Sunday, December 4, 2022
Homeविजय गुप्ता की कलम सेतेज रफ्तार से गाड़ी आई और शैलेज भगत ने छलांग लगाई

तेज रफ्तार से गाड़ी आई और शैलेज भगत ने छलांग लगाई

रिपोर्ट – विजय कुमार गुप्ता

मथुरा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के चहेते पूर्व डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस तथा वर्तमान में चीफ सेक्रेट्री का दर्जा प्राप्त संत शैलजाकांत बचपन में बड़े ऊधमी थे। आजकल के गंभीर और शांत स्वभाव के शैलजाकांत मिश्र के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता कि ये ऐसे खतरनाक ऊधमी रहे होंगे जो जान की बाजी लगाने से भी नहीं चूकते थे।
शैलजाकांत जी बताते हैं कि आजमगढ़ में जहां उनका घर था, उसके आगे सड़क थी। वहां होकर गाड़ियों का आवागमन रहता था। जब कोई गाड़ी तेज रफ्तार से गुजरती तो वे उसके एकदम निकट आते ही हिरण की तरह कुलांचे भरते हुए सड़क पार कर जाते।
कई बार ऐसा भी हुआ कि मौत से दो-दो हाथ हो गये लेकिन रिस्क उठाकर अपनी हसरत पूरी करने की तमन्ना के आगे घरवालों की डांट डपट और अपनी जान की परवाह भी बालक शैलजाकांत के आगे बोनी पड़ जाती थी। बोनी पड़ेगी भी क्यों नहीं संत शिरोमणि देवराहा बाबा का आशीर्वाद जो उनके साथ था।
उल्लेखनीय है कि शैलजाकांत जी की माताजी उन्हें बहुत छोटी सी उम्र से ही संत देवराहा बाबा के पैरों को धो-धो कर उस चरणामृत को पिलाती थी। देवराहा बाबा उन्हें प्यार से शैलेज भगत या शैलेज बच्चा कहा करते थे। मिश्रा जी की कई पीढ़ियों की संत देवराहा बाबा के प्रति अटूट श्रद्धा चली आ रही थी जिसमें ननिहाल भी शामिल था।
दरअसल मैंने कुछ दिन पूर्व अपने ऊधमीपन के बारे में एक समाचार छापा कि ‘मैं अभी तक सुधरा नहीं’। इसी संदर्भ में मिश्रा जी ने मुझसे कहा कि विजय बाबू बचपन में तो मैं भी बहुत ऊधमी रहा था। इस घटना को बताते समय मिश्रा जी ने मुझसे कहा कि विजय बाबू इसे छाप मत देना और मैंने उनसे वादा भी कर लिया किन्तु मेरा ऊधमीपन जाने वाला कहां। मैंने बाद में अनुनय विनय करके उन्हें खबर छापने के लिए आखिर मना ही लिया क्योंकि जब अपने ऊधमीपन को छाप दिया तो फिर मिश्रा जी को भला कैसे छोड़ सकता हूं। वे एक बार मुझसे कह भी चुके हैं, विजय बाबू आप से बतियाना बड़ा खतरनाक होता है। इसीलिए मन की बात करते समय अक्सर मुझसे कहते रहते हैं कि इसे छाप मत देना। वो वाली कहावत है कि दूध का जला छाछ को भी फूंक-फूंक कर पीता है।
मुझमें और मिश्रा जी में फर्क इतना है कि वे भले ही बचपन में ऊधमी रहे हों किन्तु बड़े होकर सुधर गये लेकिन मैं तो अभी तक नहीं सुधरा। बल्कि यों कहा जाय कि बचपन से बुढ़ापा आ गया लेकिन ऊधमीपन जाने का नाम नहीं ले रहा। उल्टे दिन दूना और रात चौगुना बढ़ता ही चला जा रहा है।

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