Monday, April 22, 2024
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आपको ना माने ताके बाप को ना माने वाले सिद्धांत ने ही नानू को शिखर तक पहुंचाया

मथुरा। आज मैं महेश पाठक जिनका उपनाम “नानू” भी है की चर्चा कर रहा हूं। इनके बारे में ज्यादा बताने की जरूरत नहीं है कि ये कौन हैं क्या हैं? सब लोग जानते हैं। पर इतना जरूर कहूंगा कि ये बड़े जीदार हैं और यारों के यार हैं। इनका सिद्धांत है “आपको ना मानें ताके बाप को ना मानें” मेरा मानना है कि इनके इसी सिद्धांत ने ही इन्हें शिखर तक पहुंचाया है। ये बड़े खुद्दार तो हैं ही किंतु वक्त आने पर खूंखार बनते भी इन्हें देर नहीं लगती लेकिन इनका यह स्वरूप भलों के लिए नहीं, उन बुरों के लिए है जो इसके पात्र होते हैं।
     भले ही ये न विधायक हैं, न सांसद हैं और ना ही मंत्री किंतु ये जो कुछ हैं उसके आगे वे लोग भी बौने नजर आते हैं, जो ये सब बने बैठे हैं। मैं इन्हें लगभग आधी शताब्दी से जानता हूं तथा करीब चार दशक से मेरी इनसे मित्रता है बल्कि यों कहा जाए कि मित्रता कम और अंतरंगता वाला स्नेह अधिक है, तो गलत नहीं होगा। इन्होंने अपने जीवन में एक से बढ़कर एक अच्छे काम किए हैं किंतु मेरी नजर में जो सबसे अच्छा काम किया वह यह है कि किसी जमाने में मथुरा को ऐसे दुर्दांत एवं खौफनाक कातिलों से भयमुक्त कराया जिनके नाम से बड़े-बड़े शातिर भी दहल जाते थे, न सिर्फ उनसे मुक्ति दिलाई बल्कि उनके भाई, पुत्र आदि परिजनों के खौफ से भी निजात दिलाई।
     भले ही ये मूंछें नहीं रखते किंतु जब बात मूछों की होती है तो फिर मुछमुंडे होते हुए भी बड़ी-बड़ी मूछों वाले मुंच्छडों की मूंछ नींची कराकर ही दम लेते हैं। इनकी यह स्थिति केवल वर्तमान की ही नहीं बल्कि उस समय से रही है जब ये किशोरावस्था में थे। अपनीं गली मोहल्ले में अपने हम उम्रों के बॉस बने रहते थे। ठसक मिजाज तो ये शुरू से ही रहे हैं जिससे मोहब्बत की बेइंतहा की और निभाई भी, ऐसे सौभाग्यशालीयों में स्वयं मैं भी हूं। लेकिन जो इनकी नजरों से गिरा वह जमीन सूंंघता या यों कहिए जमींदोज होता नजर आया। ईश्वर व पूर्वजों की इनके ऊपर ऐसी असीम कृपा है कि लगभग पांच छः दशक से यानी किशोरावस्था से लेकर अब अर्ध बुड्ढे होने तक इनका झंडा शिखर पर लहरा रहा है।
     चाहे चतुर्वेदी समाज हो या गैर चतुर्वेदी, राजनीत हो या गैर राजनीति या फिर उद्योग जगत ही क्यों न हो हर क्षेत्र के ये चैंपियन हैं। इन्हें ऑलराउंडर कहा जाए तो गलत नहीं होगा। रंगबाजी में तो ये ऐसे सुपरस्टार हैं कि बड़े-बड़े धुरंधर रंगबाज इनकी चौखट पर मत्था टेकते हैं। इनकी एक बात जो मुझे बड़ी पसंद है, वह यह कि इनके साथ कोई जरा सा भी एहसान कर दे तो फिर ये उस राई से एहसान को भी पहाड़ जैसा मानकर उसके लिए हमेशा जीजान न्यौछावर किए रहते हैं।
