Friday, August 19, 2022
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लाॅक डाउन का कहर मुगलों और अंग्रेजों के जमाने में भी ऐसे बर्बर अत्याचार नहीं हुऐ

विजय कुमार गुप्ता

मथुरा। देशवासियों के ऊपर ऐसे जघन्य और बर्बर अत्याचार तो मुगलों और अंग्रेजों के जमाने में भी नहीं हुऐ। अब तक पूरे देश में लाखों ही नहीं करोड़ों जानें जा चुकी हैं जिनमें इंसान और पशु-पक्षी दोनों ही शामिल हैं। वहीं करोड़ों इन्सान और जीव-जन्तु छटपटा रहे हैं।
लोग इस कदर त्रस्त हो चुके हैं कि चारों ओर हाहाकार मच उठा है। पौने दो महीने होने को आऐ, जनता को तड़पा-तड़पा कर मारा जा रहा है। ठीक उसी प्रकार जैसे पशु को गढ़से से धीरे-धीरे काटा जाता है। अब तो लोग सामूहिक खुदकुशी भी करने लगे हैं। पहले पूरे परिवार को मारकर फिर अपनी आत्महत्या करने तक को विवश हो रहे हैं। जितनी घटनाऐं हो रही हैं वह सभी तो प्रकाश में नहीं आ पातीं।
वैज्ञानिकों की इस बात पर कोई ध्यान नहीं दे रहा कि जब तक यह महामारी एक बार फैलेगी नहीं तब तक इस पर नियंत्रण असंभव है, क्योंकि लोगों के अन्दर इस महामारी के विषाणु रमेंगे नहीं तब तक शरीर के अंदर प्रतिरोधक क्षमता नहीं आएगी। बार-बार यह बात कही जा रही है कि जिस प्रकार चेचक, हैजा अथवा पोलियो के टीके लगाए जाते हैं ठीक वही स्थिति है, क्योंकि उन टीकों में भी उसी बीमारी के कीटाणु शरीर में डाले जाते हैं ताकि उस बीमारी से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न हो। यही स्थिति कुत्ता काटने के लिए लगाऐ जाने वाले रेबीज के इंजेक्शनों की है।
ऐसे अनेक देश हैं जहां लाॅक डाउन नहीं है किंन्तु फिर भी स्थिति नियंत्रण में है। पागलपन और चोचले बाजी की पराकाष्ठा हो रही है।
कहा जा रहा है कि अधिकांश राज्यों के मुख्यमंत्री और उनकी सरकारें लाॅकडाउन बढ़ाने के पक्ष में हैं। पक्ष में होंगे भी क्यों नहीं क्योंकि इनको भूखों मरना नहीं पड़ रहा। न ये हाॅट स्पाॅट इलाके में कैद होकर छटपटा रहे हैं और ना ही करोड़ों मजदूरों की तरह घर बार से दूर भूखे प्यासे सड़कों पर तड़प रहे हैं। ये लोग न वाहनों से कुचले जा रहे हैं और ना ही रेल की पटरियों पर सोते-सोते इनके चिथड़े उड़ रहे हैं। न इनके छोटे-छोटे बच्चे भूख प्यास से तड़प रहे हैं। ना ही इनके दुध मुंहे कलेजे के टुकड़ों को दूध की जगह पानी पिला पिला कर जिंदा रखने की कोशिश की जा रही है। ना ही इनके और इनके घर वालों के ऊपर पुलिस लाठी भांज रही है। धन्य है वे लोग जो भूखे प्यासे रहकर भी ऐसे जघन्य अत्याचारों को सह रहे हैं और धिक्कार है उनको जो खुद मदमस्त हैं और फिर भी जनता को तड़पा-तड़पा कर मार रहे हैं।
इन अभागों का यही तो कसूर है कि ये बेचारे बस यही मांग रहे हैं कि अपने घर जाने दो। हम पैदल ही जा रहे हैं, हमें रोको मत। कोई कोई तो पैदल चल चल कर हजारों मील की दूरी तय कर चुके हैं और घर के निकट तक पहुंच चुके हैं किंन्तु घेराबंदी कर के बीच में ही रोक दिया। अब जब कई वीभत्स कांड हुए तब झक मार कर कुछ रेलें और बसों के द्वारा भेजने की शुरुआत हुई है, जो ऊंट के मुंह में जीरा है।
