Friday, March 27, 2026
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जागरण के नाम पर उपद्रव क्यों?

 मथुरा। मुझे यह बात बड़ी अखरती है कि कुछ लोग रात्रि में लाउडस्पीकर की कान फोड़ू आवाज से लोगों की नींद हराम करते हैं। इससे भी ज्यादा बेहूदगी यह होती है कि मुख्य सड़क को अवरुद्ध करके देवी जागरण, रसिया दंगल या अन्य आयोजनों के द्वारा उपद्रव मचाते हैं। यह प्रचलन अब घरों में भी बढ़ता जा रहा है। घरों के अंदर देवी जागरण, शादी विवाह में होने वाला रतजगा या अन्य आयोजनों का प्रॉपेगन्डा लाउडस्पीकर की भयंकर आवाज के द्वारा खूब जोरों पर है। मेरी समझ में नहीं आता कि तुम्हें जो करना है वह घर के अंदर शांति से करने के बजाय पूरे मुहल्ले की शांति भंग क्यों करते हो? तुम्हारे घर में यदि कोई मंगल कार्य है तो उसे अपने घर तक ही सीमित रखो। छोटे-छोटे बच्चे बुजुर्ग व बीमार लोग कितने परेशान होते हैं? इससे किसी को कोई मतलब नहीं। नियमानुसार रात्रि भर लाउडस्पीकर जो अब बड़े-बड़े बॉक्स का रूप ले चुके हैं, बजाना प्रतिबंधित है किंतु चारों तरफ अंधेर नगरी चौपट राजा वाली स्थिति है। न पुलिस ध्यान देती है और ना ही अड़ौस पड़ौस के मुहल्ले वाले ही विरोध करते हैं। लोग सोचते हैं कि कौन झगड़ा मोल ले।
 एक और फैशन जोर पकड़ता जा रहा है कि जो जागरण पार्टियां आती हैं उनमें लड़कियां होती हैं। अतः ऐसी ही पार्टियों को आयोजक प्राथमिकता देते हैं। स्पष्ट है कि श्रद्धा न होकर मनोरंजन का वर्चस्व है। सार्वजनिक रूप से सड़कों पर होने वाले आयोजनों में असामाजिक तत्वों की मौज होती है। ये लोग धौंस धपड़ और गुंडागर्दी के बल पर जबरिया चंदा वसूलते हैं तथा कुछ स्थानों पर ऐसी भी शिकायतें मिली हैं कि चंदे की रकम का बड़ा भाग मांस मदिरा व अय्याशी की भेंट चढ़ जाता है। होली के ऊपर तो लुच्चे लफंगों ने जो उपद्रव मचाया वह किसी से छिपा नहीं है। कदम कदम पर होलियां जलीं और लाउडस्पीकर की कान फोड़ू आवाज में गंदे गंदे गाने बजे तथा शराब पी पीकर नांचाकूदी भी खूब हुई। इन धूर्तों ने बाहर से आए यात्रियों व बहन बेटियों तक को खूब सताया। मुझे तो लगता है कि होली जैसे पवित्र व सामाजिक सौहार्द के त्योहार को इन असामाजिक तत्वों ने हाई जैक कर लिया है।
 मेरा सुझाव है कि हम सभी को घटियापन की इन हरकतों के विरुद्ध आवाज उठानी चाहिए तथा पुलिस व प्रशासन को भी सख्त रवैया अपनाना चाहिए। मुख्य सड़कों को बंद करके किसी भी प्रकार के आयोजन करने की अनुमति तो कतई भी नहीं देनी चाहिए चाहे कितनीं भी पुरानी परंपरा चली आ रही हो, क्योंकि पहले वाहन कम चलते थे और अब यह संख्या बेशुमार है।
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