
आरआईएस की होनहार छात्रा मायरा को मिली 21वीं इंटरनेशनल रैंक
- इंटरनेशनल इंग्लिश ओलम्पियाड में दिखाई बौद्धिक क्षमता
मथुरा। प्रतिभा उम्र की मोहताज नहीं होती इस बात को सिद्ध कर दिखाया है राजीव इंटरनेशनल स्कूल की होनहार छात्रा मायरा उप्पल ने। मायरा ने इंटरनेशनल इंग्लिश ओलम्पियाड में अपनी बौद्धिक क्षमता का शानदार प्रदर्शन करते हुए इंटरनेशनल स्तर पर 41वीं रैंक प्राप्त कर समूचे ब्रज मण्डल को गौरवान्वित किया है।
शैक्षिक संयोजक प्रिया मदान ने बताया कि इस साल राजीव इंटरनेशनल स्कूल के छात्र-छात्राओं ने साइंस ओलम्पियाड फाउंडेशन द्वारा आयोजित विभिन्न राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय शैक्षिक प्रतियोगिताओं में शानदार प्रदर्शन किया है। हाल ही में आयोजित इंग्लिश ओलम्पियाड में आरआईएस में अध्ययनरत कक्षा चार की छात्रा मायरा उप्पल ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 41वीं रैंक हासिल की है। होनहार मायरा उप्पल से पहले अंतरराष्ट्रीय गणित ओलम्पियाड में कक्षा पांच की छात्रा रौनिका नागपाल तथा कक्षा एक के छात्र कुंवर अन्वित सिंह ने इंटरनेशनल रैंक हासिल कर अपने स्कूल का गौरव बढ़ाया था। इसी तरह इंटरनेशनल साइंस ओलम्पियाड में रौनिका नागपाल ने 22वीं, कक्षा दो के छात्र प्रणय अग्रवाल ने 45वीं, कक्षा दो के ही छात्र तारुण्य तायल ने 63वीं तथा कक्षा चार के छात्र अक्षज गोयल ने 81वीं रैंक प्राप्त कर अपने विद्यालय तथा प्रदेश का नाम रोशन किया था।
ज्ञातव्य है कि साइंस ओलम्पियाड फाउंडेशन सात ओलम्पियाड परीक्षाएं आयोजित करता है। इंग्लिश इंटरनेशनल ओलम्पियाड (ईआईओ) की स्थापना 1989 में छात्र-छात्राओं को अपनी क्षमता प्रदर्शित करने का मौका प्रदान करने के लिए की गई थी। ईआईओ का प्राथमिक लक्ष्य छात्र-छात्राओं की अंग्रेजी व्याकरण, वर्तनी और वाक्य संरचना के साथ-साथ उनकी भाषा दक्षता में सुधार करना है।
आर.के. एज्यूकेशनल ग्रुप के अध्यक्ष डॉ. रामकिशोर अग्रवाल ने होनहार छात्रा मायरा उप्पल को बधाई देते हुए उसके उज्ज्वल भविष्य की कामना की है। डॉ. अग्रवाल ने कहा कि एक नई भाषा सीखना एक सतत प्रक्रिया है लेकिन सुधार की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है। छात्र-छात्राओं को अपने शैक्षणिक अध्ययन में उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए हर विषय के प्रति जुनून और समर्पण जरूर रखना चाहिए, बिना मेहनत और अभ्यास के किसी भी परीक्षा में सफलता हासिल करना मुश्किल है।
प्रबंध निदेशक मनोज अग्रवाल ने छात्रा मायरा को उत्कृष्ट प्रदर्शन और इंटरनेशनल रैंक हासिल करने के लिए बधाई देते हुए कहा कि उसकी इस उपलब्धि से समूचा विद्यालय परिवार गौरवान्वित महसूस कर रहा है। श्री अग्रवाल ने कहा कि विद्यार्थियों की बौद्धिक क्षमता को निखारने में राजीव इंटरनेशनल स्कूल सदैव अग्रणी रहा है, यही वजह है कि यहां के छात्र-छात्राएं प्रतिवर्ष उत्कृष्ट प्रदर्शन कर अपने जनपद और राज्य को गौरवान्वित कर रहे हैं।
संस्कृति विश्वविद्यालय ने नए जोश के साथ मनाया ‘स्टार्टअप डे’
मथुरा। संस्कृति विश्वविद्यालय में नवाचार और उद्यमशीलता की भावना से ओतप्रोत ‘स्टार्टअप डे’ मनाते हुए विभिन्न कार्यक्रमों और गतिविधियों के एक श्रंखला शुरू की। विश्वविद्यालय का परिसर उत्साह से भर गया क्योंकि छात्र, संकाय और उद्योग विशेषज्ञ उद्यमशीलता पारिस्थितिकी तंत्र का जश्न मनाने और प्रोत्साहित करने के लिए एक साथ आए।
उत्सव की शुरुआत एक प्रेरक उद्घाटन समारोह के साथ हुई। इसमें विशिष्ट अतिथि संस्कृति विवि के चांसलर डॉ. सचिन गुप्ता, कुलपति डॉ. एमबी चेट्टी, सीईओ डॉ. मीनाक्षी शर्मा, डीजी डॉ. जेपी शर्मा, संस्कृति यूनिवर्सिटी बिजनेस इनक्यूबेशन सेंटर के सीईओ प्रोफेसर अरुण कुमार त्यागी, एकेडमिक डीन डा. मीनू गुप्ता, डीन मैनेजमेंट डॉ. राव और विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने आर्थिक विकास और तकनीकी प्रगति को बढ़ावा देने में स्टार्टअप के महत्व पर प्रकाश डाला। इस कार्यक्रम ने उद्यमियों की अगली पीढ़ी के विकास में संस्कृति विश्वविद्यालय की भूमिका को रेखांकित किया।
पूरे दिन, उपस्थित लोगों को सफल उद्यमियों, उद्यम पूंजीपतियों और उद्योग जगत के नेताओं को सुनने और चर्चा में शामिल होने का मौका मिला। इन चर्चाओं में फंडिंग रणनीतियों, बाजार के रुझान और स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र में सहयोग के महत्व सहित कई विषयों पर चर्चा हुई। इंटरैक्टिव कार्यशालाएँ भी आयोजित की गईं। कार्यशालाओं में प्रतिभागियों को व्यवसाय शुरू करने और उसे आगे बढ़ाने के दौरान सामने आने वाली जटिलताओं को सुलझाने की व्यवहारिक जानकारियां भी दी गईं। छात्रों को अनुभवी पेशेवरों के साथ निकटता से बातचीत करने, बहुमूल्य ज्ञान और मार्गदर्शन प्राप्त करने का मौका मिला।
उत्सव का एक मुख्य आकर्षण स्टार्टअप शोकेस था, जहां संस्कृति विश्वविद्यालय के उभरते उद्यमियों ने अपने अभिनव विचार और परियोजनाएं प्रस्तुत कीं। दिन का समापन प्रसिद्ध उद्यमी डॉ हिरेशा वर्मा के मुख्य भाषण के साथ हुआ, जिन्होंने अपनी व्यक्तिगत यात्रा, चुनौतियों और सीखे गए सबक विद्यार्थियों के साथ साझा किए। भाषण का उद्देश्य स्टार्टअप की दुनिया में लचीलेपन, रचनात्मकता और निरंतर सीखने के महत्व पर जोर देते हुए दर्शकों को प्रेरित और प्रेरित करना था।
समारोह का समापन प्रोफेसर अरुण कुमार त्यागी द्वारा उद्यमिता शिक्षा के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान करने के लिए संस्कृति यूनिवर्सिटी बिजनेस इनक्यूबेशन सेंटर की प्रतिबद्धता व्यक्त करने और उद्यमशीलता उद्यम को आगे बढ़ाने में रुचि रखने वाले छात्रों के लिए समर्थन बढ़ाने के लिए चल रही पहल और भविष्य की योजनाओं पर प्रकाश डालने के साथ हुआ।
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सिटी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस, मथुरा एवं इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल, नई दिल्ली के सौजन्य से सुपर स्पेशलिटी ओ.पी.डी. एवं हेल्थ चेकअप कैम्प का आयोजन, दिनांक 24 जनवरी 2024, बुधवार, समय- सुबह 10 बजे से दोपहर 3 बजे तक, सिटी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस, सिम्स हॉस्पिटल, निकट श्रीराधा वैली, एन.एच.19, मथुरा।
