Monday, April 22, 2024
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आग लगै ऐसी जा निगोड़ी होरी में

मथुरा। कुछ राक्षसी वृत्ति के लोगों द्वारा होली के इस पवित्र त्यौहार का ऐसा विकृत स्वरूप बना दिया है, जिससे मेरे मन में होली के नाम पर होने वाले इन पैशाचिक कृत्यों को देख देख कर आग सी लग जाती है।
     बचपन से सुनते आ रहे हैं कि होली आपसी प्रेम और सौहार्द बढ़ाने का त्यौहार है। इस दिन लोग अपनी दुश्मनीं को भूल कर एक दूसरे के गले मिलकर गिले-शिकवे दूर करते हैं, किंतु स्थिति इससे एकदम उलट है। दुश्मनीयां दूर होना तो बहुत दूर की बात है बल्कि होली के त्यौहार पर दुश्मनीयां बनती हैं तथा पूरे भारत में होली के हुड़दंग के नाम पर अनेक लोग घायल होते हैं तथा बहुत से मर भी जाते हैं।
     हालांकि होली का त्योहार अब निकल चुका है पर अगली बार फिर आएगा और फिर वही नींचता का नंगा नाच होगा। यह सब बताने की जरूरत नहीं कि होली के नाम पर क्या-क्या नींचतायें होती हैं। भले लोगों और बहन बेटियों का तो घर से निकलना भी दुश्वार हो जाता है। ऐसा लगता है कि होली के नाम पर इन चांडालों को अपनी हैवानियत दिखाने का लाइसेंस मिल जाता है। शराब पी पीकर जो नंगा नाच करते हैं वह किसी से छिपा नहीं है। होली के नाम पर जो कुछ हो रहा है यदि इसी को होली कहते हैं तो फिर मुझे भी यह कहने में जरा भी संकोच नहीं कि ” आग लगै ऐसी जा निगोड़ी होली में” इससे तो अच्छा यह है कि होली का त्योहार ही मनाना बंद कर दिया जाय। होली का त्योहार मनाना बंद करने वाली बात तो सिर्फ कपोल कल्पित है। होली मनाना तो कभी बंद होगा नहीं और ना ही होना चाहिए। यह तो सिर्फ मेरी भड़ास निकालने वाली बात है।
     अब फिर कैसे इन पिशाचों के कृत्यों से छुटकारा मिले? जहां तक मैं समझता हूं पूरी तरह छुटकारा तो शायद कभी नहीं मिलेगा क्योंकि कलयुग में नींचों की पौ बारह होती है। यह सब कुछ हमारे धर्म शास्त्रों में उल्लखित है। हमारे पिताजी कहते थे कि सबसे बड़े चार त्योहार हैं। दिवाली, होली, रक्षाबंधन और दशहरा। दिवाली वैश्यों, रक्षाबंधन विप्रो, दशहरा क्षत्रियों तथा होली शूद्रों के अधिक प्रिय होते हैं। वैसे तो चारों वर्ण ही सभी चारों त्योहारों को मनाते हैं किंतु जिस प्रकार पूर्वजों ने इन चारों त्योहारों की चारों वर्णों में व्याख्या की है वह अपने आप में सटीक है। खैर जो भी है ईश्वर की इच्छा किंतु इतना जरूर कहूंगा कि आंख मूंदकर इन नींचों की नींचता को सहने के बजाय जिसकी जितनीं क्षमता हो उसके अनुरूप नींचताओं का प्रतिरोध करें। भले ही थोड़ा बहुत खामियाजा भुगत लें पर प्रतिरोध करने में पीछे नहीं रहें।
     यह बात मैं सिर्फ कह नहीं रहा हूं बल्कि अपने विचारों का अनुसरण प्रैक्टिकल में भी करता हूं। हमारे नलकूप (घर) के आसपास मजाल है कि कोई उपद्रवी निम्न स्तरीय हरकत कर जाय। यह परंपरा मैं कई दशकों से निभा रहा हूं इस चक्कर में कई बार उपद्रवियों को उनकी औकात समझानी पड़ी यहां तक कि पुलिस को भी बुलाना पड़ा। जिसका जितना सामर्थ हो वह अपनीं क्षमतानुसार इन दुष्टों का विरोध करते रहें यह पुण्यात्मक कार्य होगा। मेरे तो यही विचार हैं बाकी जो ईश्वर इच्छा, हो सकता है कुछ राक्षसी विचारधारा वालों को मेरी बात नागवार गुजरे।

विजय गुप्ता की कलम से

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