HomeUncategorizedपेपर लीक पर हाय तौबा और आरक्षण पर चुप्पी

पेपर लीक पर हाय तौबा और आरक्षण पर चुप्पी

 मथुरा। पिछले दिनों पेपर लीक पर बड़ी हाय तौबा मची, बात तो अपनीं जगह सही है कि जो लोग योग्य हैं वे टापते रह जाते हैं और अयोग्य बाजी मार ले जाते हैं। यह बात अलग है कि आंदोलन के नाम पर उपद्रव करने वालों में छात्र-छात्राएं तो नाम मात्र के थे असामाजिक तत्वों की भरमार थी। ये लोग देश विरोधी तत्वों के हाथ की कठपुतली बने हुए थे। 
 पर मैं दूसरी बात कहता हूं। मेरा कहना है कि ठीक यही स्थिति आरक्षण की है। आरक्षण तो पेपर लीक से भी ज्यादा घातक है क्योंकि जो लोग अयोग्य हैं वे तो आरक्षण की आड़ में मजा मारते हैं और जो योग्य हैं वे टापते रह जाते हैं। एक नहीं अनेक ऐसे मामले होते रहते हैं कि जो जूनियर अधिकारी थे वे आरक्षण के नाम पर प्रमोशन पाकर सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ते हुए अपने सीनियरों से ऊपर की कैटेगरी में जाकर उनके ऊपर वाली कुर्सी पर बैठकर उन्हीं पर रौब झाड़ते हैं। क्या ऐसा नहीं लगता कि जो कभी चाचा था वह तो भतीजा बन गया और भतीजा चाचा बनकर अपनी चाचागीरी दिखने लगा। मैं पूछता हूं कि मूर्खों को विद्वानों के समकक्ष लाना या विद्वानों के ऊपर बैठाना उचित है? इस पर चुप्पी क्यों? इस मुद्दे पर सभी की जुबान पर ताले क्यों लगे हुए हैं। मेरी नजर में तो सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा यह है। इस पर देशव्यापी आंदोलन होना चाहिए। पर बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे? असली मामला तो वोटो का है।
 देश आजाद होने के बाद कांग्रेस ने चाल चली थी नींची जातियों के वोट हड़पने के लिए और तुर्रा यह दिया कि इनका जीवन स्तर सुधारना है। ये बेचारे पिछड़े हुए हैं। यह नियम सिर्फ 10 वर्ष के लिए बनाया था किंतु अब तो स्थिति यह है कि 100 वर्ष भी हो जाएंगे तब भी आरक्षण समाप्त नहीं होगा। यदि स्तर सुधारना है तो अब सबसे पहले इसकी शुरुआत गधों से की जानी चाहि। तांगों में अब घोड़ों की जगह गधों को जोतना चाहिए क्योंकि उनका भी तो स्तर ऊंचा होना चाहिए।
 ठीक इसी प्रकार फोर्थ क्लास वालों यानी चपरासी आदि को बड़े अफसर के समकक्ष या उनसे ऊपर की कुर्सी पर बिठाकर अपना धर्म निभाना चाहिए क्योंकि उन बेचारों के साथ भी तो न्याय होना चाहिए। काफी समय पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था कि आरक्षण की नीति पर विचार मंथन होना चाहिए, बस इतनी सी बात पर पूरे देश में बखेड़ा खड़ा हो गया शेष में उन्हें भी अपने कदम पीछे करने पड़ गए और कहा कि आरक्षण हमेशा रहेगा उसे कोई हटा नहीं सकता। हां एक बात जरूर कहूंगा कि मोहन भागवत जी ने हाल ही में इन उपद्रवियों के पक्ष में जो बयान दिया है वह मेरी समझ से परे है। उनके बयान के बाद कंगना रनौत भी पलटी मार गईं तथा जिन्हें पहले गटर जेनरेशन कहा उन्हीं के गुणगान करने को मजबूर हो गईं। बंगलादेश की लेखिका तस्लीमा नसरीन ने इस आंदोलन की सही तस्वीर खींची।
 सौ की सीधी एक बात यह है कि जब तक हमारे देश में वोट तंत्र की कुटिल नीति रहेगी तब तक आरक्षण को कोई माई का लाल नहीं हटा पाएगा। यह तो तभी हटेगा जब देश से कोढ़तंत्र समाप्त होगा। इसका नाम भले ही लोकतंत्र रखा हुआ है किंतु इसका स्वरूप जो है वह कोढ़तंत्र जैसा है। इस कोढ़तंत्र और आरक्षण ने तो हमारे देश को कोढ़ी जैसी स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है।
 भले ही किसी को बुरी लगे या भली किंतु सच्चाई जो है वह सभी के सामने है। देखो तो सही कि संसद और विधान सभाओं में कैसे-कैसे जघन्य अपराधी पहुंच जाते हैं। जिन्हें जेल में होना चाहिए, जिन्हें आजीवन कारावास व फांसी की सजा होनी चाहिए वे संसद और विधान सभाओं में बैठते हैं तथा मंत्री पद तक का मजा लेते हैं।
 फिर मैं अपनीं उसी पुरानी बात पर आता हूं कि "हाकिमी गर्मी की और दुकानदारी नरमी की" अब नरमी से काम नहीं चलेगा बल्कि अब तो इससे भी ऊपर "लातों के भूत बातों से नहीं मानते" वाली बात पर आना चाहिए। और एक बात कहूं, हालांकि कुछ लोगों को मिर्ची लगेगी। वह यह कि "जूतों के यार" वाला सिद्धांत देश के लिए कुनैन जैसा काम करेगा।जब तक देश विरोधी ताकतों को जूतों से नहीं कुचला जाएगा तब तक देश का उद्धार संभव नहीं। यदि हमारे भाग्य में गधों को ही पंजीरा खिलाना लिखा है तो जैसी हरि इच्छा। पर भगवान से प्रार्थना जरूर करूंगा कि हे भगवान जल्दी से जल्दी हमारे देश में रामराज लाओ।
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