
कोसीकला – 88 वे वार्षिकोत्सव के तीसरे दिन आयोजित सभा मे आचार्य पंडित कुलदीप शास्त्री ने कहा की मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की राम ने वेदों के अनुसार जीवन को जिया। वेदों के सार के अनुसार उन्होंने संसार में रहकर भी मोह-माया से ऊपर उठकर ‘निवृत्ति’ का मार्ग सीखा। पिता राजा दशरथ के वचनों और वादों को निभाने के लिए राजपाठ छोड़कर सहर्ष 14 वर्ष का वनवास स्वीकार किया, जो उनके सर्वोच्च त्याग और वचनों के प्रति निष्ठा को दर्शाता है।समाज के हर वर्ग के प्रति आदर भाव रखना और एक आदर्श राजा के रूप में प्रजा की सेवा एवं कल्याण को ही अपना परम धर्म मानना उन्होंने वेदों की शिक्षाओं से आत्मसात किया।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्री राम स्वयं ऋग्वेद के मूर्त स्वरूप या अवतार माने गए हैं।वेद कठिन संस्कृत और कड़े नियमों के कारण आम जनमानस के लिए सीधे सुलभ नहीं थे। जब वेदों का ज्ञान श्री राम के चरित्र और रामायण-रामचरितमानस की चौपाइयों के रूप में आया, तो इससे संपूर्ण मानवता को भक्ति, ज्ञान, मर्यादा, और धर्म की सहज प्राप्ति हुई।श्री राम ने वेदों की चौपाइयों (या वेदों के मर्म) से मर्यादा, धर्म की स्थापना, सत्य और लोक-कल्याण का सर्वोच्च आदर्श पाया तथा वेदों के गूढ़ ज्ञान को आम लोगों के जीवन जीने का आधार बनाया। शास्त्री कुलदीप ने कहा कि राम गुरुकुल से शिक्षा पाकर आए और वेदों का प्रचार किया। वही मंच पर उपस्थित प्रसिद्ध वक्ता संजय याज्ञिक ने कहा वेद सनातन धर्म के सबसे प्राचीन और पवित्र ग्रंथ हैं, जिनका शाब्दिक अर्थ होता है ‘ज्ञान’. आध्यात्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान राम ने अपने भीतर किसी भौतिक वस्तु को नहीं, बल्कि सृष्टि के परम ज्ञान और धर्म के सूक्ष्म स्वरूप (वेदों के सार) को अपने भीतर समाहित किया था.
शास्त्रों में भगवान राम को “रामो विग्रहवान् धर्मः” (अर्थात राम धर्म के साक्षात् मूर्त रूप हैं) कहा गया है। रमन्ते योगिनो यस्मिन् स रामः”अर्थात, जिसके भीतर पूर्ण ज्ञान और आनंद पाकर बड़े-बड़े योगी-ऋषि रम जाते हैं (लीन हो जाते हैं), वही राम हैं. इस प्रकार, वेदों का जो अंतिम लक्ष्य है—’परम ब्रह्म की प्राप्ति’—वह स्वयं राम तत्व के अंदर समाया हुआ है।श्रीराम का जीवन सत्य, धर्म, मर्यादा, कर्तव्यपालन और पितृआज्ञा के पालन का प्रतीक है, जिसे आर्य समाज वैदिक संस्कृति का मूल आधार मानता है। वेदों के ज्ञान को अपने अंदर उतारने से राम की प्राप्ति होती है। क्योंकि उन्होंने वेदों के अनुसार धर्म का प्रचार किया। वही मंच मौजूद भजनोपदेशक आचार्य डॉ कपिल मलिक ,भजनोपदेशिका स्वेता आर्या, धनीराम बेधड़क ने वेदों के ऊपर प्रकाश डालते हुए कहा कि महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती के बनाए दस नियमों में आत्मिक सार है। जिसमें लिखा है आर्य संसार का उपकार करना आर्य समाज का मुख्य उद्देश्य है। आर्य समाज ने वेदों के प्रचार के लिए जन जागरूक अभियान चलाया। हमें श्री राम के आदर्शों का पालन करना चाहिए। इस मौके पर आर्य जगत के सन्यासी,बालकिशन आर्य सहित अन्य मौजूद रहे। सभा में संरक्षक ओमप्रकाश आर्य, प्रधान डॉ प्रकाश आर्य, मंत्री सुरेन्द्र आर्य, विजय आर्य, सत्य प्रकाश आर्य, नरेंद्र आर्य, अजय आर्य, महेश आर्य, नरेश आर्य, योगेश आर्य, आदि लोग मौजूद रहे।

