Sunday, December 4, 2022
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रामकिशोर को मिली सेठ की उपाधि

रिपोर्ट:- विजय कुमार गुप्ता

मथुरा। जनपद में उच्च शिक्षा के जनक माने जाने वाले डाॅ रामकिशोर अग्रवाल को सेठ की उपाधि से नवाजा गया है। यह उपाधि जनता जनार्दन ने दी है क्योंकि लोग अब उन्हें सेठ रामकिशोर के नाम से संबोधित करने लगे हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि जीएसटी और नोटबंदी के बाद मथुरा के अनेक धनवानों ने न सिर्फ आपस में एक दूसरे की बल्कि गरीबों तक की रकम मार ली थी लेकिन सेठ रामकिशोर अग्रवाल ने खुद तो किसी की रकम नहीं मारी अपितु जिन्होंने उनकी रकम मारी, उसकी उन्होंने उफ तक नहीं की और यह कह दिया कि हो सकता है, पिछले जन्म में मैंने इनकी रकम मार ली हो, शायद भगवान ने इसीलिए हिसाब बराबर किया है।
नोटबंदी और जीएसटी के बाद लोगों में यह कहावत बनी कि जो जितना बड़ा धनवान वह उतना बड़ा बेईमान लेकिन रामकिशोर ने यह भ्रांति तोड़ी तथा यह सिद्ध करके दिखा दिया कि भ्रांति से उपजी यह कहावत उनके ऊपर लागू नहीं होती। यही कारण है कि अब लोगों के मुंह से रामकिशोर का नाम आते ही अपने आप ही उसके आगे सेठ लगने लगा है।
सेठ रामकिशोर से जब इस बारे में बात की गई तो वह कहते हैं कि मेरे पिताजी कहते थे कि बेटा किसी का माल मत मारना, यदि बेईमानी करोगे तो अगले जन्म में गधा घोड़ा बनकर कर्ज चुकाओगे। वे कहते हैं कि मैं सेठ नहीं हूं, मैं तो एक साधारण सा इंसान हूं और इंसान ही रहना चाहता हूं।
मैंने इस बावत अनेक लोगों से बात की कि शायद ऐसा न हो कि कहीं रामकिशोर जी के तार भी इस समय प्रचलित माल मारू संस्कृति से जुड़े हुए न हों लेकिन सभी ने यही कहा कि सेठ रामकिशोर ने किसी के साथ बेईमानी नहीं की। अभी तक एक भी व्यक्ति सामने नहीं आया है जिसने यह कहा हो कि इसने मेरे पैसे मार लिए हैं। हालांकि माल मारू संस्कृति से बड़े-बड़े धन्ना सेठ भी अछूते नहीं रह सके हैं।
हमारा यह तात्पर्य नहीं कि सेठ रामकिशोर जी कोई दूध के धुले हुए ऐसे व्यक्ति हैं, जिनके ऊपर कोई किसी भी प्रकार से ऊंगली भी न उठा सके कि ये एकदम पाक साफ और बड़े धर्मात्मा हैं। हो सकता है उनमें भी कोई न कोई कमी होगी किंन्तु उनकी सभी कमियां इस एक अच्छाई ने ढक दीं। कहते हैं कि ‘ना सूरत बुरी है, ना सीहत बुरी है, बुरा है वही, जिसकी नीयत बुरी है।’
सेठ रामकिशोर जी हैं बड़े खुर्राट। बातों ही बातों में सब कुछ भांप जाते हैं। ये वो चीज हैं जो उड़ती चिड़िया के पर गिनने और बंद लिफाफे का मजमून पढ़ लेने की महारत रखते हैं। इनका सिद्धांत मैंने यह महसूस किया है कि जो आपको ना माने ताके बाप को ना मानें। इनमें छुट्ट भलाई के सभी गुण विद्यमान है और हैं बड़े दरिया दिल इंसान।
जब इनसे यह कहा गया कि आप भी पदमश्री की लाइन में क्यों नहीं लगते? इस पर उन्होंने कहा कि मैं साधारण इंसान पदमश्री के लायक नहीं। जब उनसे कहा कि आपके चाचाजी सेठ नारायण दास जी के नाम की चर्चा जोरों पर है, तो उनका कहना था कि यह मेरे लिए गौरव की बात होगी आखिर खून तो एक ही है। वे हमारे चाचा हैं, चाचा का स्थान बड़ा होता है। एक मजेदार बात यह है कि चाचा इनसे एक दो साल छोटे हैं और ये उनसे उम्र में बड़े हैं लेकिन यह बार-बार यही कहते हैं कि उम्र से नहीं, रिश्ते तो ऊंचाई नीचाई से मापे जाते हैं।

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