मथुरा। त्रिकालदर्शी ब्रह्म ऋषि देवराहा बाबा महाराज ने छत्तीस वर्ष पूर्व आज ही के दिन योगिनी एकादशी पर अपनी देह त्यागी थी। जिस समय बाबा को जल समाधि दी जा रही थी उसी वक्त एक जबरदस्त तूफान सा आया हल्की वर्षा और तेज हवा से सभी नौकाएं जोर-जोर से हिचकोले लेने लगी तब ऐसा लगा कि अब तो नावें पलट जांएगी और कहीं हम सभी की भी जल समाधि न हो जाय। एक नाव में अटल जी भी मौजूद थे। पर ऐसा कुछ हुआ नहीं। कुछ ही पल बाद सब कुछ शांत हो गया। मुझे तो ऐसा लगता है कि बाबा महाराज को प्रकृति ने सलामी दी थी। बाबा के बारे में पूरी दुनियां जानती है कि वे एक दिव्य आत्मा थे उन्हें अलौकिक शक्ति प्राप्त थी वह जो चाहते वही होता।
इस बात को कोई नहीं जानता कि उनकी उम्र कितनी थी। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद के पूर्वजों की कई पीढ़ियां (खानदान व ननिहाल पक्ष) दोनों लगातार बाबा के दर्शनार्थ आती रहती थी। इसी एक मिसाल से अंदाजा लगा लो कि बाबा की उम्र कितनी होगी। यह ब्रजभूमि का सौभाग्य है कि बाबा ने अपना अंतिम समय इसी ब्रजभूमि में बिताया और ब्रजभूमि को सजाने संवारने की जिम्मेदारी अपने परम प्रिय शिष्य शैलजाकांत जी को दिलवाई। बाबा ने देह त्याग से कई दशक पूर्व ही संत शैलजा कांत को यह बात बता दी थी कि रिटायर होने के बाद तुम्हें ही यहां आकर ब्रज की माटी में लोटपोट होते हुए भगवान श्री कृष्ण की इस नगरी की सेवा करनी है।
भले ही बाबा देह के रूप में नहीं हैं किंतु उनकी दिव्य आत्मा कहीं नहीं गईं वह तो यहीं पर विराज कर हम ब्रज वासियों पर अपनी कृपा और आशीर्वाद बनाए हुए हैं। आओ आज इस पुण्य दिवस पर हम सभी बाबा के चरणों में नमन करते हुए उनके दिखाए सदमार्ग पर चलने का संकल्प लें और अपने जीवन को धन्य करें।