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यह संत प्रेमानंद का आश्रम है या संत जरनैल सिंह भिंडरवाला का स्वर्ण मंदिर

मथुरा। संत प्रेमानंद के आश्रम में आजकल जो कुछ चल रहा है उससे मुझे ऐसा महसूस होने लगा है कि कहीं यह वैसी स्थिति तो नहीं जो किसी जमाने में खालिस्तान समर्थकों के सर्वे सर्वा संत जरनैल सिंह भिंडरांडर वाला व उनके चेले चपाटों ने अमृतसर के स्वर्ण मंदिर को अपना सुरक्षित ठिकाना बना लिया था। जनरैल सिंह भिंडरवाला को संत मैं इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि खालिस्तान समर्थक सिख समुदाय उन्हें संत मानता था। उस दौरान स्वर्ण मंदिर में परिंदा भी पर नहीं मार सकता था। वहां एक से बढ़कर एक खूंखार अपराधियों का जमावड़ा तथा खतरनाक हथियारों का जखीरा एकत्र हो गया था। पुलिस के प्रवेश का तो कोई मतलब नहीं। कुछ-कुछ मिलती-जुलती स्थिति प्रेमानंद के आश्रम में है वहां भी पुलिस फटक तक नहीं सकती। प्रेमानंद जी के चेले चपाटों में भी एक से बढ़कर एक खलीफा हैं।
एक ही उदाहरण काफी है कि जब एक साध्वी मृतक दुलारी शरण की मां को ढाढस बंधाने पहुंची तो प्रेमानंद के चेलों ने उसे बुरी तरह धमकाया तथा कहा कि हम लॉरेंस बिश्नोई गैंग से तुझको उठावा देंगे क्योंकि तू हमारे महाराज जी को बदनाम करने आई है। वह बेचारी घबरा कर अपने घर चली गई तथा डर के मारे अपने घर से भी नहीं निकल रही। इसी एक घटना से पता चलता है कि इन लोगों के हाथ कितने लंबे हैं। प्रेमानंद आश्रम में रह रहे लोगों पर जो गंभीर और सनसनीखेज आरोप लग रहे हैं वह किसी से छिपा नहीं। जिस प्रकार जवाहर बाग में रामवृक्ष यादव के चेले चपाटे, जो एक बार घुस जाता था उसे बाहर फटकने तक नहीं देते थे यही स्थिति यहां भी है। मैं सबसे पहले यह सवाल पूंछता हूं कि क्यों नहीं पुलिस आश्रम में घुसकर छानबीन करती, क्यों नहीं इन लोगों से सख्ती से पूछताछ करती। वैसे तो छोटे-छोटे मामलों में अपराधियों पर थर्ड डिग्री का इस्तेमाल होता है और यहां पर स्थित एकदम भिन्न। आखिर यह सब क्यों? सिर्फ इसलिए कि राष्ट्रपति मुर्मू आदि बड़ी-बड़ी हस्तियां माथा टेक गईं। मैं पूछता हूं कि राष्ट्रपति आ गईं तो क्या साक्षात राधा रानी पधारी?
दूसरी बात मेरी समझ में यह नहीं आती कि जहां सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी के सख्त आदेश हैं कि खादर की जगह से अवैध निर्माण हटाए जाएं वहां खादर की जगह में प्रेमानंद जी का फिल्मी सेट की तरह अत्याधुनिक आश्रम कैसे बन गया? इसके अलावा खादर की जगह में प्रेमानंद जी के चेले चपाटे कॉलोनियां काट कर प्लॉट बेच रहे हैं और प्रशासन हाथों-हाथ सड़क बिजली पानीं आदि की व्यवस्था कर रहा है यह सब क्यों? क्या यह सब सपा सरकार के दौरान जवाहर बाग मामले में रामवृक्ष यादव को संरक्षण देने जैसा नहीं? यदि शासन और प्रशासन का रवैया नहीं बदला तो लोगों के मन में यह बात पैठ कर जाएगी कि भारतीय जनता पार्टी और सपा में कोई फर्क नहीं।
मेरा कहना सिर्फ यह है कि ऐसा न हो कि कहीं थोड़ी सी लाज ढकने के चक्कर में बहुत ज्यादा लाज उघड़ जाए। इसी बात पर एक चुटकुला बताता हूं जो इस मामले में फिट बैठता है। पुराने जमाने में बहुऐं ससुर से बहुत ज्यादा पर्दा रखती थीं। एक बार ऐसा हुआ कि एक बहू ब्लाउज व पेटिकोट पहनकर खुली जगह में बैठी थी कि अचानक उसके ससुर जी आ गए। बहू के छक्के छूट गए वह बेचारी बुरी तरह घबरा गई क्योंकि छिपने के लिए कोई जगह नहीं थी। उसने मुंह ढकने के लिए एक युक्ति अपनाई जिससे थोड़ी सी लाज तो बच गई किंतु बहुत ज्यादा लाज उघड़ गई। बहु रानी ने झटपट पेटिकोट को पीछे से ऊंचा करके उसी से घूंघट कर अपनी लाज बचाई। हालांकि यह चुटकुला है किंतु इसके अंदर बहुत कुछ नसीहत भी है। मुझे जो कुछ कहना था कह दिया बाकी जिसकी मर्जी हो जो करे। जो करतम सो भोगतम।
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