मथुरा। अभी कुछ दिन पहले मैंने संत प्रेमानंद जी के बारे में एक लेख लिखा था कि संत प्रेमानंद एक अनबूझ पहेली। अभी हाल ही में जो घटनाक्रम हुआ है उससे पहेली का अता-पता मिल गया है। एक पुरानीं कहावत है कि "चोर की दाढ़ी में तिनका" जो घटनाक्रम हुआ है वह तिनका ही है। इसीलिए मैं कह रहा हूं कि "अभी तो यह ट्रेलर है पिक्चर अभी बाकी।
कितने कमाल की बात है, दो वर्षों से उस व्यक्ति को अपनी मां तक से नहीं मिलने दिया अन्य परिवारी जनों की बात तो छोड़ो। प्राइवेट पार्ट को कटर से काट कर चौथी मंजिल से फैंकना यह सब क्या कहता है? पर्दे के पीछे की वास्तविकता दुनियां वालों के सामने आनीं चाहिए। शासन और प्रशासन इस प्रकरण को अनदेखा न करे बल्कि मैं तो यह कहूंगा कि सुप्रीम कोर्ट को स्वतः संज्ञान लेकर कदम उठाना चाहिए।
मामला इतना संगीन है कि इसे अनदेखा करना जनता के साथ विश्वास घात करने के समान है। इसकी महत्ता इसलिए भी बढ़ जाती है कि देश की बड़ी-बड़ी हस्थियां अपना माथा टेकने को लाइन लगाकर आती रही हैं। यह सब लिखकर मैं प्रेमानंद जी पर कोई आपेक्ष नहीं लग रहा किंतु सच्चाई जानने का मौलिक अधिकार भी तो है। अब देखना यह है कि दूध का दूध और पानीं का पानीं कब तक होता है?