     सबसे ज्यादा अद्भुत बात यह है कि मैंने मथुरा में आज तक ऐसा कोई माई का लाल नहीं देखा जिसकी शीर्ष स्तर के राष्ट्रीय नेताओं में इतनी जबरदस्त पकड़ रही हो। नरसिम्हा राव, राजीव गांधी तो इनके बेहद करीबी थे‌। राष्ट्रीय स्तर को छोड़िए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विदेशी राजदूतों से लेकर राष्ट्राध्यक्षों तक इनकी उठक बैठक ही नहीं बल्कि शादी समारोह में आना जाना भी है। न सिर्फ चतुर्वेदी समाज अपितु समूचे मथुरा के लिए यह गौरव की बात है। महेश पाठक के चेहरे पर लालिमा भी बेमिसाल है। जिस प्रकार फिल्म अभिनेत्री रेखा व हेमा ने उम्र को गच्चा दिया, उसी प्रकार महेश पाठक भी उम्र को बच्चा दे रहे हैं। उल्लेखनींय है कि महेश पाठक दो दशक पूर्व भी कांग्रेस की टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ चुके थे। उस दौरान उनके प्रचार के लिए सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी मथुरा आए और उन्होंने के.आर. इंटर कॉलेज मैदान पर बड़ी जनसभा की। उस समय सोनिया, प्रियंका और राहुल के आगमन पर जो भीड़ एकत्रित हुई थी वह इतनी विशाल थी कि एक बार तो ऐसा लगा कि ये जीत रहे हैं किंतु इन्हें जीत नहीं हार का हार पहनने को मिला। ठीक है यही हार उन्हें पिछले लोकसभा चुनावों में हेमा मालिनी ने पहना दिया।
     हेमा मालिनी से हारने की झुंझलाहट इन्होंने पिछले वर्ष ऐसी निकाली कि वह भी मिसमिसा कर रह गईं। दरअसल हेमा मालिनी ने विश्राम घाट के सामने यमुना पर एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन रखा जिसमें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का बतौर मुख्य अतिथि आना भी तय हो गया किंतु महेश पाठक ने चैलेंज कर दिया कि इस आयोजन को होने ही नहीं दूंगा। उनका कुपित होना स्वाभाविक भी था क्योंकि एक तो ये उनसे हार चुके थे दूसरे विश्राम घाट चौबों का गढ़ है और विश्राम घाट के सामने यमुनापार जहां यह आयोजन होना था वह स्थान भी चतुर्वेदी समाज का है। महेश पाठक ने ऐसे तुरुप के इक्के चले कि न सिर्फ मुख्यमंत्री ने अपना आना रद्द किया बल्कि हेमा मालिनी को भी कार्यक्रम करने का विचार त्यागना पड़ा।
     अब मैं अपने से जुड़े इनके कुछ रोचक किस्से बताता हूं, बात लगभग 25-30 वर्ष पुरानीं है। एक बार इन्होंने दिल्ली में एक डिनर पार्टी दी जिसमें मुझे भी बुलाया, इनके अति निकटस्थ नवीन नागर जी मुझे अपने साथ लेकर गए। डिनर पार्टी में देश ही नहीं विदेशों तक की बड़ी-बड़ी हस्तियां मौजूद थीं, जिनमें तमाम राजनेताओं से लेकर फिल्मी हस्तियां भी शामिल हुई हेमा मालिनी जिनसे ये हारे थे, वे भी थीं। उस पार्टी में मैंने एक ऐसी मोटी, ताजी, लंबी, चौड़ी विदेशी महिला देखी जिसे देखकर मैं चौंक गया क्योंकि मैंने अपने जीवन में ऐसी तगड़ी महिला कभी नहीं देखी थी। मैंने जिज्ञासावश पता किया कि ये कौन हैं? तो पता चला कि वे उस समय के मौजूदा संयुक्त राष्ट्र संघ महासचिव की मैम साहब थीं। खैर इस बात से क्या लेना देना, अब मैं आगे बढ़ता हूं मतलब की बात पर। डिनर पार्टी में खानपान हर प्रकार का था। यानी जिसको जो खाना है खाओ, जो पीना हो पियो पाठक जी किसी वी.वी.आई.पी. के पीछे नहीं लग रहे थे। बस प्रवेश वाली जगह पर खड़े होकर उनका हाय हलो का सिलसिला चल रहा था। मुझे उन्होंने अपनी बगल में खड़ा कर लिया और बोले कि आओ गुप्ता जी आप मेरे साथ रहो कहां भटकते फिरोगे।