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अरे लाला तू जे कौन की जन्मपत्री लै आयौ_है
अरेलालातूजेकौनकीजन्मपत्रीलैआयौ_है
मथुरा। बात लगभग 30 वर्ष पुरानीं है। उन दिनों हमारे पिताजी स्व. लाला नवल किशोर जी की तबीयत कुछ ज्यादा ही खराब थी चल रही थी। उसी दौरान यमुना किनारे आगरा होटल के निकट दंडी वाले घाट पर एक विद्वान ज्योतिषी छोटी-सी कोठरी में आकर रहने लगे थे। अल्प समय में ही उनकी ज्योतिष की ख्याति होने लगी आसपास ही नहीं दूर-दराज तक के लोग अपनी व अपने परिजनों की जन्मपत्री दिखाने हेतु आने लगे।
मैंने पिता जी से कहा कि आप अपनी जन्मपत्री दे दो तो मैं भी उसे दिखाकर पूंछू कि आप की अस्वस्थता के ये दिन कब तक चलेंगे? तथा कोई उपाय वगैरा हो सकता है क्या? चूंकि हमारे पिताजी ज्योतिष में बहुत ज्यादा विश्वास रखते थे और हल्की-फुल्की सी जानकारी स्वयं भी रखते। पंचांग देखना भी उन्हें अच्छी प्रकार आता था। पिताजी ने अपनी जन्मपत्री मुझे दे दी और उसे लेकर मैं उक्त वृद्ध ज्योतिषी के पास गया।
जब मैंने अपने पिताजी की जन्मपत्री उन्हें दी तथा कहा कि पंडित जी इसे देख कर बताओ कि खराब स्वास्थ्य के दिन कब तक चलेंगे? और कोई उपाय वगैरा हो सकता है तो उसे भी बताओ। पंडित जी ने अपनी आंखों पर चश्मा चढ़ाया तथा सरसरी नजर से देखते ही वह एकदम भौचक्के से रह गए और मुझसे बोले कि "अरे लाला तू जे कौन की जन्मपत्री लै आयौ है"। मैंने कहा कि पंडित जी आपको पहले ही बता दिया था कि यह मेरे पिताजी की जन्मपत्री है और उनकी तबीयत खराब चल रही है।
वे बोले कि यह तो मुझे पता है कि तुम्हारे पिताजी की है किंतु मेरा मतलब यह है कि ये व्यक्ति कोई मामूली इंसान नहीं है। ये तो कोई योग भ्रष्ट दिव्यात्मा है। अपनी किसी गलती या भूल चूक के कारण इन्होंने इंसान के रूप में जन्म लिया है। इसके बाद उन्होंने कुछ देर तक जन्मपत्री को विस्तार से देखा तथा शुरू से अंत तक का वह सब घटनाक्रम एकदम सटीक बता दिया जो उनके जन्म से लेकर उस समय तक घटित हो रहा था। बहुत ज्यादा तो मुझे याद नहीं किंतु उन्होंने सबसे ज्यादा जोर देकर एक बात यह कही कि यह अत्यंत स्वाभिमानी व अपनी मेहनत से कमाने खाने व गृहस्थी का पालन करने वाले सीधे सच्चे इंसान हैं। दूसरी बात उन्होंने यह कही कि तुम्हारे पिताजी हमेशा सादगी, सच्चाई, ईमानदारी और किसी का नुकसान न करने वाले व्यक्ति हैं। ये उस व्यक्ति का भी बुरा नहीं सोचते हैं जो भले ही इनका बुरा करे।
उक्त ज्योतिषी की हर बात हमारे पिताजी के बारे में बड़ी सटीक बैठ रही थी। उनकी बातें सुनकर मैं भी बड़ा विस्मित सा हो गया क्योंकि इतनी श्रेष्ठ ज्योतिष वाला व्यक्ति मैंने कोई देखा ही नहीं था। जो बातें उक्त ज्योतिषी ने मुझे बताईं थीं लगभग ऐसी ही बातें हमारी दादी बुद्धोदेवी को पिताजी के जन्म के पश्चात उस जमाने के जाने-माने ज्योतिषियों ने भी बताई थीं जिनमें एक ते सुजान पंडित जी। सुजान पंडित जी का बड़ा नाम था उनके इस नाम को उनके यशस्वी पुत्र पंडित रविदत्त जी मधुबनियां ने भी कायम रखा।
हमारे पिताजी अत्यंत शांत और सरल स्वभाव के तो थे ही साथ ही उनकी ईश्वर में बड़ी जबरदस्त आस्था थी तथा भजन, पूजन व ईश्वर भक्ति के कवित्त बनाना उनकी खास रूचि थी। वे झूठ, छल, कपट आदि से हमेशा दूर रहे यहां तक कि अपनी जमीन जायदादों के मुकद्दमों में भी सीधी सादी चाल से चलते। वकीलों के कहने पर भी मुकद्दमे बाजी में झूठी व मनगढ़ंत बातें नहीं लिखवाते। इस बात के बारे में आज भी हमारे पुराने जमाने के वकील स्व. बाबू जगदीश प्रसाद गर्ग, मंडी रामदास वालों के सुपुत्र माधव बाबू बताते रहते हैं। उन दिनों माधव बाबू निर्विकार गुप्ता (जो बाद में जिला जज बने) हीरालाल एवं महिपाल शोरावाला आदि जगदीश बाबू के जूनियरों में थे।
हमारे पिताजी ने अपने जीवन में जो सिद्धांत बनाए उन्हें एक खास यह भी था कि किसी का घोंसला न उजड़े क्योंकि हमारे बाबा स्व. श्री पुरुषोत्तम दास जी पिताजी के बचपन में यानी तीन चार वर्ष की उम्र में गुजर गए थे, ताऊजी श्री दामोदरदास व हर प्रसाद जी की छत्र छाया में मां बुद्धो देवी ने उनका लालन-पालन किया। क्योंकि उस समय हमारी पैतृक जमीन जायदाद काफी थी और उन दिनों किराएदारी बड़ी कमजोर थी मकान मालिकी ताकतवर थी यानी कि कानून ऐसा था कि मकान मालिक जब चाहे किराएदार से अपनी जगह खाली करा लेता था।
पिताजी ने भले ही नुकसान उठाए किंतु किसी भी किराएदार से नाजायज रूप से जगह खाली नहीं कराई। हां उनसे जरूर खाली कराई जो न तो किराया देते और धींगपने से जमे रहकर उल्टे पिताजी के ऊपर ही रौब गालिब करने की कोशिश करते। ऐसी जगह में यह स्थान भी है जहां हम रहते हैं तथा पिताजी का लगाया हुआ "नवल नलकूप" चल रहा है। पहले इस जगह में साढ़े तीन भाई नाम से चतुर्वेदियों की पंडागीरी वाली कंपनी चलती थी तथा इस हवेली नुमा मकान को धर्मशाला के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। पूर्वजों ने इस जगह को धर्मशाला के निमित्त ही बनवाया था। बाद में पिताजी ने हाईकोर्ट तक से मुकद्दमा जीत कर उस जमाने के जाने-माने रंगदारों से बगैर लड़ाई झगड़े के अपनी भलमन साहत से खाली करवाया व खुद आकर गृहस्थी के साथ रहने लगे। यहां आने के बाद सबसे पहले मेरा जन्म इसी मकान में हुआ। इस मकान का पूरा मुकद्दमा बाबू जगदीश प्रसाद जी ने बड़े मनोयोग से लड़ा। वे हमारे पिताजी को बहुत मानते थे।
अपने पिताजी के बारे में घोंसला न उजाड़ने वाली एक रोचक घटना बताना चाहता हूं। चूंकि ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ व वैद्य कृष्ण दास शर्मा आदि क्रांतिकारियों के पक्ष में गवाही देने के कारण गोविंद गंज स्थित हमारी पैत्रिक आढ़त के सभी लाइसेंस तत्कालीन कोतवाल पृथ्वी सिंह ने निरस्त कराकर आढ़त के व्यापार को तहस-नहस करा दिया था और घर गृहस्थी चलाने तक के लाले पढ़ने के साथ हमारी बड़ी बहन स्व. श्रीमती गीता देवी की शादी ऊपर से सिर पर आ गई। अतः पिताजी ने लालागंज वाली अपनी लंबी चौड़ी जायदाद को बेचने का मन बनाया व उसमें मौजूद सबसे बड़े किराएदार श्रीनाथ दास जी मैदा वालों व उनके छोटे भाई जमुनादास जी से उनके हिस्से को बेचने की बात की।
