HomeUncategorizedजूतों की माला की बात सुनते ही पत्रकार साहब तिलमिला उठे

जूतों की माला की बात सुनते ही पत्रकार साहब तिलमिला उठे

जूतों की माला की बात सुनते ही पत्रकार साहब तिलमिला उठे

 मथुरा। बात लगभग तीन-चार दशक पुरानीं है। देहात क्षेत्र के एक पत्रकार मुझे अपनी शादी का निमंत्रण देने आऐ। उन्होंने मुझसे कहा कि भाई साहब आपको शादी में आकर आशीर्वाद जरूर देना है। मैंने कहा कि आशीर्वाद तो मेरा तुम्हारे साथ हमेशा है पर यह तो बताओ कि दहेज कितना तय हुआ? इतना सुनते ही वे बड़े उत्साहित होकर बोले की दस लाख का पैकेज है। यह सुनते ही मेरे मन में आंच सी लग गई। खैर में शांत भाव से उनकी बात सुनता रहा। वे धारा प्रवाह बोलते जा रहे थे। आगे उन्होंने कहा कि इस ठेक पर सोने की अंगूठी, उस ठेक पर सोने की जंजीर तथा आगे की भी उन्होंने और कई रस्में में गिनाईं जिनमें एक एक लाख रुपए नगद आदि की चर्चा थी और अंत में वरमाला का जिक्र भी किया।
 अब मेरा धैर्य जवाब दे गया मैंने पूछा कि यह बता कि जूतों की माला तुझे कब पहनाई जाएगी? इतना सुनते ही वे बुरी तरह तिलमिला उठे और झल्लाकर बोले कि जूतों की माला का क्या मतलब है? आप ऐसी बात क्यों कह रहे हो? मैंने उससे सीधे-सीधे पूंछा कि क्या तू बिक रहा है? कोई भला आदमी अपनी बेटी को पाल पोस और पढ़ा लिखा कर तेरे सुपुर्द कर रहा है। तेरा घर बसेगा गृहस्थी चलेगी और उससे ज्यादा क्या चाहिए? शादी करनीं है तो बिना दान दहेज और सादगी के साथ कर।
 खैर उनके ऊपर मेरे प्रवचनों का कोई असर नहीं पड़ा वे तो एकदम आग बबूला से होकर पर पटकते हुए चले गये। मैं भी पक्का बेशर्म हूं मेरी सेहत पर भी कोई असर नहीं पड़ा क्योंकि मैं तो इस तरह की जहर जैसी कड़वी वांणी बोलने का आदी हूं। हालांकि मैं इस दान दहेज वाली कुष्ठ रोग से भी ज्यादा बुरी बीमारी को खुद अपने घर परिवार तक में नहीं रोक पाता हूं। पर हां एक बात जरूर है मैंने अपनी स्वयं की शादी बगैर किसी दहेज बगैर बारात बगैर कोई दावत के की थी। हां लगुन में स्वल्पाहार जरूर रखवाया। शादी करने से पहले मैंने अपने पिताजी से साफ कह दिया कि मैं अपनीं शादी बगैर दहेज बगैर निकासी बगैर दावत और बगैर किसी आडंबर यानी सादगी से करूंगा और हुआ भी यही।
 अब पत्रकार साहब वाली स्टोरी में अभी कुछ अंश और बाकी हैं। हुआ यह कि उन्होंने मुझसे दुश्मनीं मान ली। जब भी कहीं मेरी चर्चा होती वे अपना मुंह बना लेते तथा भूले भटके कोई मेरी तारीफ कर दे तो उन्हें बुरा लगता। इसके बाद फिर फेसबुक का जमाना आ गया जब भी मेरा कोई लेख फेसबुक पर चलता तो वे टंगड़ी मारने की तलाश में रहते। अब तो बहुत दिनों से शांत हैं, हो सकता है इस लेख के बाद फिर से उनमें जोश आ जाय। वैसे निष्पक्ष तौर पर देखा जाए तो उनकी गलती से ज्यादा मेरी भी गलती है, क्योंकि कोई आदमी हमारे दरवाजे पर आकर निमंत्रित कर रहा है और हम उसको जूतों की माला पहनाने की बात करें। बुरा लगना तो स्वाभाविक है पर मैं क्या करूं मैं भी तो अपनी आदत से लाचार हूं।
 मुझे कुछ और बातें भी बहुत बुरी लगती हैं, जैसे सैकड़ो रुपए की कीमत के मोटे-मोटे कार्ड, कार्डों पर पन्नी चढ़ाकर लाना इसके अलावा अंग्रेजी में कार्ड छपवाना। कुछ लोग तो अंग्रेजी की पूरी एबीसीडी भी नहीं जानते होंगे वे भी बड़े इतरा इतरा कर अंग्रेजी में कार्ड छपवाने लगे हैं। मैं जब टोकता हूं और खरी खोटी सुनाता हूं तो ज्यादातरों का जवाब होता है कि "क्या करें बच्चों की मर्जी के आगे हमारी नहीं चलती" मेरे इस बुर बोलेपन से लोग मन ही मन बहुत बुरा मानते हैं तथा अगली शादी में लिस्ट से मेरा नाम भी गायब। वैसे भी मैं ब्याह शादी वगैरा में कहीं जाता भी नहीं हूं। जहां सातों फूट जांय और जाना बहुत जरूरी होता है तभी शक्ल दिखाने को जाता हूं।
 बचपन में तो मैं सोचा करता था कि मेरी ससुराल बहुत पैसे वालों की हो और खूब दान दहेज आए किंतु जैसे-जैसे उम्र बढ़ती गई और भले बुरे का ज्ञान होने लगा तब मेरी यह सोच भी लोप होने लगी। सबसे ज्यादा सदमा मुझे तब लगा जब लगभग पांच दशक पूर्व मैंने एक समाचार पढ़ा जिसके अनुसार कानपुर में तीन सगी बहनों ने फांसी का फंदा लगाकर अपनी जान दे दी। कारण था दहेज। उनके माता-पिता गरीब थे तथा पैसों के अभाव में शादी हो नहीं पा रही थी और वे बेचारे दिन रात चिंता में डूबे रहते। इस हृदय विदारक घटना ने मुझे हिलाकर रख दिया।
 एक बात मेरी समझ में नहीं आती कि चौरासी लाख योनियों में सिर्फ एक इंसान ही ऐसा है जो वंश परंपरा को जारी रखने के लिए जोड़े बनाने के मौके पर कोढ़ से भी ज्यादा बुरी इस बीमारी से ग्रसित है। बाकी ८३ लाख ९९ हजार ९९९ योनियों में भी तो जोड़े बनते हैं। उनमें यह नींचता पूर्ण कृत्य क्यों नहीं होता है? इस दहेज दानव के कारण अबलाओं पर कैसे-कैसे जघन्य अत्याचार होते रहते हैं। और तो और जन्म लेने से पहले ही उनकी हत्या तक कर दी जाती है।
 अब और क्या कहूं इस दहेज और लेनदेन बाजी का ध्यान आते ही मेरे तन बदन में ज्वाला सी धधक उठती है। पर क्या करूं खून का घूंट पीकर बेबस सा बनकर रह जाता हूं। ये जो लालची भेड़िए हैं इनकी क्या दशा होगी? शायद अगला जन्म सूअर और कुत्तों का मिलेगा तथा सड़ सड़ कर मरेंगे।

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