पशु-पक्षी भूख प्यास से तड़प-तड़प कर मर रहे हैं। गत दिवस अखबार में पढ़ा कि वृंन्दावन में गोपीनाथ बाजार की एक दुकान को डेढ़ माह बाद खोला गया तो लगभग दो दर्जन कबूतर मरे पड़े मिले। यह तो एक दुकान की बात है किंन्तु देश भर में कितने कबूतरों व अन्य पक्षियों की मौत हुई होगी? दरअसल अक्सर देखा गया है कि दुकानों व अन्य प्रतिष्ठानों में कबूतर व अन्य कुछ पक्षी शाम के समय आकर अपना बसेरा बना लेते हैं और भोर होते ही दाना चुगने के लिए अपने गंतव्य की ओर उड़ जाते हैं। क्या इनकी मौतों को हल्के-फुल्के में लिया जाना चाहिये? क्या इन्सान की जान ही कीमती है? अब तो इन्सान की जान की भी कोई कीमत नहीं रह गई है। कीमती जान तो मंत्रियों, सांसदों, विधायकों, राजनैतिक लोगों और नौकरशाहों की है जो अपने-अपने बंगलों में मौज मस्ती की जिंन्दगी एसी में रहकर जी रहे हैं। हर सुख-सुविधा इनके चरणों में पड़ी हुई है।
क्या मौज मस्ती की जिन्दगी जीने वाले ये लोग करोड़ों मजदूरों के मध्य जाकर उनका दुख दर्द बांट रहे हैं या हाॅटस्पाॅट का नाम देकर उन लोगों के साथ रहकर सुख-दुख की सुध ले रहे हैं। जिन्हें जेल की तरह कैद करके पटक दिया है। इन क्षेत्रों के लोग जब बाहर आयेंगे तो उनमें काफी पागल हो चुके होंगे। बेशर्म लोग चाहे सरकारें हों अथवा प्रशासन, खाना दे नहीं सकते और उन बेचारों को घर जाने में भी पशुओं की तरह घेराबंदी करके तड़पा-तड़पा कर मारने पर तुल गऐ। इन लोगों को तो शराबियों की चिंता है क्योंकि इनमें भी तो ज्यादातर पियक्कड़ हैं।
भगवान के यहां देर है अन्धेर नहीं। आगे चलकर इन्हें भी अपने किये की सजा अवश्य मिलेगी। जो मर रहे हैं और छटपटा रहे हैं, उनकी बद्दुआऐं जन्म जन्मांतर तक इन जिम्मेदार लोगों का पीछा नहीं छोड़ेंगी। अब कुछ राजनैतिक दल यह कह रहे हैं कि ये हत्याऐं हैं। वे सही कह रहे हैं मैं स्वयं भी पूर्णतः सहमत हूं।
आपके पास साधन नहीं सुविधाऐं नहीं। जांच के उपकरण दो कौड़ी के, कभी किसी को पाॅजिटिव बना दिया और दूसरे दिन निगेटिव करार दे दिया। जिसे निगेटिव बनाया दूसरे दिन उसकी मौत हो गई। सरकारी और गैर सरकारी जांचें भी एक दूसरे से भिन्न रिर्पोट दे रही हैं। ऐसा तमाशा बना दिया है कि कुछ भी समझ में नहीं आता। एक केस पाॅजिटिव मिला और दो-दो किलोमीटर तक के इलाके को हाॅटस्पाॅट का नाम देकर बना दी अस्थाई जेल कि मरो तड़प तड़प कर। ऐसा लगता है कि कोरोना के नाम पर लोगों को तड़पता हुआ देखकर राक्षसी वृत्तियां अठ्ठाहस करके जश्न मना रही हैं।
कुछ बेशर्म लोग कह रहे हैं कि यदि लाॅकडाउन न होता तो देश में अब तक लाखों लोग मर गए होते। इन अकल के दुश्मनों को यह पता होना चाहिये कि हमारे देश के लोगों में सर्दी, गर्मी, वर्षा सभी मौसमों की तीव्रता सहने की क्षमता है। कभी भीषण गर्मी और कभी भीषण सर्दी सहने की क्षमता के कारण हमारा देश उन देशों की तुलना में ज्यादा सुरक्षित है। ज्यादातर मौतें वहां हुई हैं जहां लगभग एक सा मौसम होता है उन देशों के लोगों में प्रतिरोधक क्षमता का अभाव है। यदि उन देशों के लोगों को वहां से लाकर मई-जून की 46-47 डिग्री की गर्मी में रख दिया जाए तो जीभ लटकाऐ हांफनी लेते हुए इधर से उधर-उधर से इधर भागते फिरेंगे।