     मेरे पेट में चूहे उछल कूद मचा रहे थे और ऐसे खान-पान भले ही वह दोनों तरह का रहा हो, वाली जगह पर तो मुझे खड़े होना भी अखर रहा था। कुछ समय तो मैंने संयम बरता और जब धैर्य जवाब दे गया तो मैंने अपने अंदर का जहर मुंह से निकाल ही डाला तथा कई लोगों के सामने उनसे कहा कि तुम कैसे मथुरा के चौबे हो जो ऐसा आसुरी खानपान लोगों को खिलावा रहे हो। इस पर पाठक जी ने धैर्य से कहा कि गुप्ता जी आप जैसों की व्यवस्था तो अलग है। मैं देखा कि भाड़ में गई अलग व्यवस्था में तो यहां का पानीं तक नहीं पिऊंगा।
     मेरा यह कहना था कि बगल में खड़े पाठक जी के खासम खास और हमारे प्रिय मित्र नवीन नागर जी अपने पैर से मेरे पैर को जोर-जोर से दबाकर कहने लगे कि “अरे मान्यवर जे का कह रहे हौ” यह डायलॉग उनके मुंह से कई बार निकला। मैंने उन्हें रोककर कहा कि नागर जी तुम बीच में मत बोलो मुझे अपनी बात तो कहने दो। इसके कुछ क्षण बाद पाठक जी मुझसे बड़ी तसल्ली के साथ बोले कि गुप्ता जी बात तो आपकी सही है किंतु यदि मैं ऐसा नहीं करूंगा तो फिर यहां कोई नहीं आएगा। बात उनकी अपनी जगह सोलह आने सच थी किंतु में भी तो अपने विचार और स्वभाव को नहीं छोड़ सकता। हालांकि पाठक जी स्वयं कुछ भी नहीं खा पी रहे थे सिर्फ लोगों का साथ देने के लिए कभी ककड़ी और कभी खीरे का एकाध टुकड़ा मुंह में डाल लेते। बाद में जब रात्रि गहराने लगी तो मैंने कहा कि अब तो मुझे मुक्त करो। इस पर वे बोले कि अगर थोड़ी देर और रुको तो फिर मेरे साथ घर चलना तथा घीया का साग और सूखी रोटी खाना। खैर मैंने उनसे विदा ली और नागर जी ने दिल्ली के बाहर आकर गोवर्धन होटल पर मुझे शुद्ध शाकाहारी भोजन कराया।
     एक और रोचक किस्सा भी बताता हूं, बात लगभग बीस वर्ष पुरानीं है। मुंबई में हमारी एक बड़ी बहन रहती हैं उनका स्वास्थ्य ज्यादा खराब हुआ तथा ऑपरेशन भी कराना पड़ गया। जिस अस्पताल में इलाज चल रहा था, वह रिलायंस वालों का था। नाम मुझे याद नहीं हमारे बहनोई ने कहा कि तुम्हारी तो रिलायंस के मालिक धीरूभाई अंबानी के खास दीनानाथ चतुर्वेदी जी से अच्छी जान पहचान है। यदि हो सके तो अस्पताल में कुछ डिस्काउंट करादो क्योंकि मोटी रकम खर्च हो चुकी है और इस समय हाथ थोड़ा टाइट चल रहा है।
     मैंने दीनानाथ जी को फोन करके वस्तु स्थिति से अवगत कराया। दीनानाथ जी ने अस्पताल के संचालक केतन भाई सेठ से बात की, बात करने के बाद दीनानाथ जी ने मुझे बताया कि यह कार्य असंभव है क्योंकि तुम्हारी बहन प्राइवेट रूम में हैं और जो मरीज प्राइवेट रूम में होते हैं उनके साथ रियायत करने का कोई प्रावधान नहीं है। बात तो उनकी अपनी जगह सही थी किंतु मैंने अपने बहनोई को भरोसा दिला दिया था कि आप चिंता न करें मैं दीनानाथ जी से सिफारिश लगवाकर काम करा दूंगा। दीनानाथ जी कोई छोटे मोटे आदमी नहीं हैं। धीरूभाई को बड़ा आदमी बनाने में उनका सबसे ज्यादा योगदान था क्योंकि वे रिलायंस ग्रुप के चार्टर्ड अकाउंटेंट थे और धीरूभाई के खासम खास भी। मैंने खुद अपनी आंखों से अपने घर के बराबर गिरधर मोरारी गेस्ट हाउस जो दीनानाथ जी का है, के बाहर सड़क पर बने चबूतरे पर धीरुभाई को गोल तकिया यानी मसनद लगाकर आराम करते देखा है तथा धीरुभाई की पत्रकार वार्ता भी की जब उन्होंने गिरधर मोरारी गेस्ट हाउस में निशुल्क नेत्र शिविर लगवाया था। इन बातों को करीब चालीस वर्ष हो गए।
