Home Uncategorized देर है अंधेर नहीं रानी बन गई बांदी और बांदी बन गई रानी

देर है अंधेर नहीं रानी बन गई बांदी और बांदी बन गई रानी

0

 मथुरा। ऊपर वाले के यहां देर हो सकती है अंधेर नहीं। घटना लगभग पांच दशक पुरानीं है। मामला कासिमपुर पावर हाउस का है। चूंकि हमारे बड़े भाई साहब कासिमपुर में अभियंता थे। यह घटना उनके द्वारा पता चली।
 पावर हाउस में एक जूनियर इंजीनियर थे। उनके छोटे भाई का निधन हो गया। छोटे भाई की पत्नी जो अति सुंदर भी थी को जूनियर इंजीनियर ने अपनी रखैल बनाकर रख लिया। एक प्रकार से उसे पत्नी का दर्जा दे दिया और अपनी पत्नी को नौकरानी जैसा दर्जा दे दिया। जूनियर इंजीनियर के यहां जो लोग आते जाते वे उनकी पत्नी को नौकरानीं समझते तथा छोटे भाई की विधवा को पत्नी समझते। पत्नी बेचारी सीधी साधी थी तथा हर समय डरी सहमी रहती।
 आगे चलकर समय चक्र बदला। अचानक जूनियर इंजीनियर का निधन हो गया। उनके बीमा की राशि, फंड की मोटी रकम आदि के लिए कागजों की ढूंड़ खकोर हुई तब पता चला कि जो पत्नी बनी हुई थी वह तो उनके भाई की विधवा थी और जो पत्नी थी वह नौकरानी की तरह रह रही थी।
 अब नियम कानून तो अपने हिसाब से चलेंगे ना कि मृतक जूनियर इंजीनियर ने जो माहौल बना रखा था उस हिसाब से। बीमा, प्रोविडेंट फंड, बैंक का सारा पैसा तथा ऊपर से जूनियर इंजीनियर की मृत्यु के बाद मिलने वाली पेंशन सब कुछ नौकरानीं की तरह रहने वाली ओरिजनल पत्नी के हिस्से में आया तथा वह ठाठ वाट की जिंदगी जीने लगी और जो ठाठ वाट की जिंदगी जी रही थी वह सड़क पर आ गई।
 अब लगे हाथ एक और किस्सा बता दूं जो देर है अंधेर नहीं वाली बात को प्रमाणित करता है। दो भाई थे बड़ा भाई तेज तर्रार और चंट चालाक था तथा छोटा भाई सीधा-साधा या यौं कहें कि जरूरत से ज्यादा सीधा एक प्रकार से बुद्दू टाइप का। बड़ा भाई छोटे भाई को घर में नौकरों की तरह रखता था यानी कि दिनभर उसे किसी न किसी काम में पिदाता रहता।
 खैर यहां तक तो बात चलती रही किंतु हद इस बात की हो गई की उम्र ज्यादा होती गई और वह उसकी शादी भी न करे क्योंकि शादी होने पर फिर वह घर का सारा काम कैसे करता? मां-बाप थे नहीं जो कुछ करते। रिश्तेदारों व अन्य लोगों ने बड़े भाई से कह सुनकर उसकी शादी करा दी। अब क्या होता है कि बहू आ गई और बच्चे भी होने लगे किंतु बड़ा भाई उसे मकान में हिस्सा न दे। जब रिश्तेदारों ने कहा सुनी की तथा उसकी पत्नी ने भी दबाव बनाया तब बड़े भाई ने क्या चाल खेली कि उसे अपने मकान का पिछला हिस्सा दे दिया जिसका एक दरवाजा पीछे की गली में खुलवा कर आने-जाने का रास्ता बना दिया और मुख्य सड़क से सटा आगे का हिस्सा खुद रख लिया।
 छोटे भाई को कोई गिला शिकवा नहीं वह तो बस शांत भाव से मूक दर्शक जैसा बना रहता। अब सुनो आगे की बात समय चक्र का पहिया घूमा और मामला उलट गया। हुआ यह कि सरकारी आदेश पर वहां मास्टर प्लान लागू हुआ तथा सड़क चौड़ी करने के चक्कर में बड़े भाई का पूरा का पूरा हिस्सा मास्टर प्लान की भेंट चढ़ गया और छोटे भाई का जो पिछवाड़े का हिस्सा था उसका मुख्य द्वार मैन सड़क पर बन गया। उसके दो दरवाजे हो गए एक अगला दूसरा पिछला। चंट चालाक और जरूरत से ज्यादा चतुर बनने वाले बड़े भाई के पास अब सिर्फ हाथ मलने के और कुछ नहीं रहा।
 मेरा यह सब बताने का मतलब यह है कि जो लोग गलत तरीके से यानी नाजायज काम करके दूसरों के साथ धोखा करते हैं और उनका हक मारते हैं उन्हें देर सवेर अपनीं करनीं का फल जरुर भोगना पड़ता है। ऊपरी अदालत अच्छे और बुरे सभी कर्मों का फल जरूर देती है। इसलिए हम लोगों को आगा पीछा सब कुछ सोचकर अपने कर्म करने चाहिए। हो सकता है इस जन्म में न मिले तो अगले जन्म में जरूर मिलेगा।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here