांस्य पदक मिला। कैरम बोर्ड में बीबीए चतुर्थ सेमेस्टर के शिवम विजेता तथा चिराग सिंह उप-विजेता रहे। कृष्णा शर्मा बीबीए चतुर्थ को तीसरा स्थान मिला। लूडो में प्रभा बी.एड. द्वितीय वर्ष पहले, नेहा चौहान बीबीए द्वितीय सेमेस्टर दूसरे तथा बी.ईकॉम चतुर्थ सेमेस्टर की नेहा मिश्रा तीसरे स्थान पर रहीं। तीन दिवसीय खेल प्रतियोगिता के सफल आयोजन में राजीव एकेडमी के शिक्षक और शिक्षिकाओं का अहम योगदान रहा।

जहाज से बम गिरने की सूचना से पुलिस में मचा हड़कंप

मौके पर पहुंची पुलिस ने मौसम विभाग का मोस्चर बताया .

नौहझील-थाना क्षेत्र के एक गांव में मौसम विभाग का मोस्चर डैमेज होकर गिर गया,जिससे ग्रामीणों में हड़कंप मच गया और जहाज से बम फेंकने की सूचना इलाका पुलिस को दी गई। सूचना मिलते ही पुलिस प्रशासन में हड़कंप मच गया और मौके पर पहुंची पुलिस फोर्स ने मौसम विभाग के डैमेज मोस्चर को बरामद किया है। जिससे देख लोगों को शांति मिली।
जानकारी अनुसार
थाना क्षेत्र के गांव पारसोली में गुरुवार की दोपहर को ग्रामीणों द्वारा पुलिस को सूचना दी गई कि गांव के हरि सरपंच के भट्टे के पास जहाज से बम फेंका गया है।बम फेंकने की सूचना से इलाका पुलिस में हड़कंप मच गया। सूचना पर इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह व बाजना चौकी प्रभारी अमित आनंद पुलिस फोर्स के साथ मौके पर पहुंच गए। जहां इलाका पुलिस ने देखा तो एक इलेक्ट्रिकल उपकरण,जिसमें लाइट जल रही थी और वहां पड़ा मिला।
बजाना चौकी प्रभारी अमित आनंद ने बताया ग्रामीणों द्वारा जहाज से बम गिराने की सूचना दी गई थी, मौके पर जाकर देखा तो मौसम विभाग का मोस्चर मीटर था। मौसम विभाग मोस्चर जानने के लिये मोस्चर गुब्बारा छोड़ा जाता है।
वहीं इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह ने बताया कि मौसम विभाग की डिवाइस थी,जो मौसम की जानकारी के लिए गुब्बारे के साथ आसमान में उड़ाई जाती है,जो कि एक बार उपयोग होने के बाद डैमेज होकर गिर जाती है।

रिपोर्टर – कपिल अग्रवाल.

