विजय गुप्ता की कलम से

मथुरा। दो-तीन दिन पहले मैं एक निजी कार्यक्रम में गया, वहां संत शैलजाकांत जी भी गए हुए थे। मैंने देखा कि संत जी ने जो उपहार दिया वह अनमोल था। आयोजक को मेहमानों द्वारा जो उपहार दिए जा रहे थे, वे एक से ज्यादा एक आकर्षक और मूल्यवान थे किंतु मुझे शैलजाकांत जी द्वारा दिया गया उपहार बेहद पसंद आया। उन्होंने एक छोटा सा तुलसी का पौधा भेंट किया। मेरी नजर में तुलसी का पौधा सबसे ज्यादा कीमती था वल्कि वेश कीमती कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। तुलसी के पौधे की कीमत रुपयों में भले ही नाम मात्र की हो किंतु मेजबान ने उसे बड़ी श्रद्धा के साथ माथे से लगाकर स्वीकार किया। मैंने सुना है कि शैलजाकांत जी यदि किसी निजी कार्यक्रमों में जाते हैं तो वे तुलसी का एक छोटा सा पौधा ही उपहार में देते हैं।
काफी दिन पहले कुं० नरेंद्र सिंह मुझसे कह रहे थे कि मेरे बेटे की शादी में शैलजाकांत जी आए थे तथा तुलसी का एक पौधा आशीर्वाद स्वरुप दे गऐ। उस घटना को वर्षों हो गए किंतु वह आज भी मेरे घर में बड़े स्वरूप में मौजूद है और जब-जब मैं उस पौधे को देखता हूं तब मुझे शैलजाकांत जी के आगमन का स्मरण हो आता है। इसी बात से अंदाज लगाया जा सकता है कि वेश कीमती ज्यादा महंगे वे उपहार थे या यह तुलसी का पौधा?
इसी प्रसंग में मुझे करीब बीस वर्ष पुरानीं घटना याद आ रही है। मैं एक शादी समारोह में गया था वहां सेना के एक बहुत बड़े अवकाश प्राप्त अधिकारी मिले, जो हमारे पिताजी के बहुत आत्मीय मित्र के पुत्र थे। उन्होंने मुझे बताया कि आपके पिताजी ने मेरी शादी में उपहार स्वरूप "गीता" भेंट की थी, जो आज भी मेरे पास सुरक्षित है। कहने का मतलब है कि हम लोगों को भी कुछ इस प्रकार की वस्तु भेंट करनी चाहिए जो आलतू फालतू की महंगी वस्तुओं के बजाय भावनात्मक लगाव वाली हो।

