Monday, September 27, 2021
Homeविजय गुप्ता की कलम सेतेरा दर्द न जाने कोय

तेरा दर्द न जाने कोय

विजय कुमार गुप्ता

मथुरा। तोता या अन्य किसी पक्षी को पिंजरे में कैद देखकर बरबस ही प्रदीप के इस गाने की पंक्तियां मन में चलने लगती हैं पिंजरे के पंछी रे तेरा दर्द न जाने कोय, बाहर से तू खामोश लगे है, भीतर भीतर रोय। विधि ने तेरी कथा लिखी आंसू में कलम डुबोय, तेरा दर्द न जाने कोय।
वाह रे लिखने वाले क्या सजीव चित्रण किया है पिंजरे में कैद पक्षी की दर्दनाक दास्तां का। इन पंक्तियों को सुनते या मन में आते ही मन रोने लगता है, सोच सोच कर कि क्या बीतती है उस निरीह प्राणी पर। धन्य हैं प्रदीप और धिक्कार है हम इंसानों को जो मात्र अपने मनोरंजन के लिए इन निर्दोष और निरीह प्राणियों को पिंजरे के अंदर कैद करके ता जिंदगी उन्हें तड़फा तड़फा कर पैशाचिक अत्याचार करते हैं।
पशु पक्षी और जीव-जंतु प्रेमी मनोज तौमर कहते हैं कि अपने परिवार के किसी बच्चे को यदि जेल हो जाती है तो धरती आसमान एक करके यह कोशिश करते हैं कि किसी भी प्रकार उसे जेल से छुड़ाएं, भले ही वह जघन्य अपराध का दोषी हो किंतु निर्दोषों को जीवन भर के लिए जेल में डालने की कोई फिक्र नहीं। अरे भाई वह भी तो किसी का बच्चा है उसकी भी तो सोचो। लेकिन नहीं उसकी नहीं सोचेंगे क्योंकि वह उनका अपना बच्चा नहीं है। क्या बीतती होगी उसकी मां पर जब उसके घोंसले से उसका लाल अपहरण करके ले जाया जाता है। और वह टुकुर टुकुर देखती और तड़फती रह जाती है। इस तड़फन से निकली आह इनके समूचे परिवार का विनाश कर देती है। इसमें कोई शक नहीं कि आज जिस वैश्विक महामारी से पूरी दुनियां हाहाकार कर रही है, उसके पीछे इंसानों द्वारा मूक बेजुबान और निर्दोष पशु पक्षियों एवं जीव जंतुओं के ऊपर जघन्य एवं पैशाचिक अत्याचार किया जाना मुख्य कारण है। आखिर क्या बिगाड़ा है इन बेगुनाह प्राणियों ने, ये तो ईश्वर द्वारा बनाए संसार की बगिया के तरह तरह के फूल है।
कुछ लोग तो ऐसे बेरहम और पत्थर दिल होते हैं कि इतने छोटे-छोटे पिंजरों में तोते पालते हैं कि वे अपने परों को न फड़फड़ा सकें। यह स्थिति ठीक उस प्रकार है जैसे किसी इंसान को हाथ पैर बांधकर एक कमरे में बंद करके पटक दिया जाय। जरा कल्पना करके देखिए कि हमें हाथ पैर बांधकर जिंदगी भर के लिए एक कमरे में पटक दिया जाय तो कैसा लगेगा? यही स्थिति आसमान में स्वच्छंद विचरण करने वाले इन मासूमों की है। धिक्कार है ऐसे इंसानों को।
यदि कोई पक्षी घायल है या फिर घोंसले से गिरा छोटा बच्चा है, उसका उपचार व लालन-पालन करें तथा जब उड़ने लायक हो जाय तब उसे आसमान में बिचरने के लिए छोड़ दें। यदि वह ठीक न हो सके तो जीवन भर के लिए उसे पारिवारिक सदस्य की तरह पालें। यह तो हमारा कर्तव्य है किंतु ऐसे पक्षियों को आश्रय देकर उनकी जान बचाने के बजाय सही सलामत पक्षियों को खरीद कर या उनके घोंसले में से निकाल कर उन्हें कैद करके रखना जीवन का सबसे बड़ा घृणित एवं अक्षम्य अपराध है। उनकी हत्या करने से भी कहीं अधिक बड़ा अपराध होता है उन्हें जीवन भर तड़फाना। याद रखो यदि आप इन्हें पिंजरे में कैद करके रखोगे तो हो सकता है आपको अगला जन्म पक्षी का मिले और अपने इस कृत्य की सजा भुगतने के लिए आपका भी वही हश्र हो जो इनका हो रहा है। यह सजा मय ब्याज के कई कई जन्मों तक भी भुगतनी पड़ सकती है। यह ध्रुव सत्य है कि जैसा करोगे वैसा भरोगे।
इसके अलावा इनकी आह आपको यानीं कैद करके सताने वालों को इस कदर लगती है जो पूरे जीवन भर तिल तिल करके मारती है। यानीं कि तरह-तरह की कष्टदायी आपदाएं पूरे परिवार पर आती रहती हैं और संपूर्ण जीवन नरक जैसा हो जाता है क्योंकि ये पल-पल उन्हें बद्दुआऐं देते हैं। निर्बल को न सताइये जाकी मोटी हाय मरी खाल की स्वांस सौं लौह भसम हुइ जाय। पुराने जमाने में लुहार आग को तेज करने के लिए मरे हुए जानवर की खाल से धौंकनी बनाकर उससे हवा छोड़ते थे और उस हवा से भड़की तेज आग से लोहा भी पिघल जाता था। धौंकनी तकिया की तरह गद्दी नुमा होती है। जिसे ऊंचा करने से हवा उसके अंदर प्रवेश कर जाती है और नीचा करते ही हवा निकल जाती है। अच्छा हो हम लोग इस कहावत से प्रेरणा लें तथा बेकसूर पक्षियों को पिंजरे में कैद करके सताने से बाज आएं वरना ऊपर की अदालत से होने वाली सजा का इंतजार करें और फिर ‘अब पछताऐ होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत’ वाली कहावत चरितार्थ होगी।

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