


वृंदावन। वृंदावन इंस्टीट्यूट ऑफ़ म्यूज़िक द्वारा भारतीय शास्त्रीय संगीत की दिव्य एवं गौरवशाली परंपरा को समर्पित एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन ओमेक्स एटरनिटी में किया गया।
कार्यशाला में दिल्ली के सुप्रसिद्ध ध्रुपद गायक डॉ. बृज भूषण गोस्वामी के सान्निध्य में वृन्दावन, नंदगाँव एवं आसपास के क्षेत्रों से आए विद्यार्थियों, संगीत प्रेमियों तथा नवोदित कलाकारों की उत्साहपूर्ण सहभागिता ने पूरे वातावरण को सुरमय एवं ऊर्जावान बना दिया। स्वागत उद्बोधन में भारतीय शास्त्रीय संगीत की सनातन परंपरा, उसकी आध्यात्मिक चेतना तथा ध्रुपद गायन की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत पर प्रकाश डाला गया।
डॉ. बृज भूषण गोस्वामी ने संगीत को केवल एक कला नहीं, बल्कि साधना, आत्मानुभूति और ईश्वर-प्राप्ति का माध्यम बताया। उन्होंने स्वर-साधना, स्वर-शुद्धता, श्वास-नियंत्रण, राग-विस्तार, लय-अनुशासन तथा नियमित रियाज़ के महत्व को अत्यंत सरल, प्रभावशाली एवं व्यावहारिक शैली में समझाया।
कार्यशाला का व्यावहारिक सत्र अत्यंत ज्ञानवर्धक एवं प्रेरणादायी रहा। सर्वप्रथम राग यमन की मधुर एवं भावपूर्ण रचना ये री आली पिया बिना… का अभ्यास कराया गया। जिसके माध्यम से राग की कोमलता, माधुर्य एवं भावाभिव्यक्ति का विस्तृत परिचय मिला। तत्पश्चात राग भैरव में महाकवि नागरीदास जी द्वारा रचित हवेली संगीत की अनुपम रचना प्रथम श्री सेवक पद सिर नाऊँ… का गायन एवं भावार्थ प्रस्तुत किया गया। राग बागेश्री में चौताल में निबद्ध ध्रुपद बंदिश तू हो करुणा निधान… का अभ्यास कराया गया। डॉ. गोस्वामी ने आलाप, बोल-आलाप, स्वर-विस्तार, लयकारी तथा ध्रुपद गायन की प्रस्तुति शैली की सूक्ष्म बारीकियों को अत्यंत सहज एवं प्रभावशाली ढंग से समझाया। प्रत्येक रचना के माध्यम से उन्होंने यह स्पष्ट किया कि ध्रुपद केवल गायन शैली नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक एवं सांगीतिक परंपरा की जीवंत अभिव्यक्ति है।
पूरे प्रशिक्षण के दौरान पखावज पर नटवर शर्मा की सशक्त एवं प्रभावपूर्ण संगत ने ध्रुपद गायन की गंभीरता और सौंदर्य को और अधिक प्रभावशाली बना दिया। उनकी लयकारी एवं सटीक संगत ने कार्यशाला के प्रत्येक सत्र को जीवंत और प्रेरणादायी स्वरूप प्रदान किया।
कार्यशाला में प्रतिभागियों का उत्साह उल्लेखनीय रहा। सभी विद्यार्थियों ने पूरे मनोयोग से अभ्यास में भाग लिया तथा गुरु के निर्देशन में विभिन्न रागों और बंदिशों का अभ्यास किया। नंदगाँव के गौरव गोस्वामी की सक्रिय सहभागिता एवं संगीत के प्रति समर्पण सभी के लिए प्रेरणास्पद रहा।
प्रश्नोत्तर सत्र में प्रतिभागियों ने स्वर-साधना, रियाज़ की पद्धति, ध्रुपद गायन, मंच-प्रस्तुति तथा गुरु-शिष्य परंपरा से संबंधित अनेक जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त किया। डॉ. गोस्वामी ने सभी प्रतिभागियों को भारतीय शास्त्रीय संगीत की मौलिकता एवं परंपरा को संरक्षित रखते हुए निरंतर साधना करने का संदेश दिया।
कार्यक्रम के समापन अवसर पर आयोजकों द्वारा डॉ. बृज भूषण गोस्वामी, पखावज वादक नटवर शर्मा तथा सभी प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया। कहा कि ऐसी कार्यशालाएँ भारतीय शास्त्रीय संगीत के संरक्षण, संवर्धन एवं प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रहेंगी।
यह कार्यशाला केवल एक प्रशिक्षण कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारतीय संगीत की आध्यात्मिक विरासत, ध्रुपद की गंभीर साधना और गुरु-शिष्य परंपरा का एक जीवंत उत्सव सिद्ध हुई। ज्ञान, साधना, अनुशासन और संगीत के प्रति समर्पण का यह संगम सभी प्रतिभागियों के लिए स्मरणीय रहेगा तथा उन्हें उत्कृष्ट संगीत साधना की दिशा में निरंतर प्रेरित करता रहेगा।

