Monday, April 22, 2024
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सपना हो गया सच पर मिठाई मिली थोड़ी सी

मथुरा। बात कई वर्ष पुरानी है। बृज बिहार बस सर्विस वाले श्री विष्णु चौबे मुझसे बड़ा स्नेह मानते थे। जब वे जीवित थे तब भी अक्सर मेरे सपने में आकर खूब बतियाते थे और कभी-कभी तो मन की बात भी सपने में ही हो जातीं। जब कभी उनकी तबीयत उन्नीस बीस होती तो मुझे सपने के द्वारा उसका आभास हो जाता था।
     एक बार मुझे एक सपना दिखाई दिया कि मैं उनके पास राधे श्याम आश्रम गया वहां विष्णु चौबे  बैठे हुए थे। मैंने उनसे कहा कि बहुत बड़ा मुकदमा जीत गए हो हमारी मिठाई पक्की। इस पर विष्णु चौबे जो विष्णु गुरु के नाम से विख्यात रहे हैं, ने कोई ध्यान नहीं दिया। मैंने सपने में ही फिर कहा कि इतना बड़ा मुकदमा जीत गए हो हमारी मिठाई पक्की। अबकी बार उन्होंने मेरी बात पर ध्यान दे दिया और सर हिलाकर स्वीकारोक्ति दे दी यानीं मिठाई पक्की हो गई। सपने वाली यह बात मैंने उनके बड़े बेटे ब्रह्मानन्द चतुर्वेदी को भी बताई।
     लगभग पन्द्रह बीस दिन बाद विष्णु गुरु के दूसरे नंबर के बेटे पवन चतुर्वेदी का फोन आया कि भाई साहब आपसे पिताजी बात करना चाहते हैं। मैंने उनसे बात की तो विष्नु जी बोले कि बेटा बधाई है हम पचास साल पुराना आर्य समाज की जमीन वाला मुकदमा हाईकोर्ट से जीत गए हैं। यह कहते कहते वे भावुक हो गए और उनका गला रुंध गया। इसके बाद वे और अधिक नहीं बोल पाए। दरअसल उन दिनों उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं था इसके बाद फोन पवन जी ने ले लिया।
     मुझे बड़ी खुशी हुई कि मेरा सपना सच हो गया। दूसरी खुशी यह भी हुई कि अब तो मिठाई सचमुच में पक्की हो गई। दूसरे दिन कोई व्यक्ति घर आकर एक दौने में चार नग मलाई चाप के यह कह कर दे गया कि महावीर गुरु ने भिजवाए हैं। महावीर जी विष्णु चौबे के तीसरे नंबर के पुत्र हैं। मुझे प्रसन्नता हुई कि भले ही चार नग आए हैं लेकिन मिठाई आई तो सही। मान का तो पान ही बहुत होता है।
     आर्य समाज वाले भूखंड जिसमें विष्णु गुरु ने हाई कोर्ट से जीत हासिल की थी, पर पहले एक बड़ा वेश्यालय चलता था। विष्णु जी ने जब इस जमीन को लिया तब उन्होंने यहां लगने वाले वेश्या बाजार को जड़ मूल से समाप्त करा दिया। फलस्वरूप शहर के मध्य से गंदगी का अड्डा हट गया। इससे पहले इस वेश्यालय को हटाने के लिए आए दिन धरना आंदोलन आदि चलते रहते थे किंतु नतीजा सिफर होता। जब विष्णु जी ने इस जमीन पर कब्जा लिया तो आर्य समाज से उनका विवाद शुरू हो गया क्योंकि आर्य समाज इस जमीन को डिग्री कॉलेज के लिए अधिग्रहण करना चाहता था, खैर तभी से आर्य समाज वनाम विष्णु चौबे के मध्य विवाद शुरू हो गया जिसका अब पटाक्षेप हाईकोर्ट के निर्णय से हुआ।