यह तर्क देते हुए एक बौद्धिक विचारक परोपकारी व्यक्तित्व के धनी एवं जीव जन्तु प्रेमी मनोज तौमर का कहना है कि हमारे देश की जलवायु गर्मी-सर्दी आदि सहने की क्षमता का ही यह परिणाम है कि एक जैसे मौसम वाले देशों की तुलना में हमारा देश अधिक सुरक्षित है।
श्री तौमर कहते हैं कि हमारे यहां जांच की रफ्तार पौने दो माह होने के बाद भी उस गति में नहीं आई है जो होनी चाहिये। सबसे ज्यादा दिक्कत घटिया उपकरणों की है। उनका कथन है कि जिस व्यक्ति को कोरोना की महामारी चिपट गई वह तो किसी भी सूरत में बचने वाला नहीं। उनका कथन है कि खांसी, कफ, जुखाम, बुखार आदि क्या पहले नहीं होते थे क्या? जरा किसी को यह लक्षण हुऐ, उन्हें कोरोना के लक्षण बताकर उपचार (क्वारंटीन) हेतु यातना ग्रहों में भेज दिया जाता है और बाद में यह कहकर छुट्टी कर दी जाती है कि अब यह निगेटिव हो गया।
मनोज तौमर का यह भी कथन है कि कुछ लोगों के कोरोना की पाॅजिटिव रिपोर्ट आते ही पूरे क्षेत्र को हाॅटस्पाॅट का नाम देकर जेल बना दिया जाना भी गलत है। उनका तर्क है कि यदि किसी परिवार में पाॅजिटिव केस मिलता है तो उसी घर को नजरबंद करके पुलिस बैठा देनी चाहिये तथा हर प्रकार की सुविधा खान-पान आदि की व्यवस्था होम डिलीवरी के द्वारा होनी चाहिए ना कि लाखों लोगों को सजा देनीं चाहिये।
श्री तौमर का कथन है कि यह प्रलय काल है। आॅस्ट्रेलिया की आग जिसमें लगभग पांच करोड़ जीव जंतुओं के जलकर भस्म होने का अनुमान है, भी उसी का हिस्सा है। आंधी, तूफान, बेमौसम वर्षा तथा भूकम्प आदि सभी उसी का रूप हैं और अभी इनसे छुटकारा आसानी से मिलना नहीं। उनका कथन है कि इस प्रलय का मुख्य कारण इन्सान द्वारा प्रकृति के साथ छेड़छाड़ और निरीह प्राणियों के साथ जघन्य अत्याचार है। श्री तौमर कहते हैं कि इन्सान द्वारा किये गये पापों का फल ही अब पृथ्वीवासी भोग रहे हैं। अन्त में वे कहते हैं कि निरीह पशु-पक्षी जीव-जन्तुओं का करुण क्रंदन और चीत्कार ही इस प्रलय काल की मुख्य वजह है।

बुद्ध का उपदेश हो सकता है कारगर
गौतम बुद्ध जिन्हें हमारे धर्म शास्त्रों में बुद्धावतार कहा गया है, का उपदेश इस समय कोरोना की महामारी में सर्वाधिक कारगर हो सकता है।
भगवान बुद्ध का उपदेश है कि आप तूफान को शान्त नहीं कर सकते, कोशिश व्यर्थ है। आप स्वयं को शान्त कीजिए, तूफान खुद व खुद चला जाएगा। यह उपदेश वर्तमान दौर में एकदम सटीक बैठता है।
यदि हम भगवान बुद्ध के उपदेश का मर्म समझें और उसका अनुसरण करें तो निश्चित रूप से हम सफल होंगे। हम सभी को भगवान बुद्ध के जीवन दर्शन के अनुरूप दयावान होकर जीव हिंसा से दूर रहना चाहिये इसी में हमारी हमारे परिवार हमारे समाज और हमारे देश अपितु यूं कहिए संपूर्ण विश्व की भलाई है।

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