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साधु या शैतान

 मथुरा। साधु कौन होता है? जो सात्विक जीवन जीये, धन संपत्ति और ऐसो आराम से बचे अय्याशी तो दूर-दूर तक उसके पास भी न फटके, हमेशा दूसरों का भला करे ईश्वर का भजन यानी त्याग तपस्या की प्रतिमूर्ति हो। इसके अलावा प्रपंच और प्रॉपेगन्डा से भी उसे दूर रहना चाहिए।
 अपने पिताजी को मैंने यह कहते सुना था कि सबसे श्रेष्ठ ग्रहस्थ आश्रम होता है। जो लोग ब्रह्मचर्य की बात कहते हैं उसका जवाब भी पिताजी के मुंह सुन रखा है। पिताजी कहते थे कि एक नारी सदा ब्रह्मचारी। कहने का मतलब है कि आज कल जो व्यक्ति साधु का रूप धारण करके शैतानियों में लिप्त हैं, उनसे लोगों को दूर रहना चाहिए नाकि उनको गुरु बनाकर उनके पैरों में पड़ना चाहिए। एक कहावत है कि "पानीं पीजै छान कै और गुरु कीजै जान कै" बिना जाने बिना पहचाने इन गुरु घंटालों को गुरु का दर्जा देने वाले इन मूर्खों की बुद्धि पर मुझे तरस आता है। एक ओर तो ये बहरूपिए अपने प्रवचनों में लोगों से कहते हैं कि धन दौलत से ज्यादा मोह ममता मत करो तथा सात्विक व सदाचारी जीवन जियो और खुद धन दौलत में जकड़े रहते हुए ऐसो आराम का जीवन बिताते हैं। औरों को सदाचारी जीवन जीने की सीख देते हैं और खुद नंबरी दुराचारी होते हैं। एक और बात यह कि ये धूर्त अपने नाम के आगे और पीछे तरह-तरह के विश्लेषण लगाकर स्वयं महिमा मंडित होते हैं। इससे भी बहुत आगे बढ़कर कुछ तो स्वयंभू महामंडलेश्वर व शंकराचार्य तक बन जाते हैं। कायदे से तो देश में सिर्फ चार शंकराचार्य ही होते हैं किंतु पता नहीं कितने पाखंडी अपने आप को शंकराचार्य लिखने लगे हैं।
 एक रोचक किस्सा बताऊं। कई वर्ष पहले की बात है एक प्रमुख स्थान पर एक नामचीज कथा वाचक की भागवत कथा चल रही थी। कठोर जाड़े के दिन थे, कथावाचक कथा शुरू होने से पूर्व बगैर स्नान किए एक कमरे में एक युवती से अपने चेहरे का मेकअप करा रहे थे, मेकअप पूरा होते ही उस युवती ने उनका चुंबन लिया इसी दौरान अचानक उस स्थान के पदाधिकारी आ गये उन्होंने वह दृश्य देख लिया तो कथावाचक बुरी तरह झेंप गए व खींसे निपोरने लगे।
 इन पाखंडियों का आत्मबल कितना होता है इसकी एक बानगी जो कुछ वर्ष पहले की है उसे भी बताता हूं। एक  बहुरूपीये से कुपित होकर वृंदावन के अनेक साधु भेषधारी पाखंडियों ने उसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया तथा अखबारों व टी.वी. पर जमकर बुरा भला कहते हुए ऐलान कर दिया कि इस धूर्त को अब हम वृंदावन धाम में घुसने भी नहीं देंगे। वह बहुरूपिया भी कम नहीं था उसे भी इसकी नस-नस पता थी कि ये कितने पानीं में हैं। उसने इन सभी को मानहानि के नोटिस भिजवा दिए। अब तो भैया इनकी ऐसी हवा निकली कि पूंछो मत। इनकी दशा ऐसी हो गई जैसे गुब्बारे की हवा निकलने पर उसकी हो जाती है। ये सभी उसके पैरों में पड़ने लगे तथा माफीनामा लिख लिख कर दे आये व फिर उसी के गुंणगान करने लगे। कुछ साधु भेषधारी तो अब नेतागीरी भी करने लगे हैं तथा अपने को चमकाने के लिए तरह-तरह की स्टंट बाजी भी करते हैं। कुछ तो ऐसे प्रपंची हैं जिनकी दुकान भी खूब चल निकली है और एक से बढ़कर एक वी.वी.आई.पी. उनको ढोकने आते हैं इनमें एक युवा प्रपंची तो क्रिकेट का ऐसा शौकीन है कि क्रिकेट का मैच शुरू होने से पहले अपनी कथा को निर्धारित समय से पहले ही समाप्त कर देता है उसकी कई कई रखैल हैं।
 हां एक बात मुझे बहुत अखरती है, वह यह कि कुछ साधु महात्माओं के बड़े-बड़े लंबे चौड़े अत्याधुनिक आश्रमों में पूरा मीडिया ग्रुप सक्रिय रहता है। इधर कोई बड़ी हस्थी आई और मिन्टों में उसकी वीडियो फोटो व समाचार अखबारों व चैनलों तक पहुंच जाते हैं। यही नहीं प्रेस वालों का मेहनताना भी बंद लिफाफे में हाथों-हाथ डिलीवरी। मैं पूछता हूं कि इन संत महात्माओं का इस प्रकार का कृत्य क्या उचित है? संतत्व की आड़ में तो इनकी दुकान खूब चल निकली है और दिन दूनीं रात चौगुनीं गति से शौहरत व धन दौलत की वर्षा इनके ऊपर हो रही है।
 मेरा कहना यह है कि सबसे पहले अपने अंदर बैठे संतत्व को जगाओ और ऐसे कर्म करो जिससे तुम्हारा जन्म सफल हो। इन ढोंगी पाखंडियों के चक्कर में मत पड़ो। यदि गुरु बनाना है तो पहले यह देखो कि इसका असली स्वरूप क्या है? जब यह लगे कि वास्तव में यह गुरु बनाने लायक है तभी उसे अपना गुरु मानो। वैसे देखा जाए तो सबसे पहले अपनी गुरु माता होती है उसके बाद पिता तथा जिस जिस ने जो शिक्षा दी है वह गुरु तुल्य होता है। अंत में आध्यात्मिक गुरु सोच समझकर और अच्छी तरह परख कर ही बनाना चाहिए। मैं तो अंत में यही कहूंगा कि यदि हम लोग अपने जीवन में संतत्व को आत्मसात करलें तो फिर न किसी संत की जरूरत और ना ही किसी गुरुदीक्षा की।
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