श्रीनाथ दास जी श्री ग्रुप के सर्वे सर्वा सुदीप अग्रवाल उर्फ पप्पन जी के ताऊ जी थे। उन्होंने पिताजी से कहा कि भाई साहब आप क्यों सभी के झंझट में पढ़ते हो? लाला गंज की पूरी की पूरी जायदाद हमें ही बेच दो जितने पैसे सभी से मिलें उससे और ज्यादा ले लो इससे आपको भी फायदा रहेगा। पिताजी ने श्रीनाथ दास जी से दो टूक शब्दों में मना कर दिया तथा कहा कि आपको मैं पूरी जायदाद बेच दूंगा तथा थोड़े दिनों में ही आप सभी से खाली करवा लेंगे और लगभग सभी के घोंसले उजड़ जाएंगे, जो मैं कतई नहीं चाहूंगा। उनके इस जवाब से श्रीनाथ दास जी निरुत्तर हो गए और उन्होंने सिर्फ अपने हिस्से वाली जगह ही खरीदी। इसके बाद पिताजी को जिस जिस ने जो कुछ दिया यानी किसी ने पांच सौ, सात सौ, हजार, दो हजार सभी की खुशी से जो मिला स्वीकार किया किंतु किसी का घोंसला नहीं उजड़ने दिया सभी किरायेदारों ने उन्हें जीभर के दुआएं दीं।
पिताजी की उदारता का एक और किस्सा जो अविस्मरणींय सा लगता है, बताता हूं। हमारे मकान में जहां गाय-भैंसों आदि के पीने हेतु पानीं की टंकी बनी हुई है। एक दुकान थी डॉक्टरी की उसे डॉक्टर कुंदन लाल बुधिराजा चलाते थे। दुकान का नाम था कैलाश चिकित्सालय। डॉक्टर साहब वृद्धावस्था के कारण दुकान चलाने में असमर्थ थे, फिर भी उन्होंने दुकान खाली नहीं की तथा बंद पड़ी रही।
पिताजी ने अदालती कार्यवाही करके दुकान खाली कराकर दखल ले लिया। महत्वपूर्ण बात यह थी कि उस समय डॉक्टर साहब की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। पिताजी ने कानूनन दुकान का कब्जा लेकर भी डॉक्टर साहब को पांच हजार रुपए स्वेच्छा से दिए। यह बात लगभग पैंतालीस साल पुरानीं है, उस समय पांच हजार रुपए की कीमत बहुत थी। पांच हजार रुपए पाकर डॉक्टर साहब बेहद खुश हो गए।
हमारे पिताजी का सिद्धांत हमेशा यह रहा कि उनकी वजह से किसी का दिल न दुखे। वे कहते थे कि "निर्बल को न सताइए जाकी मोटी हाय मरी खाल की स्वांस सौं लोह भसम हुई जाय"। पुराने जमाने में लोहे को तपाने व पिघलाने वाली सिगड़ी (अंगीठी) की आग को तेज करने के लिए धौंकनी का प्रयोग किया जाता था। ये धौंकनी मरे हुए जानवर की खाल से बनाई जाती थी, उनमें लगे हैंडल को ऊंचा करने पर हवा भर जाती थी तथा दबाने पर वेग के साथ हवा निकलती और अंगीठी धधक उठती व लोहा भी पिघल कर भस्म होने लगता था।
पिताजी व हमारे दिवंगत पुत्र विवेक का स्वभाव बहुत कुछ मिलता जुलता था। विवेक व पिताजी के रहन-सहन आचार विचार सब कुछ सामान थे उसकी जन्मपत्री को देखकर भी ज्योतिषी योग भ्रष्ट बताते थे। उसके अंदर तो कुछ ऐसी दुर्लभ विलक्षणतायें भी विद्यमान थीं कि अक्सर उसके मुंह से निकली बात एकदम सच हो जाती। पितृ पक्ष की इस पावन बेला में दोनों पुण्यात्माओं को मेरा नमन।
बरसाना पुलिस ने दबोचे चार शातिर
- थाना बरसाना में पुलिस टीम के साथ खड़े शातिर अपराधी
रिपोर्ट राघव शर्मा
बरसाना: बरसाना पुलिस ने शातिर अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई करते हुए चार शातिरों को धर दबोचा। पुलिस ने तीनों शातिरों के कब्जे से अवैध देशी शराब तथा तमंचा बरामद किया।
बीती रात थाना प्रभारी निरीक्षक अरविंद कुमार निर्वाल ने मुखबिर की सूचना पर राजस्थान बॉर्डर से चार शातिरों को धर दबोचा। पूछताछ में शातिरों ने अपने नाम हुकम सिंह निवासी चैना का थोक, कुंजीलाल निवासी भरनाखुर्द, विष्णु निवासी तिलक बिहार कालोनी, रामचंद्र निवासी हाथिया बताया। पुलिस ने चारों शातिरों के कब्जे से एक तमंचा, 15 लीटर अवैध देशी शराब, हरियाणा मार्का 28 क्वाटर बरामद किया। थाना प्रभारी निरीक्षक अरविंद कुमार निर्वाल ने बताया कि चारों शातिरों को जेल भेज दिया गया है। वहीं शातिर अपराधी हुकम सिंह पर एक दर्जन से अधिक आपराधिक मुकदमें दर्ज है।
श्रीराम भक्ति और जयकारों से गूंजा के.डी. मेडिकल कॉलेज एण्ड हॉस्पिटल
- शाम को भजन-कीर्तन के बाद दीपोत्सव से जगमग हुआ परिसर
- सुन्दरकाण्ड के सस्वर पाठ के बाद हजारों श्रद्धालुओं ने प्रसादी ग्रहण की
मथुरा। सोमवार को अलसुबह से ही के.डी. मेडिकल कॉलेज-हॉस्पिटल एण्ड रिसर्च सेण्टर का माहौल भक्तिभाव में डूबा नजर आया। सुबह से दोपहर तक मेडिकल छात्र-छात्राएं भक्तिभाव के बीच मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के जयकारे लगाते रहे तो दूसरी तरफ 21 वेदाचार्यों ने वैदिक मंत्रोच्चार और 108 सुन्दरकांड पाठ के बीच श्रीअखिलेश्वर महादेव मंदिर का नौवां स्थापना दिवस मनाया। शाम को साढ़े पांच बजे से साढ़े छह बजे तक भजन-कीर्तन तथा आरती के बाद साढ़े छह बजे से सात बजे तक हर्षोल्लास के बीच दीपोत्सव कार्यक्रम सम्पन्न हुआ।
इस धार्मिक आयोजन में आर.के. एज्यूकेशनल ग्रुप के अध्यक्ष डॉ. रामकिशोर अग्रवाल, उनकी धर्मपत्नी श्रीमती विनय अग्रवाल, प्रबंध निदेशक मनोज अग्रवाल तथा अरुण अग्रवाल सहित सैकड़ों चिकित्सक, प्राध्यापक, छात्र-छात्राएं तथा अन्य भक्तगण उपस्थित रहे। एक तरफ भक्तगणों ने टेलीविजन की बड़ी स्क्रीन पर अयोध्या में हुए श्रीरामलला के प्राण प्रतिष्ठा समारोह को देखा तो दूसरी तरफ सजा दो घर को गुलशन सा अवध में श्रीराम आए हैं, का उद्घोष करते देखे गए।
108 सुन्दरकांड पाठ के बाद आर.के. एज्यूकेशनल ग्रुप के अध्यक्ष डॉ. रामकिशोर अग्रवाल, उनकी धर्मपत्नी श्रीमती विनय अग्रवाल, प्रबंध निदेशक मनोज अग्रवाल तथा अरुण अग्रवाल ने आरती की तथा कन्याओं को भोज कराने के बाद आचार्य करपात्री द्विवेदी, आचार्य विकास मिश्रा, आचार्य देवनाथ द्विवेदी, आचार्य शुभम तिवारी, आचार्य विवेक मिश्रा, आचार्य रामानुज द्विवेदी, आचार्य गणेश तिवारी आदि का धार्मिक कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए आभार माना। अंत में डॉ. रामकिशोर अग्रवाल ने सभी श्रद्धालुओं से प्रसादी ग्रहण करने का अनुरोध किया।
डॉ. अग्रवाल ने भगवान श्रीराम की प्राण प्रतिष्ठा को अविस्मरणीय पल बताते हुए कहा कि सुख समृद्धि एवं शांति से परिपूर्ण जीवन के लिए सदाचारी होना ही पहली शर्त है। हमें यह दुर्लभ मानव जीवन किसी भी कीमत पर निरर्थक और उद्देश्यहीन नहीं जाने देना चाहिए। लोकमंगल की कामना ही हमारे जीवन का उद्देश्य होना चाहिए। डॉ. अग्रवाल ने सभी से दृढ़ संकल्प शक्ति, सच्ची निष्ठा व आस्था के साथ समाजहित एवं भारतहित में कार्य करते रहने का आह्वान किया ताकि हमारा देश फिर से विश्व गुरु बन सके।
