HomeUncategorizedजश्ने आजादी या जश्ने बर्बादी

जश्ने आजादी या जश्ने बर्बादी

 मथुरा। आजादी की अस्सी वीं वर्षगांठ मनीं यानी खूब धूमधाम से जश्ने आज़ादी का बवंडर मचा। जम कर तिरंगा यात्राएं निकली। भाषण बाजी हुई और खूब सारे लुभावने कार्यक्रम हुए। परंतु मुझे यह सब अच्छा नहीं लगता। मुझे तो यह सब जश्ने आजादी नहीं। बल्कि जश्ने बर्बादी प्रतीत होती है। भले ही मेरी बात हर किसी को हजम नहीं होगी क्योंकि गहराई से सोचने की फुर्सत किसे है।
 आज संपूर्ण देश में जो कुछ हो रहा है वह किससे छिपा है। लूटपाट, हत्याएं, चोरी, डकैती, भ्रष्टाचार तथा दुराचार आदि सब चरम पर हैं। पहले गोरों ने जुल्म ढाऐ अब काले उनसे भी ज्यादा जुल्म ज्यादतियां कर रहे हैं। देश विरोधी ताकतें हावी हो रही हैं। गद्दारों की मौज हो रही है। यह सब अभी नहीं हो रहा है बल्कि जबसे आजादी मिली है उसके बाद से ही धीरे धीरे बढ़ता चला आ रहा है।
  देश को आजाद कराने में अनगिनत लोगों ने अपना तन मन धन सब कुछ न्योछावर कर दिया, क्या वह इसीलिए किया था? आज आम जनता त्राहिमाम त्राहिमाम कर रही है और लुच्चे, गुंडे, बेईमान, हत्यारे दुराचारी व अन्य सभी प्रकार के अपराधी संसद व विधानसभाओं में पहुंचकर हमारे ऊपर राज कर रहे हैं। हर विभाग में भ्रष्टाचार का तांडव मच रहा है। न्यायपालिका की जीती जागती मिसाल जस्टिस वर्मा हैं। जो गटर के कीड़े हैं वे देश विरोधी ताकतों से मिलकर उपद्रव मचा रहे हैं तथा अराजकता फैलाकर अनुचित मांगों को भी मनवा रहे हैं। अब और क्या कहूं सब कुछ सभी के सामने है। यदि यूं ही चलता रहेगा तो एक दिन हमारा देश कहीं फिर से गुलामी की जंजीरों में न जकड़ जाय।इमरजेंसी के नाम से तो लोगों को मिर्ची लगती है। चलो इमरजेंसी न सही कम से काम ऐसा कुछ करो जिससे लोगों में भय तो व्याप्त हो। कहते हैं भय बिन होय न प्रीती।
 मेरा एक सुझाव है वह यह कि जब स्थिति बिगड़ जाती है तब सेना को बुलाया जाता है। ठीक इसी प्रकार कुछ समय को देश की बागडोर सेना को सौंप देनी चाहिए क्योंकि सेना का भय पुलिस से कहीं ज्यादा होता है। दूसरी बात यह है कि सेना में भ्रष्टाचार बहुत कम है। सैनिक क्षेत्र की सड़कों को ही देख लो। सेना में अनुशासन भी बहुत ज्यादा होता है। हालांकि मेरी यह बात अटपटी जरूर लगेगी किंतु यह कटु सत्य है कि जब तक कोई हिटलर पैदा नहीं होगा तब तक देश का उद्धार असंभव है।
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