मथुरा। बात कुछ दिनों पहले की है। हमारे साथी मनोज तौमर की माताजी गांव कराहरी निवासी विमला देवी से मेरी बात हो रही थी। प्रसंग था करनीं का फल। उन्होंने मुझसे एक ऐसी बात कही जो मेरे अंदर की गहराई तक उतर गई और बार-बार दिमांग में घूमती रहती है। उन्होंने कहा कि जब हम सभी बहन भाई छोटे बच्चे थे तब हमारे पिताजी बच्चों को साथ लेकर परिक्रमा लगाने जाते थे। परिक्रमा में अनेक ऐसे भिखारी मिलते जिनको भयंकर रूप से कोढ़ होता था, हाथ और पैर की उंगलियां सड़ रही होती, जिन्हें देखकर हमें बड़ा तरस भी आता था किंतु पिताजी कहते कि पिछले जन्म में इनमें कोई जज कोई कलक्टर कोई दरोगा या अन्य बड़े ओहदे वाले रहकर अन्यायी और अत्याचारी रहे होंगे। वे कहते थे कि जजो ने घूस लेकर दोषी को निर्दोष और निर्दोष को दोषी बनाया होगा। इसी प्रकार कलक्टर बनकर खूब लूटपाट की होगी तथा पुलिस वालों ने भी खूब जुल्म ज्यादती की होगी। वे कहती हैं कि जरूरी नहीं की जज कलक्टर व पुलिस वाले बनकर जुल्म जाती हुई होगी। उनमें हत्यारे, लुटेरे, व्यभिचारी, दुराचारी तथा अन्य अनेक अनेक प्रकार के जघन्य अपराधी भी रहे होंगे जिन्होंने अपने जीवन में तरह-तरह से बेईमानी गद्दारी एहसान फरामोशी यानी नीचता की पराकाष्ठा की होगी। विमला देवी कहती हैं कि हमारे पिताजी कहते थे कि आज वे लोग अपनी करनीं का फल भुगत रहे हैं तथा हाथ फैला कर भीख मांग रहे हैं। विमला देवी जी की बातों में बड़ा दम है। उनके पिताजी ने जो कुछ कहा वह न्याय की कसौटी पर खरा उतरता है। भगवान किसी निर्दोष को कोड़ी, कलंकी, अंधा धुंधा या अन्य किसी प्रकार से ऐसा भयंकर दुख नहीं देंगे। कहने का मतलब है कि चाहे किसी भी क्षेत्र की बात हो जरूरी नहीं की जो चर्चा मैंने ऊपर की है वे ही दोषी हों दोषी डॉक्टर भी हो सकता है दोषी वकील भी हो सकता है दोषी व्यापारी भी हो सकता है दोषी पत्रकार भी हो सकता है दोषी शराबी व मांसाहारी भी हो सकता है। मतलब की बात यह है कि हर क्षेत्र में अगर कोई व्यक्ति अपने कर्तव्य से विमुख होकर अन्यों के साथ अन्याय करेगा वह जरूर दंड का भागी होगा। यह जरूरी नहीं की दंड इसी जन्म में में मिले या कोढ़ी कलंकी व अंधा धुंधा बनकर मिले दंड के तो अनेक विधान हैं। अगर किसी की थू-थू हो तो यह भी एक बहुत बड़ा दंड है। सौ की सीधी बात यह है कि हम अपने अंतरात्मा की कसौटी पर तोलें कि यह काम गलत है या सही। अंतरात्मा स्वयं ही बता देती है कि यह गलत है या सही है किंतु हम अपनी अंतरात्मा की बात नहीं सुनते तथा आंखों पर पट्टी और कानों में रुई ठुंस जाती है। उसका परिणाम क्या होता है? उसे समझना है तो विमला देवी के पिताजी की बातों को समझो और कोढ़ी कलंकी बनने से बचो।