पूजा-पाठ के बाद आचार्य करपात्री द्विवेदी ने बताया कि महाबली हनुमानजी की आराधना से सभी ग्रहों का दोष शांत हो जाता है। हनुमानजी और सूर्यदेव एक-दूसरे के स्वरूप हैं, इसलिए हनुमान साधना करने वाले साधकों में सूर्य तत्व अर्थात आत्मविश्वास, ओज, तेजस्विता आदि स्वत: ही आ जाते हैं। श्रीअखिलेश्वर महादेव मंदिर के नौवें प्रतिष्ठापन समारोह में आर.के. एज्यूकेशनल ग्रुप के शैक्षिक संस्थानों के डीन और प्राचार्य डॉ. आर.के. अशोका, डॉ. राजेन्द्र कुमार, डॉ. देवेन्द्र पाठक, प्रो. नीता अवस्थी, बड़ी संख्या में प्राध्यापक, चिकित्सक, छात्र-छात्राएं तथा अन्य अधिकारी और कर्मचारी उपस्थित रहे।
जब मैं आसमान में उड़ने लगा
- विजय कुमार गुप्ता
जब मैं आसमान में उड़ने लगा
विजय कुमार गुप्ता
मथुरा। बात सन उन्नीस सौ अस्सी के मध्य की है। मैं गहरी नींद में सोया हुआ था। मुझे स्वप्न हुआ कि मैं आसमान में दूर-दूर तक उड़े जा रहा हूं। बीच-बीच में जमीन पर भी उतर आता किंतु पैरों को जरा सा ऊंचा करके उचकने जैसी कोशिश करते ही फिर ऊपर उठ जाता तथा जितनी ऊंचाई पर उठना चाहता उतनी ही ऊंचाई पर पहुंच जाता और जिस ओर जाना चाहता उसी ओर काफी दूर तक उड़ता ही चला जाता। मुझे बड़ा सुखद और विचित्र अनुभव स्वप्न के द्वारा हो रहा था।
मेरा स्वप्न चल रहा था या समाप्त हो गया यह तो मुझे याद नहीं किंतु सूर्योदय के समय बड़ी जोर की धूम धड़ाम की आवाजों से मेरी नींद टूट गई और मैं हड़बड़ा कर उठा तथा देखने लगा कि यह आवाज कहां से आ रही है। मैंने अपने कमरे का पिंजर खोला तो देखा कि रेल की पटरी पर एक मालगाड़ी खड़ी हुई थी और उसमें से बड़े-बड़े लोहे के गाटर तथा पुल बनाने का अन्य हैवी सामान उतर रहा था। रेलवे की लेबर जिसमें सरदार अधिक थे, जोर लगा के हाईशा जोर लगा के हाईशा की आवाज पूरी ताकत के साथ लगा रहे थे।
यह दृश्य देखते ही मानो मैं खुशी से पागल हो उठा क्योंकि यह मेटेरियल हमारे घर के निकट यमुना जी पर बने रेल के पुल पर पैदल चलने वालों के लिए गैलरी (रास्ता) बनाने हेतु आया था, जिसके लिए मैं न सिर्फ बचपन से उम्मीद लगाए हुए था बल्कि किशोरावस्था से ही खुद भी प्रयासरत था। उस समय तो ऐसा लगा कि मानो मैं सचमुच में बगैर पंखों के ही उड़ रहा हूं। पूरे शहर में हल्ला मच गया कि पुल पर गैलरी बनाने का कार्य शुरू होने जा रहा है लोगों ने मुझे अपने सिर आंखों पर बिठा लिया। यह सब आसमान में उड़ने से कम नहीं था। मेरे बचपन का स्वप्न जो सच होने जा रहा था।
मैं अपने जीवन में उस दिन सबसे पहले स्वप्न में उड़ा तथा उसके बाद भी एकाध अवसर ऐसे आए। जब जब मैं स्वप्न में उड़ा तब तब कोई बहुत बड़ी खुशी और शोहरत की बात सामने आई। यानी कि स्वप्न के द्वारा पूर्वाभास हो जाता था। मेरे जीवन का वह विलक्षण दिन था जब मैं पहली बार उड़ा शायद पूरी जिंदगी का सबसे सुखद और सुन्दर दिन।
करीब छः दशक पूर्व तक इसी पुल से न सिर्फ पैदल लोग बल्कि साइकिल, रिक्शा, तांगे, बैलगाड़ी, कार तथा बस ट्रक आदि सभी गुजरते थे। जब रेल आती तो दोनों ओर फाटक लग जाते और रेल के जाने पर फाटक पुनः खुल जाते और यातायात सामान्य हो जाता। इसके बाद पुल की मियाद समाप्त होने पर रेलवे द्वारा इसे रेल के अलावा अन्य सभी वाहनों यहां तक कि पैदल तक के लिए बंद कर दिया तथा प्रदेश सरकार द्वारा सभी वाहनों व पैदल तक के लिए नया पुल बनवा दिया।
नये पुल से जाने आने में पैदल चलने वालों को काफी लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी अथवा नाव से जाने आने में पैसे खर्च करने पड़ते थे। अतः वे इसी रेल के पुल से पटरियों के मध्य होकर निकलने लगे और अचानक रेल के आ जाने पर भगदड़ मचती तथा कोई भागकर पास की कोठी पर पहुंच जाता तो कोई कोठी तक न पहुंचने पर यमुना जी में कूद जाता उनमें कुछेक डूब भी जाते थे कोई कोई अभागा तो रेल से कटकर मर भी जाता। दुर्घटनाग्रस्त होकर भी जो बच जाते वे जीवनभर के लिए अपाहिज बने रहते। मुझे याद आ रहा है कि एक आदमी जो कमर या जांघ के पास से कट गया और उसके दो टुकड़े हो गये, वह तड़फ तड़फ कर कह रहा था कि मुझे अस्पताल मत ले जाओ, यहीं यमुना जी में पटक दो अब मैं जी कर क्या करूंगा। बाद में वह मरा या जिंदा रहा मुझे याद नहीं लेकिन यह कारुणिक दृश्य जब भी जब मुझे याद आता है तो मेरे मन को झकझोर कर रख देता है।
आये दिन महिला और पुरुषों का रेल से कटना और फिर तड़फ तड़फ कर मरना या जीवन भर के लिए अपाहिज हो जाना यह सब देख कर मैं बहुत व्यथित हो जाता था। जब इस पुल से लोगों का कटना मरना शुरू हुआ तब मैं शायद पांच सात वर्ष का था। कटने मरने का यह सिलसिला चलता रहा और उम्र बढ़ने के साथ-साथ मेरे अंदर की पीड़ा भी बढ़ती जा रही थी। कभी-कभी तो मैं बड़ा व्याकुल हो जाता किंतु बेबस होकर रह जाता।
जब मैं कुछ बड़ा हुआ तो सबसे पहले मैंने नवभारत टाइम्स में एक पत्र इस समूचे घटनाक्रम पर विस्तार से लिख कर भेजा जो 8 अक्टूबर सन 1968 में पाठकों के पत्र स्तंभ में प्रमुखता से छपा जिसका शीर्षक था “मथुरा का रेल पुल” इस पत्र में मैंने सरकार से मांग की कि पैदल चलने वालों के लिए शीघ्र ही रास्ता बनाया जाय ताकि आये दिन होने वाली दुर्घटनाओं को रोका जा सके। इस पत्र का कोई असर नहीं हुआ और कटने मरने का सिलसिला चलता रहा।
किशोरावस्था पार करके जब मैं युवावस्था में आया तब मेरे अंदर आक्रोश और क्रोध की ज्वाला धधकने लगी तथा मैंने भी सोच लिया कि अब तभी चैन से बैठूंगा जब इस पुल पर पैदल चलने वालों के लिए रास्ता बनवा लूंगा। सबसे पहले मैं मथुरा के जिलाधिकारी के.एस. त्रिपाठी से मिला तथा सारी बात बताई। जिस समय में जिलाधिकारी से मिला था उस समय भारतीय युवा जनता मोर्चा के तत्कालीन जिला अध्यक्ष विनोद टैंटीवाल भी अपने प्रतिनिधिमंडल के साथ अपनी समस्याओं को लेकर बातचीत कर रहे थे। उन्होंने भी मेरी बात की पुष्टि करते हुए सविस्तार जिलाधिकारी को समझाया।
