Friday, January 16, 2026
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धर्मपाल जी आप धन्य हैं आपने तो कुत्ता विरोधियों के मुंह पर तमाचा सा जड़ दिया

विजय गुप्ता की कलम से

 मथुरा। पशुपालन मंत्री श्री धर्मपाल सिंह ने कुत्ता विरोधियों के मुंह पर ऐसा तमाचा सा जड़ दिया कि मजा आ गया। पिछले कुछ दिनों पूर्व मैंने अखबारों में एक खबर पढ़ी जिसमें धर्मपाल सिंह जी ने मेरठ में पत्रकारों से रूबरू होते समय कहा कि कुत्ते और अन्य पशु भूखे होने के कारण कभी-कभी आक्रामक भी हो जाते हैं। इन्हें रोटी और प्रेम की जरूर है नफरत की नहीं।
 मंत्री जी ने कहा कि भारतीय संस्कृति में यह व्यवस्था रही है कि पहली रोटी गाय को और आखिरी रोटी कुत्ते को खिलाई जाती है। उन्होंने कहा कि जीव जंतुओं नदियों और पेड़ों को संरक्षण की जरूरत है। अधिकतर ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी कुत्तों को नियमित रूप से रोटी खिलाई जाती है। इसीलिए सामान्यतः ग्रामीण क्षेत्रों में कुत्ते आक्रामक नहीं होते। ये बेचारे तो रात भर जागकर हम लोगों के घरों की पहरेदारी करते हैं। धर्मपाल सिंह जी ने ऐसी सटीक बात कही है कि जिससे मैं उनके प्रति नतमस्तक हो उठा हूं। धर्मपाल जी सचमुच में धर्म का पालन करने वाले हैं। धन्य है इनके माता-पिता जिन्होंने इन्हें ऐसे संस्कार दिए। जो लोग यह कह रहे हैं कि आवारा कुत्तों व अन्य पशुओं के कारण सड़क दुर्घटनाएं होती हैं। उनको मेरा जवाब है कि केवल इन निरीह प्राणियों को ही दोषी ठहरना एकदम गलत है। सच में देखा जाए तो दुर्घटनाओं की असली जड़ तो वाहनों की अधिकता तेज रफ्तार और शराब पीकर गाड़ी चलाना है, पहले इन्हे रोको।
 यह बात सर्वविदित है कि कुत्ता एक वफादार जानवर है वह अपने मालिक की खातिर अपनी जान भी देने को तैयार रहता है। जब हम अपने पूर्वजों का श्राद्ध करते हैं तब भी कुत्ते के निमित्त अंश निकाला जाता है। कुछ लोग चूहों से निजात पाने की बात पर बिल्लियों को बढ़ावा देने की बात कर रहे हैं। ऐसे लोगों को पता होना चाहिए कि कुत्ता तो वफादार जानवर है और बिल्ली गद्दार होती है। बिल्ली को अगर उसका मालिक ताजिंदगी दूध मलाई खिलाऐ और लाड़ प्यार से रखें किंतु जब बिल्ली को क्रोध आता है तब वह सब कुछ किए कराऐ को भूल जाती है और मालिक का टैंटूआ (कण्ठ) पकड़ कर उसकी जान लेने से भी नहीं चूकती।
 कुत्तों के बाद अब कबूतरों की बात पर आता हूं। कुछ दिन पहले मैंने एक खबर पढ़ी कि बम्बई में एक जज ने किसी व्यक्ति पर पांच हजार रुपए का जुर्माना सिर्फ इस बात के लिए लगा दिया कि उसने प्रतिबंधित किये जा चुके कबूतरों को दाना डालने वाले स्थान पर चुगा डाल दिया। मात्र पांच हजार रुपए का जुर्माना तो इसलिए किया कि दाना डालने वाले व्यक्ति ने अपनी गलती स्वीकार करके मांफी मांगी और भविष्य में ऐसा जघन्य अपराध न करने का वचन दिया। यदि वह अपनी गलती का प्रायश्चित ऐसे न करता तो शायद उसे आजीवन कारावास या फांसी होती?
 दरअसल बम्बई हाई कोर्ट ने कबूतरों को दाना डालने वाले स्थानों को यह दलील देकर बंद करा दिया कि कबूतरों से संक्रमण फैलने का खतरा होता है। हे भगवान यह क्या हो रहा है? हम बचपन से यह सुनते आए हैं कि कबूतरों के पंखों से निकली हवा से लकवा रोग में लाभ होता है। पुराने जमाने में वैद्य हकीम लकवा रोग वालों को सलाह देते थे कि कबूतरों को चुगा डालो और उनके पंखों से निकली हवा से लाभान्वित होओ। कबूतर शांति का दूत माना जाता है। वह अत्यंत भोला भाला और अहिंसक प्राणी होता है। उसके अंदर इतनी गजब की पाचन शक्ति होती है कि वह कांच के टुकड़े को भी पचा लेता है। कबूतर भूख से कितना भी व्याकुल क्यों न हो किंतु कीड़े मकोड़े बिल्कुल नहीं खाएगा। कंकड़ पत्थर या कांच के टुकड़े भले ही खा लेगा। एक और बात यह कि कबूतर घुने हुए अनाज जिसमें अंदर घुनगा, सुरेरी या पई लगी हो उसे भी नहीं खाता है। कितना शाकाहारी अहिंसक और प्यारा प्राणी है हमारा कबूतर। मेरा सुझाव है कि केंद्र सरकार अध्यादेश जारी करके ऐसे कानून बनाए जिससे इन निरीह प्राणियों के साथ न्याय हो। 

दया धर्म का मूल है पाप मूल अभिमान।
तुलसी दया न छोड़िए जब लग घट में प्रांण।।

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