रेल के डिब्बे से मेरी अटैची हो गई पार और सब कुछ लुट गया

विजय गुप्ता की कलम से

मथुरा। एक बार मैं बाल बच्चों के साथ ससुराल में होने वाली एक शादी में शामिल होने के लिए महाराष्ट्र जा रहा था कि रेल के डिब्बे से हमारी एक अटैची पार हो गई, जिसमें सोने चांदी के काफी जेवरात व नकदी रखी हुई थी। इसके अलावा अन्य बहुमूल्य सामान व जरूरी कागजात आदि थे। मेरा कलेजा धक्क रह गया किंतु कर भी क्या सकता था अतः मैंने कलेजे पर पत्थर रख लिया इसके अलावा और कोई चारा भी तो नहीं था।
     यह घटना काल्पनिक है। न कोई मेरी अटैची पार हुई और ना ही मेरा सोना चांदी नकदी वगैरह कुछ भी गया। हां इस काल्पनिक घटना के पीछे एक रोचक दास्तान है, आज उसे बताता हूं। बात लगभग तीन दशक पुरानीं है नलकूप लगवाने के कुछ समय बाद पिताजी स्वर्ग सिधार गए। पानीं भरने वालों की संख्या दिनों दिन बढ़ती जा रही थी। जब बिजली चली जाती तो बड़ी परेशानी होती तथा यह भी पता नहीं रहता कि अभी पांच मिनट में आ जाएगी या पांच घंटे में अतः लोग इंतजार करते रहते और अधिक देर होने पर लौटने भी लगते।
     इससे मुझे बड़ी पीड़ा होती। इसके निदान के लिए फिर किराए का जनरेटर मंगा लिया जनरेटर वाला तीन सौ रुपए रोजाना लेता था, जो मुझे बड़ा अखरता था। मैंने सोचा कि तीन सौ रुपए रोजाना देने से अच्छा तो यह होगा कि हम एक नया जनरेटर ही खरीद लें। इस विचार को अमलीजामा पहनाने के उद्देश्य से मैं अपने मामाजी जमुना दास गुप्ता, जो बृज मशीनरी स्टोर के स्वामी हैं, की कोतवाली रोड स्थित दुकान पर गया तथा किर्लोस्कर कंपनी के जनरेटर को खरीदने की बात की।
     मामा जी बोले कि बेटा जनरेटर की तुझे क्या जरूरत पड़ गई? मैंने कहा कि पानीं भरने वाले दूर-दूर से आते हैं और बिजली के चले जाने पर निराश होकर लौटने लगते हैं जो मुझे अच्छा नहीं लगता। अतः इसी प्रयोजन के लिए जनरेटर चाहिए। कुछ क्षण रुककर वे बोले कि मेरी एक राय है मैंने कहा कि बताओ। इस पर उन्होंने कहा कि सेवा का भाव तो तेरा अच्छा है किंतु मैं जनरेटर खरीदने की सलाह नहीं दूंगा। मैंने मामा जी से पूंछा कि क्यों? इस पर उन्होंने कहा कि जरनेटर तो एक बार तू खरीद लेगा किंतु उसका डीजल और मेंटेनेंस सहन करना मजाक नहीं। आज तेरी हैसियत खरीदने और फिर चलाने की है किंतु भगवान न करें आगे तेरे बस की नहीं रही और फिर जरनेटर चलाना बंद करना पड़ा तो वह और भी बुरा होगा। उन्होंने कहा कि मेरा तो जरनेटर बिक रहा है मुझे तो लाभ है किंतु मेरी राय मान और जरनेटर का विचार त्याग दे।
     मैं तो ठहरा जिद्दी और सनकी मैंने उनसे कहा कि मामा जी एक बात बताओ कि जब घर में किसी को हार्ट अटैक पड़ जाए या और कोई बीमारी अथवा एक्सीडेंट हो जाए तो तुरंत अपोलो लेकर भागते हैं (उन दिनों अपोलो अस्पताल का बहुत जोर था) और बाद में पता चला कि लाखों रुपए भी गए और मरीज भी हाथ से निकल गया। या फिर रेल के सफर के दौरान अटैची पार हो जाए तथा उसमें सोना चांदी नकदी आदि यानीं कि जीवन भर की पूरी कमाई चली जाए तब हम लोग कलेजे पर पत्थर रखकर उसे बर्दाश्त करते हैं या नहीं? इस पर वे बोले कि वह तो मजबूरी है।
