मथुरा। कलयुग नहीं, घोर कलयुग भी नहीं, यह तो घनघोर कलयुग है। लोग कहते हैं कि अभी तो कलयुग की शुरुआत है, पर मुझे तो लगता है कि अब तो कलयुग का अंत आ गया। एक घटना ने मेरी रूह को कपकपा दिया। कलेजा तड़फ गया और आत्मा रो उठी। ऐसा क्यों? अब बताता हूं पूरा मामला क्या है। एक साधु सड़क पर घिसट रहा था। उसके दोनों पैर बुरी तरह सड़ गए थे तथा लगभग एक-एक इंच के कीड़े सुड़ बुड़ा रहे थे बदबू इतनीं कि पास भी खड़ा नहीं हुआ जा रहा था। इसके अलावा पूरे शरीर में जगह-जगह जख्म। कूल्हे घिसटते घिसटते खून से तरबतर। कहने का मतलब यह कि इतनीं दर्दनाक स्थिति कि देखते ही आत्मा कराह उठे।
अब अगली बात पर आता हूं इस अभागे ने बताया कि बाबू साहब महीनों से तड़फ रहा हूं कोई मेरी दवा दारू नहीं करता और तो और कुछ लोग मेरे ऊपर तरस खाकर पैसे दे जाते हैं जिनसे में चाय पी लेता हूं तथा कुछ खा भी लेता हूं। उसने आगे बताया कि कोई व्यक्ति मेरे भीख के पैसों को भी लेकर भाग गया। इतना सुनते ही मेरे मन पर जो बीती उसे शब्दों में बयां नहीं कर सकता। इस दुखिया की व्यथा कथा संत शैलजाकांत जी के कानों तक पहुंची। उन्होंने इसे तुरंत जिला चिकित्सालय में भिजवा कर भर्ती कराया। अब उसका श्रेष्ठ इलाज चल रहा है ग्लूकोज की बोतल चढ़ रही हैं तथा नियमित ड्रेसिंग व खाने-पीने की सब व्यवस्था चौकस है।
मैंने अपने जीवन में इस कदर सड़ते और तड़फते हुए शायद ही किसी को देखा हो। ऐसे व्यक्ति की भीख के पैसों को लेकर भागने वाले व्यक्ति की आगे चलकर क्या दशा होगी? यह तो मैं नहीं कह सकता किंतु इस घटना को देखकर मैं इतना द्रवित हूं कि भगवान से मेरी प्रार्थना है कि "हे प्रभु आप इतने निष्ठुर मत बनो कि इंसान को इतना नींचे गिरा दिया" बस इससे आगे और कुछ कहने की स्थिति मेरी नहीं है।