मथुरा। पिछले कई माह पूर्व राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के मथुरा वृंदावन दौरे के दौरान जनता ने जो मुसीबतें झेली उसके जख्म अभी भरे नहीं और फिर दुबारा जनता पर मुसीबतों का पहाड़ टूट रहा है। प्रोटोकॉल के नाम पर जो कुछ हो रहा है उससे तो ऐसा प्रतीत होता है कि ब्रजभूमि पर कोई बहुत बड़ा हमला होने जा रहा है।
पूरे प्रदेश के विभिन्न जिलों से हजारों पुलिसकर्मी गाड़ियों में ढुब ढुब कर आ रहे हैं। इसके अलावा सेना के जवान भी मुस्तैद रहेंगे। चप्पे चप्पे पर पुलिस का जाल बिछेगा ऊंचे मकानों की छतों पर भी सुरक्षाकर्मी स्टैनगन लेकर ऐसे तैनात रहेंगे जैसे लड़ाई के दौरान सीमा पर फौजी रहती है। अपने ही घरों में लोगों की स्थिति कैदियों जैसी हो जाएगी। जगह-जगह रास्ते बंद करके नाकेबंदी कर दी जाएगी। सभी सरकारी कार्य अभी से ठप्प जैसी स्थिति में हैं। पूरे जिले के हर विभाग के अधिकारी इसमें जुटे हुए हैं। लाखों लोगों के ऊपर एक प्रकार से अत्याचारों का बादल फट रहा है। एक नहीं दो नहीं तीन दिन को महामहिम महारानी मुर्मू का पूरे कुनवे के साथ प्रवास रहेगा। पचासों गाड़ियों का काफिला उनके साथ चलेगा। एक ओर तो पूरे देश में युद्ध की वजह से हा-हाकार मच रहा है और दूसरी ओर यह सब देखकर "रोम जल रहा था और नीरो बंशी बजा रहा था" वाली बात याद आ रही है।
लाखों करोड़ों नहीं अरबों रुपए का व्यय केवल इस तीन दिवसीय दौरे की भेंट चढ़ जाएगा। मैं पूछता हूं कि इस गरीब जनता के खून पसीने की कमाई से मिले टैक्स का यह सदुपयोग है या दुरुपयोग? कोई कहेगा कि टैक्स तो अमीर देते हैं गरीबों का टैक्स से क्या लेना देना? इसका जवाब यह है कि यदि गरीब कोई छोटी-मोटी वस्तु खरीदना है तो उसमें टैक्स का पैसा समाहित होता है, जैसे एक माचिस की डिब्बी खरीदी तो उसकी कीमत में टैक्स पहले से जुड़ा होता है। असली मार तो खून पसीना एक करने वाले इन गरीबों पर ही पड़ती है। अमीरों का कुछ ज्यादा नहीं बनता बिगड़ता।
जैसे कई दिनों के भूखे व्यक्ति के सामने तरह-तरह के व्यंजनों से भरी थाली रख दी जाए ठीक वही स्थिति अब हो रही है। मैं पूछता हूं कि राष्ट्रपति बनने से पहले मुर्मू महारानी जी कितनी बार मथुरा, वृंदावन, गोवर्धन आदि आईं? कितनी बार उन्होंने भारत में तीर्थ यात्राएं की? राष्ट्रपति की अपनी गरिमा होती है। हर जगह जाना और निजी संस्थानों के उद्घाटन जैसे अवसरों को भी नहीं छोड़ना राष्ट्रपति की गरिमा पर बट्टा लगाता है। इसके अलावा करोड़ो अरबों रुपए प्रतिदिन बर्बाद होना भी राष्ट्र के प्रति बेवफाई की श्रेणी में आता है।
पूरी मशीनरी राष्ट्रपति के ब्रजभूमि दौर में लगी हुई है। सबसे ज्यादा मजेदार बात यह है कि कोई भी राजनेता या सामाजिक संगठन चूं भी नहीं कर रहे यानीं मौन व्रत धारण किए हुए हैं। लाखों लोगों की परेशानी से किसी को कोई लेना देना नहीं। किसी महिला की शीघ्र डिलीवरी होनीं है या कोई दुर्घटना में घायल हो गया है अथवा किसी को हार्ट अटैक आ गया है और रास्ते बंद तथा घेराबंदी ऐसी कि गाड़ी आगे ही न बढ़े। इस सारी जुल्म ज्यादती का पाप किसको लगेगा? यह सब पुराने जमाने के जुल्मी शासको की याद दिलाता है। मैं पूछता हूं कि प्रोटोकॉल के नियमों को बनाने वाला भगवान तो नहीं इंसान ही तो है। क्या इंसान इन नियमों को ढीला करके जनता को राहत नहीं दे सकता? हमारे देश की शक्ति का बहुत बड़ा हिस्सा तो ये अति महत्वपूर्ण लोग ही चाट जाते हैं। मुझे तो कभी-कभी ऐसी छिनछिनी छूटती है कि पूंछो मत।
द्रौपदी मुर्मू को ममता बनर्जी ने जो आईना दिखाया उससे उन्हें सबक लेना चाहिए तथा अपनीं अनावश्यक यात्राओं को तुरंत बंद करके अपने पद की गरिमा बनाए रखते हुए ज्यादा जरूरी यात्राएं ही करनीं चाहिए। मेरी इच्छा यह है कि मुर्मू जी के तीन दिवसीय दौरे में सैकड़ो लोग उनसे मुलाकात करेंगे। कोई हिम्मत करके उनसे कहे कि मुर्मू जी आपकी इन अटाटूट यात्राओं से जनता को भारी कठिनाई हो रही है। आप इस पर भी विचार करें। यदि किसी ने ऐसा किया तो वह बड़े पुण्य का कार्य होगा। शायद मुर्मू जी के दिमाग में बात बैठ जाय और जनता को राहत मिले। ठीक उसी प्रकार जैसे मेरे कहने पर डॉ. शंकर दयाल शर्मा के मन में बात ऐसी चुभी कि उन्होंने झल्लाकर कभी मथुरा न आने की कसम तो खाई ही साथ ही अपनी यात्राओं में भारी कटौती भी की। आगे ईश्वर की मर्जी।