मथुरा। आगामी 19 मार्च को द्रौपदी मुर्मू का पुनः मथुरा आने का संकेत प्रशासन को मिला है। ब्रजभूमि का यह बड़ा दुर्भाग्य है कि यहां कोई न कोई वी.वी.आई.पी. आए दिन टपकता रहता है फलस्वरुप न सिर्फ प्रशासनिक कार्य ठप हो जाते हैं बल्कि जनता को जो कठिनाई होती है उसका वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता।
पिछली बार जब राष्ट्रपति मथुरा आईं थीं तब लाखों लोगों को कई दिनों पहले से जो परेशानी हुई वह किसी से छिपी नहीं है। मजेदार बात यह रही कि अंतापाड़ा जैसे संकरे और घौंच पौंच वाले मुहल्ले के एकदम भीतरी और नाले से चिपटमा स्थान पर बने कुब्जा कृष्ण मंदिर पर उनका आगमन हुआ। उनके काफिले को बेरोक टोक अंदर घुसाया जा सके इसके लिए गली के नुक्कड़ पर बने सार्वजनिक पेशाब घर और शौचालय को ऐसे गायब कर दिया गया जैसे गधे के सर से सींग। अब तक वह पेशाब घर और शौचालय नहीं बनाया गया है। फलस्वरुप लोगों को खास तौर से होली गेट के आसपास आने वाली महिलाओं को कितनी भयंकर परेशानी हो रही है इससे किसी को कोई मतलब नहीं।
राष्ट्रपति मुर्मू ने तो आजकल हद से ज्यादा हद कर रखी है। जगह-जगह आने-जाने का रिकॉर्ड तोड़ रखा है। और तो और निजी संस्थानों का उद्घाटन करने का मौका भी नहीं छोड़तीं। राष्ट्रपति का मतलब एक प्रकार से राजा होता है। राजा को जनता की सुख सुविधा का ध्यान रखना चाहिए ना कि जनता को दुःख देना चाहिए।
एक बार डॉ. शंकर दयाल शर्मा मथुरा आए उस समय वे उपराष्ट्रपति थे, एम.ई.एस. के डाक बंगले पर पत्रकार भी पहुंच गए। उस दौरान मैंने शंकर दयाल जी से पूंछा कि आपका मथुरा कैसे आना हुआ? इस पर वे बोले कि आगरा तक तो आया था सोचा मथुरा वृंदावन भी होता चलूं। मैंने उनसे पूंछा कि आपका तो बिना किसी प्रयोजन के वैसे ही आना हुआ और जनता को पिछले कई दिनों से कितनी परेशानी हो रही है। तीन दिन से जनता के लिए रास्तों को बंद करके फ्लीड की रिहर्सल हो रही है। ऐसी स्थिति में आपको कैसा महसूस हो रहा है?
बस मेरा इतना कहना था कि उन्होंने अपना माथा ठोक लिया और बोले कि "मैंने मथुरा आकर बहुत बड़ी गलती की, अब मैं फिर कभी मथुरा नहीं आऊंगा। इसके बाद वे मथुरा कभी नहीं आए और मथुरा का कोई भी व्यक्ति जब उनसे मिलने जाता तब यही कहते कि एक पत्रकार ने मुझसे ऐसी बात कह दी, अब मैं मथुरा कभी नहीं जाऊंगा। इसके बाद वे राष्ट्रपति बन गए तब भी मथुरा नहीं आए। हां एक बात उन्होंने जरूर बहुत अच्छी यह की कि इस घटना के बाद भले ही उन्हें दुःख तो हुआ किंतु उन्होंने उपराष्ट्रपति और राष्ट्रपति रहते हुए जगह-जगह जाने आने के कार्यक्रमों में काफी हद तक कमी कर दी।
मेरे कहने का तात्पर्य है कि यह वी.वी.आई.पी. कल्चर देश की प्रगति में सबसे बड़ा बाधक है। प्रशासनिक कार्यों में रुकावट तो आती ही है साथ ही जनता को इतनीं ज्यादा परेशानी होती है कि त्राहिमाम त्राहिमाम कर उठती है। ब्रजभूमि में एक तो पर्यटकों व तीर्थ यात्रियों ने ऐसी नाक में दम कर रखी है कि पूरा ब्रजमंडल जाम से त्रस्त रहता है और रही सही कसर ये वी.वी.आई.पी. विभूतियां पूरी कर देती हैं। पता नहीं कब ब्रजवासियों को इस घनघोर संकट से मुक्ति मिलेगी?