मथुरा। आजकल एक फैशन चल निकला है युवा पीढ़ी को पुचकार कर सर चढ़ाने का। जिसको देखो वहीं युवाओं का गुंणगान कर उन्हें रिझाने में लगा हुआ है। कोई कह रहा है कि मैं अगर आंखें बंद करके किसी पर विश्वास करूंगा तो सिर्फ युवाओं पर करूंगा, कोई कह रहा है कि युवा ही हमारे देश की रीढ़ हैं, कोई कह रहा है कि उनकी हर बात जायज है, इनसे संवाद कर इन्हें संतुष्ट करना चाहिए तथा युवा पीढ़ी से जगह-जगह संवाद करने का नाटक शुरू हो गया है। ऐसा लगता है कि अब तो युवा पीढ़ी देवदूत बनकर अवतरित हो गई है। अब मेरा एक सवाल है कि चोरी, डकैती, हत्या, लूटपाट, व्यभिचार, दुराचार, बलात्कार, धोखाधड़ी, रैगिंग तथा इनके अलावा और भी तरह-तरह के जघन्य अपराध युवा कर रहे हैं या वृद्ध? युवाओं की आड़ में अपराधी तत्व मौज कर रहे हैं। पिछले दिनों दिल्ली में पेपर लीक के नाम पर जो कुछ हुआ उसके पीछे देश विरोधी ताकतें खड़ी हुई थीं। उनका मकसद बंगलादेश की तर्ज पर सरकार के खिलाफ मोर्चा बंदी थी। युवाओं की आढ़ में शातिर अपराधी सक्रिय थे। इस आंदोलन की फंडिंग कहां से हो रही थी? इस बात को सभी जानते हैं।
अब मेरा दूसरा सवाल यह है कि इन लोगों ने इस बात को आधार बनाया कि पेपर लीक से हुनरमंद छात्र-छात्राएं पिछड़ जाते हैं और अयोग्य बाजी मार ले जाते हैं। इनकी बात में तो दम है लेकिन इससे भी सौ गुना दम इस बात में है कि आरक्षण के नाम पर गधे आगे निकल जाते हैं और तेज दौड़ने वाले घोड़े पिछड़ जाते हैं। सही मायने में तो आंदोलन इस बात के लिए होना चाहिए कि आरक्षण समाप्त किया जाए। हिम्मत है किसी पार्टी की कि आरक्षण के विरोध में बोले। सब की जुबान तालू से चिपक जाएगी। अब यह भी बताता हूं कि जिसको देखो वह युवाओं को अपना आराध्य क्यों बता रहा है। इसके पीछे का राज यह है कि साल दर साल युवाओं की फौज वोटर के रूप में तैयार होती है जो परिपक्व व उम्र दराज लोग हैं वह तो ज्यादातर जिस पार्टी से जुड़े हैं उसी में उनका रुझान रहता है किंतु इन नए रंगरूटों को अपनीं ओर आकर्षित करके फायदा लेने पर पैनी नजर लगी हुई है।
ऊंची ऊंची पढ़ाई पढ़ने वाले युवा वर्ग की क्वालिटी कितनी बढ़िया है इस बात की भी चर्चा जरूरी है। कुछ दिन पहले संगीतकार कवि एवं साहित्यकार डॉ राजेंद्र कृष्ण अग्रवाल से बातचीत हो रही थी, उन्होंने एक रोचक किस्सा सुनाया। राजेंद्र कृष्ण जी बताते हैं कि काफी दिन पहले मैं दिल्ली की एक यूनिवर्सिटी में बतौर अतिथि गया था। वहां मैंने यूनिवर्सिटी के सर्वे सर्वा से पूछा कि कैसा चल रहा है आपकी यूनिवर्सिटी में? इस पर उन्होंने अपना माथा ठोकते हुए कहा कि क्या बताऊं आपको। राजेंद्र जी ने कहा कि आखिर क्या बात है बताओ तो सही। इस पर उन्होंने कहा कि हमारी यूनिवर्सिटी की 85% लड़कियां नशे की आदी हैं। लड़कों की तो बात छोड़ो।
इसी बात से अंदाज लगा लो कि कितनी बढ़िया क्वालिटी बन रही है युवा पीढ़ी की। आचार विचार संस्कार सब कुछ छिन्न-भिन्न। शाकाहारी और संस्कारवान परिवारों के लड़के लड़कियां नशेबाजी और मांसाहारी प्रवृत्ति की ओर बढ़ रहे हैं। ऐसा नहीं कि सभी लड़के लड़कियां ऐसे हैं किंतु अच्छों की संख्या नगण्य है। ऐसे युवक युवतियों को अपने आपको मॉडर्न मानने वाला वर्ग बड़ी हेय दृष्टि से देखता है। मेरा मानना है कि पढ़ाई के नाम पर बड़े-बड़े महाविद्यालय और विश्वविद्यालय में क्या-क्या हो रहा है? यह किसी से छिपा नहीं है। समाचार पत्रों में छपने वाली खबरें सब कुछ बता देती हैं। सच्ची बात तो यह है कि पढ़ाई तो सिर्फ प्रारम्भिक क्लासों तक सीमित रह गई है। जितनी ऊंचाई की पढ़ाई उतनी ही गिरावट की ओर अग्रसर। इसीलिए यह बरबंड होते जा रहे हैं।
मेरा विचार यह है कि भले ही हम अपनी संतानों को बड़े-बड़े कॉलेज में न पढ़ाऐं। सिर्फ काम चलाऊ अक्षर ज्ञान दिलाकर मामूली नौकरी या छोटे-मोटे रोजगार में लगा दें किंतु संस्कार ऐसे दें कि उनका लोक और परलोक यानी चौरासी लाख योनियों के बाद मिला यह मनुष्य जीवन सार्थक हो। औलाद सच बोलने वाली हो ईमानदारी सादगी तथा परोपकार उनके जीवन में परिपूर्ण हो। मेरी नजर में सच्ची शिक्षा तो यह है और भैया जिसकी जो मर्जी हो वो अपनी संतानों को हाई-फाई वाली लाइन में बढ़ाकर वाहवाही लूटे। जो लोग अपनी औलादों को संस्कार नहीं दे पाऐं वे धिक्कार के पात्र हैं और जो लोग अपनी संतानों को संस्कारवान बनाकर उनके लोक और परलोक को सुधारते हैं वे धन्यवाद के पात्र हैं। ईश्वर के दरबार में उनका स्थान उच्च रहेगा।