मथुरा। पिछले दिनों नीट पेपर लीक के नाम पर जो कुछ हुआ उससे मुझे लगता है कि यदि ये आंदोलनकारी क्षमा करें आंदोलनकारी नहीं उपद्रवी जमीन के अंदर गड्ढा खोदकर जिंदे ही दफना दिए जाते। यह सब कुछ सरकार का तख्ता पलटने वाले लक्ष्य को लेकर चल रहा था, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार बांगलादेश में हो चुका है। कुछ इसी प्रकार का घटनाक्रम काफी समय पूर्व किसान आंदोलन के नाम पर हुआ था। एकाध और भी मामलों में देश विरोधी शक्तियां असफल हो चुकी हैं। किसान आंदोलन के नाम पर ऊधम मचाने वाले क्या किसान थे? उनमें एक प्रतिशत भी किसान नहीं थे। सोचने की बात है कि धरना स्थल पर पांच सितारा होटलों की सुख सुविधाओं का मजा लेने वालों का किसानी से कोई मतलब नहीं था। ठीक उसी प्रकार अब छात्र आंदोलन के नाम पर बवंडर खड़ा करने वाले देश विरोधी दलों के हाथ की कठपुतली थे।
होड़ा होड़ी की सनक में युवा पीढ़ी के कुछ लोग भी गुमराह होने लगे थे। सोचने की बात है कि देश भर में इतना व्यापक और सुनियोजित ऊधम मचाना इन मूर्खों के बाप के बस की भी बात नहीं थी। यह सब खेल देश विरोधी मानसिकता वाले गद्दारों का ही कारनामा था। यह तो मोदी जी की बुद्धिमत्ता थी कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा दिलवाकर विकराल रूप धारण करने वाले उपद्रव को शांत कर दिया। नीट पेपर लीक तो सिर्फ एक बहाना था। पंजाब की बानगी को लेलो वहां नीट पेपर की खूब लीकेज हुई और विरोधी छात्रों पर वहां की पुलिस ने खूब लठियां भांजी वहां तो आम आदमी पार्टी की सरकार है। सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण और सोचने की बात तो यह है कि चाहे किसान आंदोलन के नाम पर हो या छात्र आंदोलन के नाम पर। इन सबके खाने-पीने व अन्य सब व्यवस्थाओं की फंडिंग कहां से हो रही थी? यह सब कुछ खेल तमाशा दिमाग पर जोर देकर समझने पर स्पष्ट हो जाएगा।
एक कहावत है कि हाकिमी गर्मी की और दुकानदारी नर्मी की" यदि देश को चलाना है और आगे बढ़ाना है तो बार-बार इन उपद्रवियों के आगे झुकने के बजाय "लातों के भूत बातों से नहीं मानते" वाली कहावत को चरितार्थ करना होगा। अब फिर मैं लौट कर चीन और उत्तर कोरिया का उदाहरण देते हुए कहूंगा कि आज विश्व भर में चीन हावी क्यों होता जा रहा है? उत्तर कोरिया का किम जोंग अमेरिका जैसे ताकतवर देश के राष्ट्रपति की आंखों में आंख डालकर कैसे धमका लेता है? अब लातों के भूत बातों से वाली बात से भी आगे बढ़कर "जूतों के यार" वाली दिशा में बढ़ना ही श्रेयकर होगा। मोदी जी जैसे करिश्माई व्यक्ति जो चीन जैसे क्रूर देश को उसी की भाषा में जवाब देकर दुत्कारने की कुब्बत रखते हैं पूरे विश्व में उनका डंका बज रहा है। शायद किसी खास मौके की तलाश में हैं या फिर अपनी सज्जनता और विनम्रता के बोझ से बोझिल हो रहे हैं। यह हम नहीं समझ पा रहे हैं।
लेख को लिखते लिखते मुझे आपातकाल की याद आ रही है। भले ही इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल अपनी कुर्सी को बचाने के लिए लगाया था। किन्तु यह कटु सत्य है कि आपातकाल देश के लिए संजीवनी बन गया था। हालांकि उस दौरान अनेक निर्दोषों को भी जेल जाना पड़ा और ज्यादतियां भी हुईं, ठीक उसी प्रकार जैसे चने के साथ घुन भी पिस जाता है। पूरा देश उस समय तरक्की की दिशा में सरपट दौड़ने लगा था। भ्रष्टाचार ऐसे गायब हो गया जैसे गधे के सर से सींग। पुलिस सेवक के रूप में मुस्तैद रहती थी। हत्या, लूट, डकैती, दुराचार व्यभिचार उड़न्छू हो गए। रेलें समय से चलतीं। ज्यादातर बिफोर टाइम प्लेटफार्म पर आ जातीं। न्यायालय में सोच समझकर पूर्ण न्यायिक तरीके से फैसले दिए जाते। यह कपोल कल्पित नहीं सब कुछ मैंने अपनी आंखों से देखा था। भले ही मैं मोदी जी का मुरीद हूं और कभी-कभी तो मैं उन्हें अवतारी व्यक्ति समझने लगता हूं किंतु यह कहने में मुझे जरा भी हिचक नहीं कि इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए तथा सिख उग्रवाद को जड़ मूल से समाप्त कर दिया भले ही उन्हें इसकी कीमत अपनीं जान देकर चुकानी पड़ी। वह एक ऐसी लौह महिला थीं जो दमदारी से शासन चलाना जानती थीं।
इसी तारतम्य में संजय गांधी की याद भी आ रही है। आपातकाल में उन्होंने देश की बागडोर को अपने हाथ में लेकर जिस प्रकार शासन चलाया वह भी तारीफे काबिल है। अगर हिंदुत्व की बात करें तो उनसे बड़ा हिंदूवादी मुझे आज भी कोई दिखाई नहीं देता। इस बात को कोई नकार नहीं सकता। अगर आज आपातकाल होता और संजय गांधी जिंदा होते तो शायद हमारा देश चीन जैसा ताकतवर होता। हो सकता है उससे भी ज्यादा ताकतवर होता। हे भगवान हमारे देश को दोबारा से ऐसा कोई संजय गांधी दे दो जो गद्दारों को सबक सिखाये और देश को आगे बढ़ाये।