Monday, March 9, 2026
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महिला दिवस पर दो वरिष्ठतम महिलाओं की स्तरहीन चकल्लस बाजी

 मथुरा। महिला दिवस पर देश की दो वरिष्ठतम महिलाओं की आपसी चकल्लस बाजी को देखकर मन खिन्न हो रहा है। राष्ट्रपति मुर्मू जब कलकत्ता हवाई अड्डे पर पहुंची तो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को अपनी आवभगत में न पाकर उनका मूड ऑफ हो गया और अपनीं वेदना प्रकट करते हुए कहा कि मैं तो ममता बनर्जी को अपनी बहन मानती हूं फिर भी पता नहीं क्यों मुझसे नाराज हैं?
 ममता बनर्जी कहां चुप रहने वाली थीं उन्होंने भी फटाक से ईंट का जवाब पत्थर से दे मारा और कहा कि कभी-जभी आओगी तो आवभगत होगी रोज-रोज आओगी तो क्या मैं तुम्हारे पीछे लगी फिरूंगी। ममता के जवाब से द्रौपदी मुर्मू की क्या इज्जत रह गई? राष्ट्रपति को मुख्यमंत्री के अनुपस्थित रहने को देखा अनदेख कर देना चाहिए था। इसी में उनका बड़प्पन व गरिमा थी। हालांकि ममता बनर्जी की कार्यशैली से मैं ना इत्तफाकी रखता हूं किंतु इस मामले में उनकी बात को जायज मानता हूं। देखा जाए तो द्रौपदी मुर्मू ने भी हद से ज्यादा हद कर रखी है। प्रोटोकॉल के हिसाब से जब ये कहीं जाती हैं तो शासन, प्रशासन पूरी मुस्तैदी से इनकी जी हजूरी और व्यवस्था में लग जाता है। राजकाज सब ठप्प हो जाते हैं तथा जनता को भारी कठिनाई की सौगात मिलती है, क्योंकि कई कई दिन पहले पूरी नाकेबंदी और रास्ते बंद करके फ्लीड की रिहर्सल होती है।
 पिछली बार जब मथुरा में आईं तब क्या-क्या तमाशा हुआ यह जग जाहिर है। मेरा कहना है कि यदि इन्हें जगह-जगह घूमने का शौक ही है तो क्या प्रोटोकॉल को सीमित नहीं किया जा सकता? जरूरी है कि पूरे लाव लश्कर और ताम-झाम के साथ काफिला चले। यहां प्रजातंत्र है राजतंत्र नहीं प्रजा को दुःख देकर खुश होना अच्छी बात नहीं। सोचो कि एक दौरे पर करोड़ों बर्बाद और राजकाज ठप्प तथा जनता त्रस्त। मुझे तो बड़ी छिन छिनाहट होती है यह सब देखकर।
 काफी समय पहले जब मैंने डॉ. शंकर दयाल शर्मा से उनके मथुरा आगमन के समय यह बात उठाई तो उन्हें बुरा जरूर लगा किंतु उन्होंने मेरी बात के मर्म को समझा तथा उसके बाद उन्होंने अपने दौरे बहुत सीमित कर दिए, जो उनकी सज्जनता का द्योतक हैं। अब द्रौपदी जी दो दिन के लिए फिर मथुरा पधार रही हैं और पूरा प्रशासन अभी से चौकन्ना हो गया है और पूरी मशीनरी महामहिम की व्यवस्था में जुट गई है। हमारी ब्रजभूमि तो इन महामहिमों के लिए पिकनिक स्पॉट बन गई है। अब मैं अपनीं पुरानी बात को दोहराता हूं कि पता नहीं कब हम लोगों को इस कष्टकारी वी.वी.आई.पी. व्यवस्था से मुक्ति मिलेगी?
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