खैर में कभी जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक कभी विधायकों तथा कभी सांसद से मिलता रहा और अपनीं बात कहता रहा किंतु नतीजा शून्य। ज्यादा से ज्यादा यह होता कि जब अधिक लोग कट जाते और हो-हल्ला मचता तो फिर एकाध दिन को पुल के दोनों और पुलिस का पहरा लगा दिया जाता ताकि कोई पटरियों के बीच से जा आ न सके। लोग काटते रहे मरते रहे और प्रशासन, शासन तथा रेलवे के कान पर जूं न रेंगी।
इसके बाद मैंने दिल्ली जाकर रेल मंत्रालय का दरवाजा खटखटाया। वहां पर मुझे बताया गया कि हम जब तक पुल पर रास्ता नहीं बना सकते तब तक कि उत्तर प्रदेश सरकार इसका पैसा खर्च करने को तैयार न हो। इसके बाद मैंने अपने आप को पूरी तरह इस मिशन में झोंक दिया तथा मुख्यमंत्री राम नरेश यादव के नाम तीन पृष्ठ का एक ज्ञापन तैयार कराया और उसकी सौ प्रति साइक्लोस्टाइल से निकलवा कर मुख्यमंत्री से लेकर सभी विधायकों तथा राजनैतिक पार्टियों के बड़े नेताओं के पास डाक से व जहां जा सकता था खुद जाकर दिया। यह मैटर सैनिक के प्रतिनिधि श्री नरेंद्र मित्र जी ने तैयार कराया था, वे इस मिशन में मेरे बहुत मददगार रहे। एक दो देहात के विधायक तो मुझसे लल्लू लल्लू कहकर बात करते थे जो मुझे बड़ा अच्छा लगता था। कई बार तो श्री नरेंद्र मित्र जी भी मेरे साथ सांसद मनीराम बागड़ी व विधायकों के पास गये।
एक महत्वपूर्ण बात यह है कि पहली बार जिलाधिकारी से मिलने की शुरुआत से लेकर आगे के सभी घटनाक्रमों की जानकारी मैं अमर उजाला के प्रभारी श्री कांति चंद्र जी अग्रवाल तथा सैनिक के प्रभारी श्री नरेंद्र मित्र जी को देता और फिर अखबारों में खबरें छपती उसमें मेरा नाम भी छपता जिससे मैं बड़ा उत्साहित हो जाता यानीं कि छपास का चस्का भी लग चुका था। इस सिलसिले में दिल्ली तो शायद मेरे कमोवेश पन्द्रह बीस चक्कर लगे होंगे तथा एक बार लखनऊ भी गया। जब मेरे लाख सिर पीटने पर भी मामला आगे नहीं बढ़ा तो फिर मैं ऐसा पागल सा हो गया कि पूंछो मत।
मैंने मथुरा में आने वाले हर नेता को मुख्यमंत्री के नाम तैयार साइक्लो स्टाइल वाला ज्ञापन देना शुरू कर दिया (उस समय टाइप की ज्यादा प्रति साइक्लोस्टाइल से ही मिलती थीं) तथा दिल्ली में राष्ट्रीय स्तर के दिग्गजों की कोठियों पर पहुंचकर उनसे मिलना और आए दिन होने वाली मौतों को रोकने की गुहार लगाना शुरू कर दिया। मैंने इंदिरा गांधी जो उस समय सत्ता में नहीं थी से लेकर चंद्रशेखर जो उस समय देश की सत्तारूढ़ जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे, तक अनगिनत नेताओं से मुलाकात की। इंदिरा गांधी ने कहा कि हम तो अपोजिशन में हैं क्या कर सकते हैं? आप जो एप्लीकेशन वगैरा लाए हैं उसे दे जाएं हम इस मामले को पार्लियामेंट में उठवाऐंगे। इंदिरा गांधी उस समय 12 बिल्डिंगन क्रीसैट कोठी में रहती थी
चंद्रशेखर से मुलाकात जनता पार्टी के राष्ट्रीय कार्यालय में हुई। जब वे वहां से निकल कर कहीं जाने हेतु अपनी गाड़ी में बैठने वाले थे। उन्होंने तुरंत अपने पी.ए. को नोट कराया पी.ए. ने गाड़ी के बोनट पर अपनी डायरी रखकर पत्र नोट किया। चंद्रशेखर ने लिखाया कि प्रिय मधु जी (मधु दंडवते जो उस समय रेल मंत्री थे) मथुरा में रेल के पुल पर लगातार लोग कटकर मर रहे हैं। आप तुरन्त इस मामले को देखें और कार्यवाही करें। उसी पत्र में उन्होंने आगे यह भी लिखाया कि पटना में एक आरक्षी के स्थानांतरण के बारे में मैंने पहले भी आपको लिखा था उसका अभी तक अमुक स्थान पर स्थानांतरण नहीं किया गया है। कृपया इस कार्य को भी देखें। इसी दौरान एक दिन मैं मधु दंडवते (रेल मंत्री) से मिलने रेल भवन में गया तो मुझे मिलने की अनुमति नहीं मिली लेकिन मैं नजर बचाकर अपनी तिकड़म से उनके कार्यालय के अन्दर घुस गया। इस पर उन्होंने अपने पी.ए. सुब्रमण्यम को डांट लगाई कि मिस्टर सुब्रमण्यम यह लड़का बगैर अपॉइंटमेंट के कैसे अंदर आ गया? पी.ए. ने मुझसे कहा कि आप पहले अपॉइंटमेंट लें फिर मिल सकोगे यानीं कि मेरी बात तक नहीं सुनी और मैं बैरंग लौट आया। इसके पश्चात दिनों दिन मेरा धमाल बढ़ता चला गया और मैं तरह-तरह से सभी नेताओं का ध्यान इस ओर खींचने लगा। इस दौरान मैं स्थानींय विधायकों व अन्य राजनैतिक लोगों के लेटर पैड मांग लाता था और उन पर मुख्यमंत्री व रेल मंत्री के लिए पत्र टाइप करा कर फिर उनके हस्ताक्षर करा कर डाक से भेज देता और उसकी एक प्रति अखबार में देकर उनकी खबर भी छपवा देता तथा फलस्वरुप नेता भी खुश हो जाते।
एक बार मुख्यमंत्री राम नरेश यादव मथुरा आये पता लगते ही मैं अपनी साइकिल से मिलिट्री हेलीपैड पर भागा। कैरियर पर फाइल लगी हुई थी पुलिस वालों ने रोका तो मैंने कहा कि मुख्यमंत्री जी को बहुत जरूरी कागज पहुंचाने हैं। इस पर उन्होंने मुझे जाने दिया। उस समय मुख्यमंत्री वापस जाने की तैयारी में थे। वे हेलीकॉप्टर में बैठने ही वाले थे कि मैंने अपनी भड़ास निकालते हुए बेलगाम बोलना शुरु कर दिया। संयोग से उस दिन भी रेल से एक दो लोग कट गए थे। मुख्यमंत्री पूरी बात ढंग से समझ नहीं पा रहे थे तब उस समय के चेयरमैन स्वर्गीय श्री एस. के. सी. भार्गव ने मुझसे कहा कि बेटे तुम रुको मैं समझाता हूं।
इसके बाद उन्होंने पूरी बात रामनरेश यादव को समझाई तब मुख्यमंत्री ने डी.एम. व एस.एस.पी. आदि सभी अधिकारियों को डांट लगाई। जब मुख्यमंत्री का हेलीकॉप्टर उड़ गया तब सिटी मजिस्ट्रेट एस. एन. पांडे तथा सीओ सिटी के.डी. दीक्षित मेरी साइकिल को अपनी गाड़ी में रखवाकर मुझे साथ लेकर घटनास्थल तक आये। रास्ते में सिटी मजिस्ट्रेट कुपित हो रहे थे क्योंकि मैंने मुख्यमंत्री से जो शिकायत कर दी थी।
सी.ओ. सिटी दीक्षित बड़े मस्त स्वभाव के थे। वे मुझसे रास्ते में बोले कि गुप्ता जी जरा यह तो बताओ कि किसी लड़की को कभी दिल भी दिया है क्या? इस पर मैंने तपाक से कहा कि आपको अपने स्टूडेंट लाइफ की पुरानीं खुराफातें याद आ रही हैं क्या? मेरी बात का बजाय बुरा मानने के वे दोनों खूब हंसे। इसके बाद उन्होंने कुछ दिन को रेल के पुल पर पुलिस का पहरा बैठा दिया किन्तु बाद में फिर वही ढाक के तीन पात। एक बार तो एक साथ काफी लोग कटकर मर गये यह समाचार देश के सभी बड़े बड़े अखबारों व ऑल इंडिया रेडियो के हर बुलेटिन में पूरे दिन प्रसारित हुआ। मुझे याद है कि हिंदुस्तान टाइम्स के प्रथम पृष्ठ की संक्षेप वाली हेड लाइन में पहले नम्बर पर छपा था इस घटना की पूरे देश में गूंज हुई।
