मथुरा। संत? प्रेमानंद के आश्रम में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का आना कवच का काम कर रहा है। इसके अलावा डॉ. मोहन भागवत व अन्य बड़ी-बड़ी हस्तियों द्वारा लाइन लगाकर माथा टेकने आना भी वरदान बन गया है। इसलिए पुलिस और प्रशासन के हाथ पांव फूले हुए हैं तथा फूंक फूंक कर कदम रखे जा रहे हैं। ऐसा रास्ता खोजा जा रहा है कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। कहते हैं कि पुलिस रस्सी का सांप और सांप की रस्सी बनाने में माहिर होती है। इस मामले में भी इसी बाजीगरी का इस्तेमाल हो सकता है इसीलिए महीन काता जा रहा है। जबकि होना यह चाहिए कि पुलिस को आश्रम में घुसकर सीधी कार्यवाही उसी प्रकार करनीं चाहिए जैसे आयकर अधिकारी व्यापारियों के प्रतिष्ठानों पर करते हैं। पर कहावत हैं कि समरथ को नहीं दोष गोसाईं।जहां तक बड़ी-बड़ी तोपों द्वारा सलामी देने का सवाल है तो आसाराम बापू का उदाहरण ले लो वहां अटल बिहारी वाजपेई, लाल कृष्ण आडवाणी तक चक्कर काटते थे। श्रद्धालुओं की संख्या में भी आसाराम मुर्दार नहीं। महारानी द्रोपदी मुर्मू का सवाल है वे तो जाने आने घूमने फिरने का कोई भी मौका नहीं छोड़तीं। अंतापाड़ा की गंदगी से लवालब विशाल नाले से सटी और पटी घोंच पौंच वाली बस्ती में उनके आगमन के उदाहरण को ही ले लो। तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उनके बार-बार कलकत्ते आने को लेकर भी खरी खोटी सुनाई थी। प्रसंग से हटकर एक बात कहे बगैर मन नहीं मान रहा। द्रौपदी महारानी के आगमन पर शहर के सबसे महत्वपूर्ण चौराहे होली गेट पर अंतापाड़ा गली के नुक्कड़ पर एक सुलभ शौचालय व पेशाब घर था जिससे प्रतिदिन हजारों महिलाओं को सुविधा रहती थी। महिलाओं की बात इसलिए कि पुरुष तो कहीं भी लघुशंका कर लेते हैं किंतु महिलाओं को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। द्रौपदी जी के आगमन से पूर्व उसका विध्वंस उड़ा दिया गया क्योंकि राष्ट्रपति के काफिले को वहां से निकलने में बाधा होती। आज तक उस सुलभ शौचालय का पुनर्निर्माण नहीं कराया गया है यह कितने शर्म की बात है। वैसे तो महिलाओं के लिए बड़ी-बड़ी बातें बनाई जाती हैं और यहां प्रैक्टिकल में महिलाओं को कितना सताया जा रहा है। बेचारी महिलाएं लघु शंका के लिए इधर-उधर भटकती रहती हैं। मेरा सुझाव है कि महिलाओं की परेशानीं को देखते हुए सुलभ शौचालय का पुनर्निर्माण किया जाना चाहिए तथा उसके उद्घाटन हेतु राष्ट्रपति द्रोपति मुर्मू को निमंत्रित किया जाना चाहिए क्योंकि वे भी एक सह्रदय महिला हैं और महिलाओं की परेशानीं को भली भांति समझते हुए उद्घाटन हेतु तैयार हो जाएंगी। ऐसा मेरा विश्वास है। अब मूल मुद्दे पर आता हूं मुझे जवाहर बाग कांड के हीरो रामवृक्ष यादव का स्मरण हो आया है। उसे भी तत्कालीन सपा सरकार ने संरक्षण देकर खूब आगे बढ़ाया था। यदि तत्कालीन सीओ व दरोगा का बलिदान नहीं हुआ होता तो स्थिति भिन्न होती और रामवृक्ष मूंछों पर ताव देते हुए जवाहर बाग के बाद जय गुरुदेव आश्रम पर भी अपना झंडा फहरा लेता फिर होती संरक्षण देने वालों के साथ बंदर बांट। अंत में बिहारी जी से प्रार्थना करता हूं कि हे बांके बिहारी लाज रखो हमारी और जल्दी से जल्दी पर्दाफाश करके करो दूध का दूध और पानीं का पानीं।