     मैंने उनसे कहा कि मामा जी मैंने सोच लिया कि रेल के सफर में मेरी अटैची पार हो गई और मैं लूट पिट गया किंतु जरनेटर तो मुझे खरीदना ही है। इस पर उन्होंने हथियार डाल दिए और बोले कि बेटा तू जीता और मैं हारा अब तू ले जा जरनैटर मेरा आशीर्वाद तेरे साथ है। इसके बाद हमारा जरनेटर आ गया। कुछ दिन ही बीते होंगे कि स्व. हरदेव चतुर्वेदी जो भारतीय जनता पार्टी के उस समय नगर अध्यक्ष थे, एक दिन मेरे पास आए और बोले कि विजय बाबू तुम यह क्या कर रहे हो? जरनेटर चला कर पानी बांट रहे हो। आज तो तुम यह सब सहन कर पा रहे हो किंतु आगे चलकर यदि यह झोक नहीं झेली गई तथा जनरेटर से पानी नहीं दे पाए और फिर बंद करना पड़ा तो यह और भी बुरी बात होगी, और चारों ओर जग हंसाई हो जाएगी।
     मैंने चतुर्वेदी जी से भी वही बातें कहीं तथा कहा कि आप मान लो कि मैं शादी में अपनी ससुराल जा रहा हूं और रास्ते में मेरी अटैची पार हो गई। हार्ट अटैक या एक्सीडेंट आदि वाली बात कहने का मेरा साहस नहीं हुआ क्योंकि कहते हैं कि चैबीस घंटे में कुछ क्षण ऐसे आते हैं कि मुंह से निकली बात सच हो जाती है। अटैची वाली बात इसलिए कही क्योंकि मैं कहीं आता जाता ही नहीं हूं रेल का सफर तो बहुत दूर की बात रही। मेरी बातों को सुनकर चौबे जी ने भी लगभग वही उत्तर दिया जो मामा जी ने दिया था। उन्होंने कहा के विजय बाबू हम हारे तुम जीते और आशीर्वाद दिया कि तुम्हारा न कभी पंप बंद होगा और ना ही जरनेटर का चलना। ईश्वर तुम्हारा हमेशा साथ दें यह मेरी दुआ है।
     नलकूप और जनरेटर चलाने के मामले में सिर्फ इन दो लोगों ने मेरा विरोध किया वह भी मेरी भलाई के लिए किंतु नलकूप व जनरेटर के मामले में इनका आशीर्वाद भी मेरा संबल बना। ईश्वर की कृपा पिताजी व अन्य पूर्वजों तथा संत महात्माओं की अनुकंपा भी मेरे ऊपर भरपूर है। इसी का परिणाम है कि आज तीन पंप और तीन ही जरनेटर हैं। तीन जनरेटर इसलिए हैं कि पहले कभी एक जरनैटर खराब हो जाता तो दूसरा जनरेटर लाया गया। एक बार तो ऐसा हुआ कि आधी रात के समय एक-एक करके अचानक दोनों ही जरनैटर खराब हो गए।
     रात के समय दो बजे फोन करके सदर से मिस्त्री को बुलवाया तथा उसने एक जरनेटर तो हाथों-हाथ ठीक कर दिया। तभी मेरा सनकी पन और भी ताकतवर हो उठा। अतः तुरंत एक अन्य जनरेटर की व्यवस्था भी इन्हीं अदृश्य शक्तियों ने करा दी। ऐसा लगता है कि शायद मेरे पूर्व जन्मों के पुण्यों की पूरी किस्त एक ही साथ फलीभूत हो रही है। यही कारण है कि सारे बन्नक स्वत: ही बनते चले जाते हैं और मुझे कुछ करना भी नहीं पड़ता। सबसे ज्यादा सुंदर बात यह है पानीं न सिर्फ मीठा है बल्कि अत्यंत गुंणकारी भी है। लोग कहते हैं कि हम तो इस पानीं के बगैर रह ही नहीं पाते। कुछ तो बाहर जाते हैं तब भी अपने साथ पानीं ले जाते हैं।
     इस पानीं की जो खास बात है वह यह है कि पेट साफ रहता है और छोटे मोटे रोग स्वत: ही दूर हो जाते हैं। स्वाद मुझे वर्षा के जल जैसा लगता है। सबसे ज्यादा आश्चर्यजनक बात यह है कि इस पानीं को एक शीशी में भरकर रख दो तथा दूसरे अन्य पानीं को भी एक अन्य शीशी में भरकर रख दो तो दूसरे पानीं का कुछ माह बाद स्वाद बदल जाता है तथा और ज्यादा दिन रखने पर बदबू आती है और कीड़े भी पड़ने लगते हैं तथा इस पानीं को वर्षों तक रखने पर भी न स्वाद बदलता है और ना ही दुर्गंध आती है और कीड़े पड़ने का तो मतलब ही नहीं। यह भी कहा जाता है कि जिस पानीं की खिंचाई ज्यादा होती है वह बढ़िया होता चला जाता है।
     यह बात मुझसे कई लोगों ने कही है। हालांकि मैंने न इसकी कभी जांच पड़ताल की न किसी लेबोरेटरी में टैस्ट कराया। सबसे दुर्लभ बात तो यह है कि लगभग तीन दशक होने को आए न कभी पानीं का स्रोत समाप्त हुआ और ना ही अर्थ की कोई दिक्कत आई। इसे मैं ईश्वरीय चमत्कार और पूर्वजों का पुण्य प्रताप ही मानता हूं। साथ ही साथ पानीं पीने वालों की दुआ भी।