इस पुल पर एक बार टीकमगढ़ के सांसद भैया लाल की पत्नी भी कटकर मर गईं थीं। सांसद मनीराम बागड़ी के पास जब वे मथुरा आते तब और फिर दिल्ली में मैंने अनगिनत चक्कर लगाये। वे तुरंत पत्र तो लिख देते किन्तु बाद में प्रयास पूरी तरह नहीं कर पाते। एक बार जब मुख्यमंत्री बनारसीदास थे तब वे चुनावी सभा के दौरान भगत सिंह पार्क में घोषणा भी कर गये कि मथुरा में यमुना के रेल के पुल पर गैलरी का निर्माण किया जायगा, किंतु चुनाव के बाद टांय टांय फिस्स। रेलवे के बहुत बड़े अधिकारी थे जे.एल. कौल, जो रेल भवन में बैठते थे एक दिन मुझसे बोले कि आपके घर वाले आपको रोकते नहीं है क्या? बार-बार दिल्ली आने को। मनीराम बागड़ी भी मुझे बार बार चक्कर लगाने से बड़े हतप्रत रह जाते। वे कहते कि बेटे मैंने तुम्हारे जैसा लड़का नहीं देखा।
मनीराम बागड़ी से पहले या बाद में यह तो ध्यान नहीं किन्तु चौधरी दिगंबर सिंह ने भी एक बार यह मामला शून्यकाल के दौरान लोकसभा में उठाया था। कन्हैया लाल गुप्त जो विधायक थे उन्हें छोड़कर मथुरा के कई विधायकों ने विधानसभा में यह बात उठाई। कन्हैयालाल जी मुझसे कहते कि बेटे विजय मैं विधानसभा में इस मामले को जोर-शोर से उठा तो दूंगा किन्तु फिर पीडब्ल्यूडी से रिपोर्ट मांगी जाएगी और पी.डब्ल्यू.डी ने अगर यह लिखकर दे दिया कि हमारे पास धन की कमी है अथवा धन आभाव के कारण हम पुल पर गैलरी के निर्माण की धनराशि खर्च करने की स्थिति में नहीं है तो फिर यही बात पी.डब्ल्यू.डी के मंत्री त्रिलोक चंद्र विधानसभा में दे देंगे और मामला समाप्त हो जायगा। खैर यदि किसी विधायक ने इस मामले में सबसे ज्यादा रुचि ली थी तो वे थे कन्हैया लाल गुप्त। वे जड़ में रहकर कार्य करते थे। एक बार कन्हैया लाल जी जिला प्रशासन पर इतने कुपित हुए कि उन्होंने एक बड़ी दुर्घटना के बाद अमर उजाला में एक वक्तव्य जारी करके कहा कि ऐसा लगता है कि प्रशासन का खप्पर अभी खून से भरा नहीं है इस पर पूरा जिला प्रशासन बहुत भारी शर्मिंदगी से भर उठा। इसके बाद काफी दिन तक पुलिस का पहरा पुल पर बना रहा। दरअसल मामला यह था कि रेलवे का कहना था कि हमारी रेल गुजर जाती है हम क्यों बनवाएं? और प्रदेश सरकार कहती कि जब हमने दूसरा नया पुल बनवा दिया है तो लोग क्यों जाते हैं उस पुल पर मरने के लिए।
उस दौरान जिला कांग्रेस के अध्यक्ष श्री पी.एल. मिश्रा थे। उन्होंने मुझसे कहा कि बेटे तुम अच्छा काम कर रहे हो मेरी शुभकामनाएं हैं किन्तु यह कार्य संभव नहीं है क्योंकि हम लोग बहुत प्रयास पहले ही कर चुके हैं। पंडित कमलापति त्रिपाठी जो पहले रेल मंत्री रह चुके थे उनसे भी बहुत कहा जा चुका था। सिर्फ एक व्यक्ति मुझे ऐसे मिले जिन्होंने मुझसे कहा था कि इस कार्य को तुम जरूर करा लोगे। वे थे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कर्मठ कार्यकर्ता बाबूलाल जी होटल वाले। वे कहते थे कि लगी “बड़ी बुरी होती” है और तुम लगे हुए हो और वह भी बड़ी लगन से इसीलिए गैलरी का निर्माण होकर ही रहेगा। बाकी के सभी लोग कहते थे कि खांमखा क्यों पत्थर से सिर मार रहे हो होना जाना कुछ भी नहीं किन्तु मुझे पूरा विश्वास था कि एक न एक दिन मेरी मेहनत जरूर सफल होगी और हुआ भी यही।
खैर हार झक मारकर उत्तर प्रदेश सरकार ने गैलरी के निर्माण का धन स्वीकृत किया। वह धनराशि थी चार लाख चौहत्तर तीन सौ तेईस रुपए। इसके अलावा दस हजार सालाना इसके रखरखाव का। इस कार्य में सफलता न मिलने पर जब मैं हताश सा होने लगा था तब मैंने आमरण अनशन तक की धमकी देकर यह खबर अखबारों में छपवा दी। हालांकि यह सिर्फ धमकी ही थी केवल प्रेशर बनाने के लिए क्योंकि मैं ज्यादा देर तक भूख को बर्दाश्त ही नहीं कर सकता। हां एक चिंता भी जरूर रहती थी कि कहीं मैं आजीवन कुंवारा न रह जाऊं क्योंकि मैंने गैलरी बनाने के बाद ही शादी करने की प्रतिज्ञा जो मन ही मन कर रखी थी। मेरी नींचे की सीढ़ी वालों की शादी तो क्या बच्चे भी पैदा होने लग गये थे। गैलरी निर्माण के लिए मैंने सभी देवी देवताओं से मनौती भी मांगी।
एक और बात अपनी पीठ ठोकते हुए बताता हूं कि पूर्वोत्तर रेलवे के चीफ इंजीनियर ब्रिज श्री पी.एस. सुब्रमण्यम तो मुझसे इतने प्रभावित हुए कि खुद मुझसे मिलने मथुरा आये उनके लिए विशेष सैलून आया था। मथुरा कैंट पर उन्हीं के सलून में मेरी उनसे मुलाकात हुई। उन्होंने मुझे बड़ा सम्मान दिया और गैलरी बनने की पूरी रूपरेखा भी समझाई। गोरखपुर जाकर उन्होंने मुझे एक व्यक्तिगत पत्र लिखकर कहा कि आज देश को आपके जैसे नौजवानों की जरूरत है। इसके अलावा पता नहीं क्या क्या विश्लेषण लिख डाले।
यही हाल विधायक कन्हैया लाल गुप्त जी का था वे अन्तिम दिनों तक मुझसे विशेष स्नेह मानते रहे तथा उनके द्वारा एक दो नहीं दर्जनों पत्र मुझे ऐसे आशीर्वादी लिखे गये कि क्या कहूं। पुल पर पैदल रास्ते के निर्माण का सबसे ज्यादा श्रेय में ईश्वर, पूर्वजों, कांति चंद्र जी अमर उजाला वालों, नरेंद्र मित्र जी सैनिक वालों, कन्हैया लाल जी तथा अपने पिताजी को देता हूं। पिताजी को इसलिए कि उन्होंने भाग दौड़ टाइपिंग व डाक व्यय को बराबर पैसे देते रहे। यही नहीं उन्होंने मुझे यह छूट भी दे दी कि भले ही काम धंधे की ओर कोई ध्यान मत दे पर इस कार्य को करवा कर ही मानना। सन 1968 से शुरू हुआ मेरा यह जुनून 1980 में तब समाप्त हुआ जब इस गैलरी का निर्माण कार्य शुरू हो गया
एक बड़ा भयानक मामला जो घटित नहीं हुआ आपको बताना चाहता हूं। यदि वह मामला घटित हो गया होता तो शायद मथुरा क्या देश भर में हाहाकार मच जाता। बात यह हुई कि जब पुल पर गैलरी के निर्माण की प्रक्रिया शुरू हो गई तो मैंने अपने घर पर खुशी में जलपान की पार्टी रखी जिसमें तत्कालीन विधायक कन्हैया लाल गुप्त, सी.ओ. सिटी के.डी. दीक्षित, कोतवाल बासुदेव श्रोतिय, मूर्धन्य विद्वान डॉ वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी, मूर्धन्य पत्रकार श्री नरेंद्र मित्र, श्री कांति चंद्र जी, हेल्थ ऑफिसर डॉ. के.सी. अग्रवाल तथा शहर के अनेक गणमान्य नागरिक शामिल हुये।