     इस प्रकरण में एक बार तो मैंने उस समय के जिलाधिकारी के. एस. त्रिपाठी को भी खरी-खोटी सुनाई थी क्योंकि प्रशासन उस समय आर्य समाज के साथ और विष्णु चौबे के विरोध में था। मैंने जिलाधिकारी से कहा कि आपको तो विष्णु चौबे का अहसान मंद होना चाहिए क्योंकि जो कार्य आपका प्रशासन नहीं कर पाया उसे उन्होंने कर दिया। के.एस. त्रिपाठी बोले कुछ नहीं सिर्फ सिगरेट के कश पर कश खींचते रहे। वे सिगरेट के बेहद शौकीन थे तथा खुद अपने हाथ से सिगरेट बनाते रहते। पहले पतले से कागज को गोल-गोल लपेटते और फिर मेज पर रखी डिब्बी में से तंबाकू निकाल कर उस में भरकर सिगरेट तैयार कर लेते और धूम्रपान का आनंद लेते रहते।
     बात मुकदमे में जीत और मिठाई की चल रही थी और कहां से कहां यानीं सिगरेट तक पहुंच गई। अब जब बात सिगरेट की चल ही रही है तो यह भी बता दूं कि एक एस.एस.पी. यहां आए थे भावेश कुमार वह भी सिगरेट के बड़े जबरदस्त शौकीन थे। उन्हें तो मैंने बगैर सिगरेट के शायद एकाध बार ही देखा हो। हां जब वह हमारे घर आते तब तो उन्हें बगैर सिगरेट के मजबूरी में रहना पड़ता था क्योंकि हमारे यहां दरवाजे में घुसते ही एक बोर्ड लगा हुआ है कि “यहां बीड़ी सिगरेट पीना सख्त मना है”।
     भावेश कुमार जी अक्सर तत्कालीन डीएम सदाकांत जी के साथ आते थे और कभी-कभी तो दोनों एक घंटे से भी ज्यादा रुकते किंतु उन्होंने घर के अंदर कभी भी सिगरेट नहीं निकाली। और जैसे ही वापस जाने के लिए दरवाजे से बाहर निकलकर गाड़ी में बैठते तुरंत सिगरेट होठों के मध्य में पहुंच जाती और हाथ में लगा लाइटर जल उठता।
     अब अंत में फिर मैं अपने असली मुद्दे पर आता हूं तथा मुझे अपने लालची मन और मिठाई के चटोरे पन की वजह से अपने अन्दर छिपी एक बात को कहे बगैर नहीं रहा जा रहा है। बात यह है कि अब जब कभी विष्णु जी मेरे सपने में आएंगे तो मैं यह जरूर कहूंगा कि “गुरु करोड़ों अरबों की जमीन का मुकदमा जीतने की खुशखबरी एडवांस में दे दी और इनाम में मिठाई के कुल चार नग”? शायद इस पर वे अपने पुत्रों को सपने में आकर डांट लगाएं और कहें कि “मेरे जैसे दिलेर के बेटा है कै भी तुम इतने कंजूस क्यों हौ? अरे एक किलो मिठाई तो भिजवाते”! इसके बाद मेरे लालची मन और मिठाई के चटोरे पन की मुराद शायद पूरी हो जाय।
     इस बात में कोई दो राय नहीं कि विष्णु गुरु दरिया दिल, बात के धनी, जीदार और मस्त स्वभाव के लाजवाब इंसान थे। यही कारण है कि किसी जमाने में पूरे शहर में उनका डंका बजता था और बड़े बड़े बदमाश भी उनके सामने थरथर कांपते थे। वे मुझसे तो स्नेह मानते ही थे मेरे दिवंगत पुत्र विवेक से भी बेहद स्नेह रखते थे। अक्सर जब कभी उनके यहां कोई खास चीज बनती जैसे फालसे का शरबत या ठंडाई आदि तो वे सबसे पहले मेरे पुत्र के लिए भिजवाते और पुत्र भी यह कहता कि यह तो विष्णु बाबा ने मेरे लिए भिजवाया है और कोई मत पीना मैं ही पीऊंगा। विष्णु गुरु की बातें आज बहुत याद आतीं हैं। वे जहां भी हों ईश्वर उन्हें सुख शांति में रखें।

विजय गुप्ता की कलम से

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