जीएलए ने लगाई किसान पाठशाला किसानों ने जानी उन्नत किस्म

-जीएलए के कृषि विज्ञान ने जैविक खेती सहित विभिन्न उन्नत किस्म पर जोरे देने के लिए लगाई किसान पाठशाला

मथुरा : जीएलए विश्वविद्यालय, मथुरा का कृषि विज्ञान विभाग अपने कृषि के विद्यार्थियों को बेहतर शिक्षा देने अलावा किसानों को भी गांव-गांव जाकर पाठशाला के माध्यम से उन्नत किस्म एवं जैविक खेती के बारे में जानकारियां प्रदान कर रहा है।

बीते दिन जीएलए विश्वविद्यालय के कृषि विज्ञान संकाय के विशेषज्ञों ने किसान पाठशाला का आयोजन ग्राम उस्फार एवं बाद मथुरा में किया, जिसमें सैकड़ों किसानों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हुए कृषि से संबंधित नई तकनीक सीखीं। कृशि विज्ञान विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डा. अमित कुमार ने कीटों के समन्वित प्रबंधन पर जोर देते हुए इंटीग्रेटेड फार्मिंग, फसल चक्र एवं जैविक खेती के तरीके भी सिखाए। जैविक खेती से संबंधित जानकारी देते हुए डा. अमित ने बताया कि रासायनिक खेती के कारण ही इंसान के अंदर कई बीमारियां जन्म ले रही हैं। साथ ही खेत की मिट्टी में पोशक तत्वों में भारी कमी देखने को मिल रही है। इसलिए जैविक की अतिआवश्यकता है। उन्होंने कम मात्रा की खेती वाले किसानों को इंटीग्रेटेड फार्मिंग खेती के बारे में भी जानकारी दी।

डा. प्रदीप जोलिया इकोनॉमिक्स विशेषज्ञ ने किसानों को मिलने वाली विभिन्न सरकारी योजनाओं को बताते हुए केसीसी एवं फसल बीमा योजना का लाभ कैसे लें पर विचार विमर्श किया। डा. वैभव सिंह ने मथुरा में उगने वाली विभिन्न फसलों की उन्नत किस्मों के बारे में जानकारी दी। दोनों ग्राम के किसानों ने जीएलए विवि द्वारा संचालित किसान पाठशाला की सराहना करते हुए आगे भी इसी तरह के कार्यक्रम कराने की मांग की।
जीएलए कृषि विज्ञान विभाग के डीन प्रो. सुरेन्द्र सिंह सिवाच ने ऑर्गेनिक खेती के बारे में बताते हुए कहा कि विश्वविद्यालय का कृषि विज्ञान विद्यार्थियों की जानकारी के लिए जैविक खेती कर रहा है। इसी जैविक के माध्यम से कई किस्म की फसलें भी विभाग में शिक्षकों/विद्यार्थियों के द्वारा किए गए प्रयोग के माध्यम से उग रही हैं।

