Monday, April 22, 2024
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एक विकलांग गाय जिसे हम कृत्रिम पैर लगाकर चलाते थे

मथुरा। लगभग लगभग बीस बाईस वर्ष पुरानीं बात है। हमारे घर के निकट बंगाली घाट चौराहे पर एक गाय बैठी हुई थी कि अचानक बस का पहिया उसके पिछले पैर पर चढ़ गया और उसका घुटना चकनाचूर हो गया। मुझे जैसे ही पता चला तो मैं उस गाय को अपने यहां ले आया और घर के सामने मिट्टी डलवा कर उसका आशियाना बना दिया तथा धूप व बरसात से बचाव हेतु बल्लियां ठुकवा कर टीन की चादर भी जड़वा दी।
     इसके बाद वेटरनरी कॉलेज के डॉक्टर रूद्र प्रताप पांडे को बुलवाकर दिखाया तथा डॉक्टर साहब प्रतिदिन उसकी ड्रेसिंग करने लगे। वह गाय किसी जमाने में चतुर्वेदी समाज के अध्यक्ष रहे नामचीन स्वर्गीय मधुसूदन सिंह की थी, जो यमुना किनारे मारू गली में रहते थे। गाय का अपने पालने वाले परिवार से ऐसा जबरदस्त मौह कि कभी कभी लंगड़ाते हुए भी अपने पुराने घर पहुंच जाती। कुछ मौके ऐसे भी आये कि डॉक्टर पांडे जो भलमन साहत और सेवा भाव की मिसाल थे, हमारे एक सहयोगी भगवान दास अग्रवाल उर्फ भगत जी के साथ मारू गली में जाते और वहीं पर इंजेक्शन लगाने व ड्रेसिंग करके आते थे। बाद में फिर उस गाय को हम रस्सी से बंधवाकर हांक हूंक व खींच खांचकर अपने घर लिबा लाते।
     समय गुजरता गया किंतु गाय की हड्डी नहीं जुड़ी और फिर उसका पैर घुटने के निकट से कटवाना ही पड़ा। इसके कई माह बाद जब वह जख्म सही हो गया तो फिर मुझे एक युक्ति सूझी, कि इसका कृत्रिम पैर बनवाकर लगाया जाय और देखा जाए कि हमारा प्रयोग सफल होता है या नहीं? हमने एक मोटा बांस मंगाया उसमें से लगभग एक सवा फुट का टुकड़ा काटा तथा गांठ के ऊपर लगभग पांच छः इंच की जगह को इस हिसाब से काटा कि चारों ओर चार खपच्चियां छोड़ी और शेष हिस्सा निकाल दिया। इसके बाद चारों खपच्चियों पर कपड़ा लपेट दिया ताकि वे गाय के पैर में गढ़ें नहीं और फिर गाय के पैर के कटे हुए स्थान पर मुलायम सा कपड़ा लपेटकर उन चारों खपच्चियों को चौड़ा कर उसमें अंदर तक सैट कर ऊपर से सुतली द्वारा कसकर बांध दिया ताकि निकल न जाय।
     इसके बाद गाय को उसकी पूंछ पकड़कर सहारा देते हुए आहिस्ता से उठाया। जैसे ही गाय उठ कर खड़ी हुई तो तुरंत कृत्रिम पैर के सहारे से ऐसे चलने लगी जैसे सामान्य गाय चलती है। यह दृश्य देखते ही हम लोगों की खुशी का पारावार नहीं रहा और तालियां बजने लगीं। जब गाय थोड़ी बहुत घूम घूम कर वापस आ जाती तब उस कृत्रिम पैर को खोल कर रख दिया जाता। यह क्रम वर्षों तक चला। वह गाय जब तक जिन्दी रही तब तक हमारे यहां ही रही। आगे चलकर वह इतनी हिल गई कि उसने अपने पुराने स्थान मारू गली में जाना छोड़ दिया।
     एक घटना मुझे याद आ रही है। जब मैं उस गाय के पैर की पट्टी करता था तब एक दिन हमारे पुराने मित्र कामरेड शिवदत्त चतुर्वेदी टौन्ट कसने लगे कि जब किसी जमीन पर कब्जा करना होता है तो शुरुआत में ऐसा ही कुछ किया जाता है। उनका मतलब था कि जैसे कोई प्याऊ लगा दी जाती है या किसी देवी देवता की मूर्ति लगा दी जाती है और फिर धीरे-धीरे पक्का निर्माण और फिर अंत में पक्का कब्जा हो जाता है। यह बात उन्होंने इसलिए कही कि मैंने सरकारी जमीन पर बल्ली गढ़वा कर ऊपर से टीन की चद्दर चढ़वा दी थी।
     कहा तो उन्होंने मजाक में था किंतु मजाक के साथ-साथ उनके मनोभाव भी झलक रहे थे। परंतु इन्ही शिवदत्त जी ने मुझे आगे चलकर एक दूसरा प्रमाण पत्र भी दिया। जब मैं  कंठ से लेकर टुन्डी तक कुत्तों द्वारा फाड़ डाली गाय की सेवा में लगा हुआ था। तब उन्होंने अपने होटल से घर जाते समय कहा था कि “विजय बाबू ब्रजान्चल मैं तुम्हारे जैसा करुणामयी व्यक्ति और कोई नहीं है”।
     खैर उन्होंने मेरे प्रति अलग-अलग तरह की जो दो बातें कहीं मेरी नजर में दोनों ही गलत थीं। क्योंकि न तो मैं सरकारी जमीन पर कब्जा करने की नीयत रखता था, हां कब्जा तो किया था किंतु अल्प समय के लिए वह भी अपने लिए नहीं गौमाता के लिए और दूसरी बात कि ब्रजान्चल में मुझसे भी कहीं अधिक दयालु एक से बढ़कर एक हैं। फर्क इतना है कि मैं नजरों से दिखाई दे रहा हूं और बहुत से लोग ओझल रहकर अपने सेवा कार्य को अंजाम दे रहे हैं।
     हमारे पिताजी कहते थे कि वेद पुराण तथा हमारे अन्य सभी धर्म ग्रंथों का सार यानी निचोड़, परमार्थ है। यदि हम परमार्थ करेंगे तो जीवन सार्थक रहेगा वर्ना यह मनुष्य जीवन बेकार गया। इस संदर्भ में मेरा मानना है कि इंसान से ज्यादा महत्व पशु पक्षियों का है क्योंकि वे अपने दुख को कह नहीं सकते और ना ही एक दूसरे के दुख को बांट सकते।
     अतः हम सभी को इंसानों से अधिक इन निरीह प्राणियों के प्रति करुणामयी होना चाहिए। इससे हमारा आत्मबल तो बढ़ता ही है साथ ही चौरासी लाख योनियों के बाद मिला यह मनुष्य जीवन भी सार्थक हो जाता है।

विजय गुप्ता की कलम से

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