मथुरा। कहते हैं कि जो व्यक्ति जैसा होता है उसके चहरे पर उसी तरह के भाव झलकते हैं। जैसे कोई सज्जन व्यक्ति होता है तो उसके चहरे पर सौम्यता झलकती है और यदि कोई दुर्जन होता है तो उसके चहरे पर कुटिलता अपना वर्चस्व बनाए रखती है। जो सच्चे संत होते हैं उनके चहरे पर संतत्व का आभामंडल विद्यमान रहता है। अब निर्णय स्वयं ही करें कि अविमुक्तेश्वरानंद जी महाराज का चहरा उन्हें कौन सी श्रेणीं में लाता है? अब आगे बढ़ता हूं इनके व्यवहार की तरफ। न इनकी वाणी में संयम, न इनके विचारों में संयम, न इनके कर्म में संयम हाथ झटक झटक कर बोलना और बात-बात में उग्र रूप धारण करना तो बहुत कुछ कह देता है। और आगे बढ़ता हूं कि ये शंकराचार्य हैं या नहीं? जब पुरी के शंकराचार्य से पत्रकारों ने इनको शंकराचार्य मानने के बारे में पूंछा तो वे भी पतली गली में होकर निकल गए, उन्होंने सिर्फ यह कहा कि मेरा लाड़ला है। जब पत्रकारों ने ज्यादा कुरेदा तो यह कह दिया कि यदि मैं इनके शंकराचार्य होने के बारे में अपनी राय दूंगा और अदालत ने उसके विपरीत जजमेंट दे दिया तो मेरी बेज्जती होगी। इसलिए मेरा चुप रहना ही सही है।
मतलब साफ है कि स्वयं पुरी के शंकराचार्य भी इनको शंकराचार्य नहीं मानते। अब मैं पूंछता हूं कि यदि कोई राष्ट्रपति यह कहे कि मेरे बाद मेरा उत्तराधिकारी अमुक व्यक्ति होगा तो क्या मान लिया जाएगा। बाकायदा संसद के द्वारा तय होता है कि अगला राष्ट्रपति कौन होगा। जब नियम यह है कि विद्दुत परिषद तय करती है कि अगला शंकराचार्य कौन होगा, तो फिर बगैर विद्दुत परिषद के ये कैसे शंकराचार्य माने जाएंगे। चलो हमने यह भी मान लिया कि ये शंकराचार्य हैं। अब आगे का घटनाक्रम देखो कि जो रास्ता निकास का है उसी से भारी भीड़ लेकर बग्गी में बैठकर घुसेंगे। जब कमिश्नर, डी.आई.जी., डी.एम. व एस.एस.पी. हाथ जोड़ जोड़कर प्रार्थना कर रहे हैं कि महाराज जी कोई बड़ी दुर्घटना हो सकती है आपकी इस जिद की वजह से तब भी नहीं माने और अपने चेले चपाटों को बजाय समझाने के उन्हें धक्का मुक्की करने के लिए उत्साहित करते रहे।
अब और आगे चलता हूं अविमुक्तेश्वरानंद जी को जब केशव प्रसाद मौर्य ने पुचकारा तो पुलकित हो उठे और बोले कि केशव प्रसाद मौर्य को तो मुख्यमंत्री होना चाहिए। केशव प्रसाद जी और ये महाराज जी दोनों एक ही बिरादरी के हैं। बताऊं कैसे? वह ऐसे जैसे ये इन्लीगल तरीके से शंकराचार्य बने फिरते हैं। लगभग वैसी ही स्थिति केशव जी महाराज की है। जब मौर्य जी चुनाव में हार गए तब भी उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल ही नहीं किया गया बल्कि उपमुख्यमंत्री बना दिया गया। यह सब क्यों और कैसे हुआ? इस बात को सब जानते हैं कि योगी आदित्यनाथ विरोधी लाॅबी बुरी तरह हावी है। कायदे से जो व्यक्ति चुनाव में हार जाता है उसे दूर ही रखा जाना चाहिए।
मैं एक बात पूछता हूं कि यदि ये अपनीं हठधर्मिता में सफल हो जाते और निकास द्वार वाले रास्ते के द्वारा घुसपैठ करते और फिर कोई हादसा हो जाता तथा सैकड़ो मर जाते तो क्या होता? तब फिर पुलिस और प्रशासन से ही पूंछा जाता कि उन्होंने इन्हें जाने कैसे दिया? मेरा कहना यह है कि अनुशासन और अपनी मर्यादा में रहना चाहिए तथा राज्य कर्मियों के साथ तालमेल बनाकर चलना चाहिए। मैं एक ऐसे पुलिस अफसर को जानता हूं जो एस.पी. से लेकर डी.जी.पी. तक के पद पर रह चुके हैं। वे जब भी सादा वर्दी में अपनी निजी गाड़ी से निकलते तो कभी-कभी पुलिस वाले उन्हें रोक देते तो वे चुपचाप गाड़ी रोक कर साइड में खड़ी कर देते और जब पुलिस वाले जाने को कहते तब आगे बढ़ते। वे अधिकारी कभी अपना नाम या परिचय तक नहीं बताते।
अंत में कहूंगा कि विचार असाधु के, वाणी असाधु की, आचरण असाधु का और व्यवहार असाधु का किंतु सम्मान साधु का चाहते हैं। हां एक बात और कहना चाहूंगा कि जिस प्रकार ये विरोधी दलों के सनातन विरोधी नेताओं से घुलमिल रहे हैं, उससे इनके बारे में अंदाज लगाया जा सकता है कि ये किस विचारधारा के हैं? मेरा सुझाव है कि इन्हें अब राजनीति में उतरकर योगी आदित्यनाथ के विरुद्ध मोर्चा खोल देना चाहिए।