मथुरा। संत प्रेमानंद को मैं एक ऐसी अनबूझ पहेली मानता हूं जिसका उत्तर खोजते खोजते आदमी की खोपड़ी चकराने लगती है। और किसी की चकराऐ या न चकराऐ किंतु मेरे भेजे में यह बात बिल्कुल नहीं बैठती कि किसी आदमी की दोनों किडनी खराब हो गई हों और उसके बावजूद भी वह कश्मीरी सेब और गुलाबी अनार की तरह सुर्ख बना रहे। इसके अलावा तंदुरुस्ती ऐसी कि नौजवानों की तरह दौड़े।
इतने प्रखर रूप से अपनी जिंदगी को जीना क्या ऐसा नहीं लगता कि चिकित्सा विज्ञान को बड़ी चुनौती देते हुए चमत्कार कर दिखाया है? यदि यह बात सही है तो संत प्रेमानंद को विश्व स्तर पर एक अनोखी मिसाल के रूप में पेश किया जाना चाहिए। कुछ लोगों का मानना है कि यदि वास्तव में प्रेमानंद जी की दोनों किडनी खराब हैं और उसके बावजूद यह चमत्कारिक जिंदगी जी रहे हैं, तो इसके पीछे का एक राज यह भी हो सकता है कि उन्हें कोई दुर्लभ जड़ी बूटी हासिल हो गई है जो संजीवनी का काम कर रही है। लोगों का कहना है कि यदि यह बात सही है तो प्रेमानंद जी को उस संजीवनी को सबके सामने स्पष्ट करना चाहिए ताकि अन्य लाखों लोग जो किडनी खराब होने की वजह से धीरे-धीरे करके काल के गाल में समाते जा रहे हैं, के जीवन की रक्षा हो सके।
वैसे तो प्रेमानंद जी के बारे में और भी तरह-तरह की बातें प्रचारित हैं, किंतु हम किसी के निजी जीवन में कोई टीका टिप्पणी नहीं करना चाहते। काफी समय पहले एक व्यक्ति ने प्रेमानंद जी को लेकर काफी हो हल्ला मचाया कि इनकी दोनों किडनी खराब होने का तो सिर्फ प्रोपेगेंडा है। ये तो केवल पब्लिसिटी स्टंट है। एक और बात भी काफी दिन पहले सोशल मीडिया पर सुर्खियों में रही कि इनके एक कथित गुरुजी की फोटो अनेक लड़कियों के साथ रोमांटिक लहजे में देखी गईं और तमाम लोगों ने उस पर मजाकिया टिप्पणी भी कीं। एक व्यक्ति ने तो यहां तक कह दिया कि "हे भगवान यह सब देखने के पहले में मर क्यों नहीं गया" खैर हम इस सब पचड़े बाजी में नहीं पड़ना चाहते किन्तु दूध का दूध और पानीं का पानीं तो होना ही चाहिए।
जहां तक उनके भक्तों की भीड़ का सवाल है वह तो हमारा देश भेड़चाल वाला है। भीड़ तो आसाराम बापू और राम रहीम के पास खूब रही और आज भी उन पर मर मिटने वालों की कमी नहीं है, पर सवाल इस बात का है कि संतत्व की मर्यादाओं का भी तो उल्लंघन नहीं होना चाहिए। कुछ लोगों का कथन है कि भक्ति को व्यवसाय से अलग रखना चाहिए। प्रेमानंद जी के आश्रम में उनसे मिलने के लिए टोकन व्यवस्था का क्या मतलब है? इसके अलावा उनका नवीन आश्रम जो किसी फिल्मी सेट से कम नहीं, क्या संतत्व की श्रेणी में आता है? इससे भी ज्यादा कौतूहल की बात यह है कि एक ओर तो सुप्रीम कोर्ट व एन.जी.टी. के आदेश हैं कि खादर की जमीन से पुराने अवैध कब्जे हटाए जांय और दूसरी ओर खादर की सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा करके नवीन आश्रम का बनना क्या संदेश देता है?
अंत में केवल यही कहना चाहूंगा कि संत प्रेमानंद को उन सभी बातों से अलग रहना चाहिए जो संतत्व की श्रेणी से इन्हें दूर दिखाती हैं तथा ऐसी कौन सी जड़ी बूटी इन्हें हासिल हो गई है जिसने चिकित्सा विज्ञान को पटखनी दे दी है। मैं संत प्रेमानंद जी और उनके लाखों भक्तों से क्षमा मांगते हुए अपनी जिज्ञासा शांत करने की भावना से अनबूझ पहेली को बूझना चाहता हूं।