संस्कृति विवि के विद्यार्थियों को विद्वानों ने बताई राम-कृष्ण की महत्ता

मथुरा। संस्कृति विश्वविद्यालय के कैंपस-1 स्थित सभागार में उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान लखनऊ द्वारा आयोजित
‘श्रीराम-श्री कृष्ण: जन चेतना एवं लोक हित के आदर्श’ संवाद एवं संगोष्ठी में दूर दराज से आए हिंदी के लेखकों और कवियों ने विद्यार्थियों को आज के परिदृश्य में श्रीराम और श्रीकृष्ण के कृतित्व और उनके संदेशों की महत्ता बताते हुए कहा कि राम को जानना है तो तुलसी की रामायण को पढ़िए और कृष्ण को जानना है तो गीता को पढ़िए आपको अपनी हर समस्या, सवाल का उत्तर मिल जाएगा।
कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथि वक्ताओं, कवियों ने मां सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्ज्वल कर किया। कार्यक्रम का संचालन कर रहे इलाहाबाद के विधि विभाग के प्रवक्ता और जानेमाने कवि शैलेष गौतम ने अपनी सुगठित कविताओं और वक्तव्य के माध्यम से कहा कि भारत की ऐसी मातृत्व शक्ति को प्रणाम जिन्होंने राम और कृष्ण जैसे युग पुरुषों को जन्म दिया। यहां मौजूद युवा शक्ति जिसके पास देश की दशा और दिशा दोनों बदलने की सामर्थ्य है। उन्होंने कहा कि यह सही है कि राम का चित्र देखने में बहुत सुंदर है लेकिन पूजा उनके चरित्र की होती है। भगवान श्री कृष्ण ने पर्वत एक अंगुली पर उठा लिया था लेकिन सुरों को साधने के लिए बांसुरी पर दसों अंगुली लगानी पड़ीं। उन्होंने राम की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि, राम युग से परे राम युगबोध हैं, राम सीधे सरल राम अनुरोध हैं, राम पथ हैं सुगम मूल्य आदर्श के, राम हर युग में रावण का प्रतिरोध हैं।
मथुरा के युवा कवि हरिंद्र नरवार ने कहा कि, भर सके रंग राम के चरित्र में..राम वन में गए तो राम बन गए। उन्होंने राम और कृष्ण के चरित्रों को अपनी रचनाओं में ढालकर विद्यार्थियों को उनके संदेशों पर अमल करने की प्रेरणा दी। ओज के युवा कवि ने अपनी कविताओं से उपस्थित विद्यार्थियों में जोश भर दिया। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से कहा कि अगर चंदवरदाई जैसे कवि नहीं होते तो राजा को युद्ध के लिए प्रेरित कौन करता। उन्होंने ब्रजभाषा में अपनी रचनाओं से विद्यार्थियों पर एक अमिट छाप छोड़ी। राजस्थान के डा. पद्म गौतम ने कहा कि आप सभी सौभाग्यशाली हैं जो संस्कृति की गोद में बैठकर विद्याध्यन कर रहे हैं। राम और कृष्ण हमारे प्रतिमान हैं, जिनको दूषित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने अपनी रचना के माध्यम से कहा कि, राजनीत का खेल खेलें, न जाने रघुराई को बड़े हिमालय से बढ़कर हैं, अतल सिंधु से गहरे राम। टूंडला फिरोजाबाद से आए लटूरी सिंह लट्ठ ने अपनी रचनाओं के माध्यम से विद्यार्थियों को अपनी संस्कृति, परंपराओं का पालन करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि जबतक राम और कृष्ण को आप पढ़ेंगे नहीं तब आप कैसे जानेंगे। उन्होंने कहा कि आप इनके जीवन से प्रेरणा लें।
इससे पूर्व संस्कृति विवि के डा. रजनीश त्यागी ने आगंतुक वक्ताओं, कवियों को पटुका ओढ़ाकर और स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया। कार्यक्रम की व्यवस्था और संयोजन स्टूडेंट वेलफेयर के डीन डा. डीएस तोमर, डा.दुर्गेश वाधवा ने की।