पार्टी के बाद मैंने कहा कि चलो गैलरी के निर्माण का निरीक्षण कर लिया जाय। चूंकि कार्य परली पार से शुरू हुआ था मेरे कहने पर। परली पार जाने के लिए सभी लोग रेल की पटरीयों के मध्य से चल दिये। कुछ ही दूर चले होंगे कि अचानक कैंट की ओर से बड़ी तेजी से माल गाड़ी आ गयी। बस फिर क्या था भगदड़ मच गई कोई वापस पीछे की ओर दौड़ा कोई आगे कोठी पर पहुंचा और जैसे ही सभी लोग आगे पीछे हो कर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचे ही होंगे कि आनन-फानन में गाड़ी धड़धड़ाती हुई पुल से गुजर भी गयी। भगवान का लाख-लाख शुक्र जो ऐसी दुखद घटना घटित होने से बच गयी। जिसकी कल्पना मात्र से आज भी मेरी रूह कांप उठती है।
एक और रोचक बात आपको बताऊं कि कभी-कभी कुछ विधायक व अन्य जनप्रतिनिधि अलकसा भी जाते कि यह लड़का तो रोज-रोज आ जाता है। इसका निदान मैंने इस रूप में किया कि कभी दिवाली आदि के किसी भी मौके पर एक किलो पेड़ों का डब्बा उनकी भेंट कर देता जिससे वे बड़े खुश हो जाते। यह कार्य में सांसद मनीराम बागड़ी तथा अन्य रेलवे के अधिकारियों के साथ भी करता था। केवल कन्हैया लाल गुप्त ही ऐसे विधायक थे जिन्होंने एक किलो क्या एक पेड़ा तक स्वीकार नहीं किया। उस समय के सांसद एवं विधायकों में केवल हुकुम चन्द्र तिवारी ही मौजूद हैं। एक बार तिवारी जी ने अन्य सभी आगन्तुकों के सामने अपने कोतवाली रोड स्थित पुराने घर पर कहकहा लगाते हुए कहा कि “जे लल्लू चांय जो मिनिस्टर हो, बाइके पास पहौंच जाय चांय बासै गैलरी कौ कोई मतलब होय या ना होय” उनके कहने में हास परिहास के साथ उपहास भी था। उसके कुछ दिन बाद दिवाली आई और मैं एक किलो पेड़े का डिब्बा लेकर जा पहुंचा। तिवारी जी बड़े खुश हो गये और बोले कि “विजय बाबू और काई की मिठाई खाऊं या ना खाऊं पर तुम्हारी मिठाई जरूर खाऊंगौ” उसके बाद फिर कभी उन्होंने मेरी हंसी नहीं उड़ाई।
एक और मजेदार बात यह कि इन दुर्घटनाओं में मृतक की संख्या कम करके दिखाने की गरज से आला पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के इशारे पर पुलिसकर्मी बाहर के यात्रियों के कुछ शवों को चुपचाप यमुना में बहा देते और संख्या कम करके बतादी जाती। इसका बदला मैंने इस रूप में लिया कि बाढ़ के दिनों में मैं भी मृतकों की संख्या अधिक बताकर अखबारों में छपवा देता। जब अधिकारी मुझसे कहते के डेड बॉडी तो कम मिली हैं बाकी की कहां हैं? मैं भी झूठ कह देता कि यमुना जी में बह गयीं। वे पूंछते कि कौन था कहां का था कुछ अता पता तो बताओ? इस पर मैं भी यह जवाब दे देता कि इस सब का क्या मैंने ठेका ले रखा है। आप खुद पता करो यह जिम्मेदारी मेरी नहीं आपकी है। इस पर वे बेबस होकर चुप रह जाते। सभी अखबार वाले मेरी बात को मान लेते थे जो मैं लिखकर दे देता वही छप जाता। पत्रकारों के संपर्क में आने के कारण ही आगे चलकर मैं आठवीं तक पढ़ा होकर भी पत्रकार बन बैठा।
जैसे जैसे मैं इस लेख को समाप्त करने की सोचता हूं वैसे वैसे बजाय समाप्त होने के नई नई बातें दिमाग में आ जाती हैं और मैं उन्हें अपने अन्दर रख नहीं पा रहा हूं। एक और रोचक प्रसंग बताता हूं। उस समय सत्तारूढ़ पार्टी के जिला अध्यक्ष ठाकुर जुगेंद्र सिंह थे। उन्होंने मेरा सहयोग भी किया तथा एक बार सिंचाई मंत्री के सामने जिलाधिकारी के. एस. त्रिपाठी को झिड़क सा दिया। असल में सिंचाई विभाग के डाक बंगले पर समस्याओं को लेकर बैठक चल रही थी। मैंने जोगेंद्र सिंह से इस मामले को उठाने को कहा जोगेंद्र सिंह जी ने उन्हें इस बात को बताया और मैंने भी मंत्री को समझाया। मंत्री जी ने जिलाधिकारी से पूंछा तो उन्होंने कहा कि यह मामला पी.डब्ल्यू.डी. से संबंधित है। तथा मेरी ओर इशारा करके कहा कि इन्हें पी.डब्ल्यू.डी. मिनिस्टर को लिखना चाहिए। इस पर जोगेंद्र सिंह जी ने जिलाधिकारी में झिड़की सी लगाते हुए कहा कि इनके लिखने से क्या मतलब निकलेगा कौन सुनेगा इनकी बात? आप किसलिए बैठे हो आपको नहीं लिखना चाहिए क्या? इस पर के.एस. त्रिपाठी का मुंह उतर गया।
अब जोगेंद्र सिंह जी का दूसरा नेगेटिव प्रसंग भी बताता हूं। उन्होंने एक बार मुझसे कहा कि एक बिल्टी छुड़ानी है ढाई सौ रुपए की जरूरत है। मैंने कहा कि ठाकुर साहब में ढाई सौ रुपए कहां से लाऊंगा। इसी भागदौड़ में ही मेरा पूरा जेब खर्च लग जाता है। इस पर उन्होंने कहा कि विष्णु चौबे से दिब्बादै। चूंकि मैंने एक फर्जी कमेटी बना रखी थी उसका नाम था “यमुना रेल पुल निर्माण मांग समिति” उसका अध्यक्ष विष्णु चौबे और मंत्री विजय कुमार गुप्ता थे और उसकी एक मोहर भी बनवा ली। यह सब ड्रामा इसलिए किया कि सरकारों को लगे कि वास्तव में जन आन्दोलन हो रहा है। विष्णु चौबे जी भी खुश उनका नाम भी अखबारों में छपता था।
इसीलिए जोगेंद्र सिंह ने विष्णु जी का नाम ले दिया। मेरे यह कहने पर कि मैं विष्णु जी से अपनी लिखा पढ़ी और भागदौड़ तक के लिए तो एक भी पैसा लेता नहीं आपके लिए क्यों मांगूंगा? बस इसी बात पर वह कुपित हो गये और बोले कि रेल मंत्री का जो जवाबी पत्र मेरे पास आया था, उसे मैंने तुझे दे दिया था, उसे वापस लाकर दे दै। मैंने तुरन्त पत्र उन्हें वापस लाकर दे दिया। इसके बाद तो वह मुझ से दुश्मनी थी मांगने लगे और काफी आगे चलकर जब सड़क हमारे पिताजी के नाम पर हुई तब भी उन्होंने इसका जबरदस्त विरोध ही नहीं किया बल्कि तत्कालीन पालिका अध्यक्ष श्री वीरेंद्र अग्रवाल जी से बहुत कुछ बुरा भला भी कहा। काफी समय बाद जोगेंद्र सिंह जी की एक जमीनी विवाद में रंजिशन हत्या हो गयी थी। मैं उनकी नाराजगी को नजरअंदाज कर उनके द्वारा दिए गए सहयोग के लिए आज भी आभारी हूं।
वीरेंद्र जी को इसी सड़क की वजह से पता नहीं कितनों की भली बुरी सुननीं पड़ी किन्तु वे नहीं झुके और उन्होंने दमदारी से सभी को मुंहतोड़ जवाब देकर निरुत्तर भी किया। मैं वीरेंद्र जी के इस स्नेह को सलाम करता हूं। अब में प्रसंग से हटकर पता नहीं क्या-क्या अप्रसांगिक बातों को लिखे जा रहा हूं। अब आगे बढ़ता हूं पुनः गैलरी वाले प्रसंग की ओर।
एक बार उपराष्ट्रपति बी.डी जत्ती परम पूज्य देवराहा बाबा के यहां आये। जब वे बाबा से बात कर रहे थे तब मैं भी निचाबला नहीं रहा और बातचीत के बीच में रेल के पुल वाला प्रसंग छेड़ दिया तथा हल्ला करके बोला कि बाबा मथुरा में लोग रेल से कट कट कर आये दिन मर रहे हैं। इनसे कहो कि इस काम को करायें। इस पर बाबा ने मुझे डांट लगाई और कहा कि का रेल रेल चिल्लाबत है। चुप रह फिर अन्त में उन्होंने उपराष्ट्रपति से कहा कि इस बचबा ने का कहा सुन लिया ना? इस पर उपराष्ट्रपति ने स्वीकारात्मक सिर हिला दिया।