     अब जब दीनानाथ जी जैसी हस्ती ने भी हाथ खड़े कर दिए तो मुझे अपने मित्र महेश पाठक की याद आई। मैंने सुन रखा था कि बम्बई में भी इनके बड़े जलवे हैं। मुख्यमंत्री तक इनकी बात टाल नहीं पाते यानी रंग रुतवा तगड़ा है। मैंने सोचा कि परीक्षण कर लिया जाए शायद कोई बात बन जाए और मेरी बात भी रह जाय। मैंने महेश भाई को फोन करके सारी बात बताई, वे बोले कि तुम चिंता मत करो मैं बात करता हूं। इसके बाद इन्होंने किसी से बात की और कहा कि तुम अपने बहनोई को अस्पताल भेज देना काम हो जायगा। महेश पाठक का ऐसा रुतबा रहा कि उस समय लगभग तीस पैंतीस हजार रुपए बकाया थे। अस्पताल वालों ने पूरे पैसे माफ ही नहीं किए बल्कि बड़ी इज्जत दी और कहा कि भाई आखिर कौन सी हस्ती से सिफारिश लगवाई जो सारे नियम ताक पर रखे रह गए और पूरे पैसे माफ हो गए।
     अंत में मेरे प्रति महेश पाठक की बेइंतहा मोहब्बत की एक और छोटी सी बानगी से रूबरू कराता हूं। बात उन दिनों की है जब बलराम जाखड़ लोकसभा अध्यक्ष थे तथा महेश पाठक के यहां इनके पुत्र की शादी में ए.टी.वी. नगर में आए हुए थे। जब वे विदा होने को थे तो पाठक जी उन्हें बाहर तक छोड़ने आए भीड़ बहुत थी। मैं भीड़ से अलग हटकर काफी दूर एक पेड़ के नींचे जाकर खड़ा हो गया। रात्रि का समय था किंतु महेश पाठक की पैनीं नजरों ने मुझे ताड़ लिया और हाथ ऊपर करके जोर जोर से चिल्लाने लगे गुप्ता जी, गुप्ता जी, गुप्ता जी इधर आओ वहां क्यों खड़े हो बलराम जाखड़ व अन्य सभी बड़े विस्मय से मेरी तरफ देखने लगे। इसके बाद मैं उनके पास पहुंचा तो पाठक जी ने मेरा परिचय कराया कि ये आज अखबार के पत्रकार हैं तथा मेरे परम मित्र हैं। जाखड़ जी बोले कि बड़ा अच्छा लगा आपके परम मित्र से मिलकर और उन्होंने मुझे बड़ा सम्मान दिया।
     अंत में अपने मन की एक बात कहे बगैर रहा नहीं जा रहा, वह यह कि अच्छा हुआ महेश पाठक दोनों बार सांसदी का चुनाव हार गए यदि जीत जाते तो गैर चौबों की शामत आ जाती। इस बात को तो सभी जानते हैं कि चौबे और वे भी मथुरा के बड़े बहादुर होते हैं। यदि खुदा न खास्ता महेश भाई संसद सदस्य बन गए होते तो गैर चौबों में सबसे ज्यादा कचूमर बनियों का ही निकलता। इस बात को भी सभी अच्छी तरह जानते हैं कि ज्यादातर बनियां जन्म से ही डरपोक होते हैं। सैकड़ों में नहीं हजारों में बल्कि यों कहा जाए कि लाखों में ही एकाथ बनियां राजा रविकांत जैसे जीदार होते हैं, जो डिप्टी एस.पी. तक का गिरेबान पकड़कर दीवाल में दे मारने की कुब्बत रखते हैं। भगवान का लाख-लाख शुक्रिया जो उन्होंने नानू भाई को संसद में नहीं पहुंचाया वर्ना मुझ जैसे पता नहीं कितने बेचारे कब्रिस्तान क्षमा करना कब्रिस्तान नहीं शमशान पहुंच जाते।
महेश पाठक का संपर्क नंबर #9821210465

विजय गुप्ता की कलम से

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