लोग मेरे बारे में यह सोचते थे कि शायद मैं इस मामले की आड़ में आगे चुनाव लड़ने की बैकग्राउंड बना रहा हूं। एक बार लोहवन गांव के एक रिक्शा चालक दाताराम जाटव की मृत्यु भी इसी पुल पर रेल से कटकर दिवाली पर हो गई। दाताराम एक महिला को बचाने के चक्कर में खुद जान से हाथ धो बैठा था। उसकी पत्नी पछाड़ खा खाकर दहाड़े मार रही थी मुझे उसका करुड़ क्रंदन नहीं देखा जा रहा था तब मैंने कुछ दिन बाद उसकी आर्थिक मदद हेतु पांच सौ रुपए विष्णु जी से कह कर दिलवाये। यह रुपए विष्णु जी मेरे साथ लोहबन जा कर खुद देकर आये थे। पैंतालीस बर्ष पूर्व पांच सौ रुपए की बहुत वकत होती थी। विष्णु जी द्वारा दिए गये इस दान से मुझे बड़ा सुकून मिला।
अंत में कहना चाहूंगा कि मैंने अपनी सेखी बहुत बघार ली कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा भानुमति ने कुनबा जोड़ा ठीक यही स्थिति मेरे लेख की है। बिना ईट गारे और चूने के ही बना दिया उपन्यासी महल और बांध दिये अपनी तारीफों के पुल।
अयोध्या करती है आह्वान, ठाठ से हुआ मंदिर निर्माण, एचपीडी में हुआ रामचरितमानस पाठ
वृंदावन। अयोध्या में श्रीराम मंदिर व रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के उपलक्ष्य में हनुमान प्रसाद धानुका सरस्वती बालिका विद्या मंदिर की छात्राओं ने “अयोध्या करती है आह्वान, ठाठ से हुआ मंदिर निर्माण” इस पंक्ति को चरितार्थ करते हुए हर्षोल्लास व श्रद्धा भाव से रामचरितमानस की चौपाइयों का पाठ, संकीर्तन व सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किये।
शिक्षाविद डॉ उमेश शर्मा ने छात्राओं को प्राण प्रतिष्ठा का अर्थ समझाते हुए कहा कि वैदिक कर्मकांड द्वारा मूर्ति में प्राण प्रवाह होने का आह्वान करना ही प्राण प्रतिष्ठा है। विद्यालय के प्रबंधक विश्वनाथ गुप्ता व प्रधानाचार्य डॉ अंजू सूद ने संयुक्त रूप से बताया कि यह ऐतहासिक क्षण हम सभी के जीवन में लगभग ५०० वर्ष की प्रतीक्षा के बाद आया है। ऐसा अद्भुत गौरवपूर्ण व आनन्दमयी क्षण सृष्टि में कभी नहीं हुआ होगा।
विद्यालय की छात्राओं ने ठुमक ठुमक रामचंद्र, सजा दो घर को गुलशन सा, राम आएंगे तो अंगना सजाऊंगी, हम कथा सुनाते, तेरी चौखट पर चलकर आज चारों धाम आदि गीतों पर मंत्र मुक्त हो राम के प्रति अपने भक्ति भाव को प्रदर्शित किया।
विद्यालय प्रबंध समिति से पद्मनाभ गोस्वामी, रेखा माहेश्वरी, श्री महेश अग्रवाल, बांकेबिहारी शर्मा, मंयक मृणाल आदि ने श्रीराम मंदिर निर्माण व प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम के सफल आयोजन पर हार्दिक हर्ष व श्रद्धाभाव व्यक्त किया।
स्मार्टफोन पाकर ‘स्मार्ट‘ हुए जीएलए के विद्यार्थी
- उत्तर प्रदेश सरकार की डिजी शक्ति योजना के तहत 200 से अधिक विद्यार्थियां को प्रदान किए स्मार्ट फोन
- जीएलए में उत्तर प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री ने विद्यार्थियों को प्रदान किए स्मार्टफोन
मथुरा : उत्तर प्रदेश सरकार की डिजी शक्ति पहल के तहत जीएलए विश्वविद्यालय, मथुरा में स्वामी विवेकानंद युवा सशक्तिकरण योजना के बैनर तले आयोजित कार्यक्रम में 200 से अधिक विद्यार्थियों को स्मार्टफोन वितरित किए गए। मुख्य अतिथि एवं कैबिनेट मंत्री लक्ष्मीनारायण चौधरी एवं जीएलए के सीईओ नीरज अग्रवाल के हाथों से स्मार्टफोन पाकर विद्यार्थी खिलखिलाते हुए नजर आए।
विद्यार्थियों को स्मार्टफोन वितरित करते हुए कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एवं गन्ना विकास एवं चीनी मिल विभाग के कैबिनेट मंत्री लक्ष्मीनारायण चौधरी ने कहा कि कॉम्पटीशन के इस दौर में प्रधानमत्री और मुख्यमंत्री का सपना है कि युवा समग्र रूप में सक्षम हों। आज के इस तकनीकी युग में प्रदेश में वितरित किये जा रहे स्मार्टफोन व टैबलेट से युवा अपनी पढ़ाई व रोजगार को आगे बढ़ाने में सफल होंगे।
कैबिनेट मंत्री ने कहा कि जीएलए विश्वविद्यालय की उत्कृष्ट शिक्षा की सराहना करते हुए कहा कि यह मेरा परम सौभाग्य है कि एक छोटे से वृक्ष से वट वृक्ष बनकर खड़ा जीएलए विश्वविद्यालय में आयोजित इस कार्यक्रम में उपस्थित रहा। सबसे अधिक ख़ुशी इस बात की होती है कि भगवान श्रीकृष्ण की नगरी से अपनी बेहतर शिक्षा की आभा बिखेर रहा यह विश्वविद्यालय अब अपनी छाप विदेशों तक छोड़ रहा है और यहां से शिक्षा प्राप्त कर चुके विद्यार्थी भारत देश का नाम रोशन कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि आजादी के बाद से ही शिक्षा इतर-बितर हो गयी। युवा संस्कार भूल गए। शिक्षा से संस्कृति बिल्कुल ही खत्म होने के कगार पर थी, लेकिन आज प्रधानमंत्री के नेतृत्व में नई शिक्षा नीति ने अपनी वह छाप छोड़ी कि यूएसए ने भी अपनी शिक्षा नीति में भागवत के 10वें स्कन्द को जगह दी। इससे साफ जाहिर होता है कि आने वाले समय में भारत देश एक शक्तिशाली देश बनकर उभरेगा। आज भी युवा शक्ति के कारण ही हमारा देश बढ़ रहा है। समूचे विश्व में से एक देश ऐसा है जहां सबसे अधिक युवा शक्ति का नेतृत्व है वह भारत है। उन्होंने स्वामी विवेकानंद, महारानी विक्टोरिया और बहादुरशाह जफर की जीवनशैली से भी विद्यार्थियों को अवगत कराया।
जीएलए के सीईओ नीरज अग्रवाल ने विद्यार्थियों के उज्जवल भविष्य की कामना करते हुए कहा कि बहुत लंबे समय के बाद ऐसे प्रधानमंत्री हमारे देष को मिले हैं, जो कि देश के विकास की प्रगति को बढ़ाने के साथ युवा शक्ति को बढाने पर जोर दे रहे हैं। जो देश हित में है वह हर काम प्रधानमंत्री और प्रदेश के मुख्यमंत्री मिलकर कर रहे हैं। नीरज अग्रवाल ने कहा कि कैबिनेट मंत्री के हाथों जीएलए के छात्र स्मार्टफोन पाकर काफी प्रफुल्लित हैं। सरकार की इस योजना पर विद्यार्थी खरा उतरेंगे।
डीन एकेडमिक प्रो. आशीष शर्मा ने अतिथियों और सरकार की योजना के बारे में विद्यार्थियों को जानकारी दी।
कार्यक्रम का संचालन एसोसिएट प्रोफेसर डा. विवेक मेहरोत्रा ने किया।
इस अवसर पर डीआईओएस भास्कर मिश्र, जीएलए के कुलसचिव अशोक कुमार सिंह, प्रशासनिक अधिकारी दीपक गौड एवं विभागों के शिक्षकगण उपस्थित रहे।

